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राजनीति

मोदी बोले:इदं राष्ट्राय: इदन्न मम्

nam03360_1राकेश कुमार आर्य
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के 68वें स्वाधीनता दिवस की पावन बेला पर लालकिले की प्राचीर से मर्दानी, वरदानी और बलिदानी भाषा बोलकर देश को गदगद कर दिया, उनके ओज को देखकर ‘शत्रु’ अपनी चाल भूल गया।
सुरक्षात्मक भाव को तिलांजलि दे अपने आक्रामक स्वभाव के लिए जाने-जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर पर प्रधानमंत्री के लिए बनने वाली ‘बुलेट प्रूफ’ सुरक्षा व्यवस्था को हटवा दिया और देश की जनता से सीधा संवाद स्थापित करते हुए स्वयं को प्रधानमंत्री नही, अपितु जनता का ‘प्रधानसेवक’ बताया। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में दस मिनट केवल देश की बेटियों को देकर जहां यह अनुभूति करायी कि आज लालकिले की प्राचीर से पहली बार देश की बेटियों का प्रधानमंत्री दूषित प्रदूषित व्यवस्था के परिवर्तन की बात कर उन्हें सुरक्षित और संरक्षित परिवेश देने के लिए पूरे देश को आंदोलित और संकल्पित कर रहा है, वहीं उन्होंने प्रत्येक देशवासी से ‘मेरा क्या और मुझे क्या’ की संकीर्ण भावना से ऊपर उठकर स्पष्ट किया कि संसार में प्रत्येक कार्य अपने लिए ही नही होता है, कुछ चीजें देश के लिए भी हुआ करती हैं।
वास्तव में पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने हमारे भीतर यही बात पैदा की है कि हम अब हर बात में ‘अपना स्वार्थ’ देखने लगे हैं। बाजारवादी व्यवस्था ने हमारी सोच को इतना संकीर्ण बना दिया है कि हर स्थान पर और हर स्थिति परिस्थिति में हम अपना लाभ खोजते हैं, इसी के लिए सोचते हैं और इसी के लिए जीते मरते हैं। इस सोच ने मां-बेटे, पिता-पुत्र, भाई-भाई और पति-पत्नी या बहन भाई तक के पवित्र संबंधों में भी दीवार खड़ी कर दी है। फलस्वरूप प्रधानमंत्री ने भी चिंता व्यक्त की है कि इस सारी स्थिति परिस्थिति का परिणाम ये आया है कि आज माता पिता को वृद्घाश्रमों की जेलों में डालकर हर बेटा ‘कंस’ बनने की तैयारी करता सा लग रहा है। पिछले 67 वर्ष से पश्चिम की (अ) सभ्यता का अंधानुकरण करते-करते हमने इतनी ही उन्नति की है कि हम कंस बन गये हैं।
मोदी इस ‘कंस प्रवृत्ति’ से मुक्त भारत का निर्माण करना चाहते हैं। वह अपने भाषण में राष्ट्रीय चरित्र को विकसित कर नये भारत को ‘विश्वगुरू-भारत’ के रूप में स्थापित करने के लिए चिंतित दीखे। उनका भाषण लिखित भाषण नही था, इसलिए उस भाषण में उनका अपना चिंतन बोल रहा था, उनकी अपनी सोच बोल रही थी और बोल रहा था-उनका अपना संकल्प। देश में अभी बहुत लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने चिंतन से, अपनी सोच से और अपने संकल्प से बोलने वाले प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के एक बार के कहने पर सप्ताह में एक दिन का व्रत रखने का संकल्प लेकर देश को ‘अन्न संकट’ से उभारने की अपने प्रधानमंत्री की अनूठी पहल का अनुकरण किया था। अंतर्मन से निकली बातें दूसरे के अंतर्मन को अवश्य की प्रभावित करती हैं।
अत: मोदी जो बोले उसे राष्ट्र ने सुना और राष्ट्र के बहुत से लोगों ने संकल्प ले लिया कि ‘मोदी’ नाम के आंदोलन को और ‘मोदी’ नाम के संकल्प को गली-गली पहुंचाएंगे। जब नेता से जनता इस प्रकार एकाकार हो जाया करती है,तब सचमुच नेता ‘नायक’ बन जाया करता है। भारत में संभवत: ‘नायक’ को भगवान मानकर पूजे जाने की परंपरा इसीलिए चली थी।
मोदी ने राष्ट्र के लिए कुछ करने की जो बात कही है उसका अपना महत्व है। पूरी भारतीय संस्कृति ‘इदन्न मम्’ की याज्ञिक संस्कृति के आधार पर टिकी हुई है। इसलिए हमारे यहां प्राचीनकाल में बच्चे को माता-पिता से अलग गुरूकुलों में शिक्षा दिलायी जाती थी। जिससे कि वह अपने परिवार के लिए नही अपितु अपने देश के लिए तैयार हो। कारण कि बच्चे परिवार की पूंजी न होकर देश की पंूजी होते हैं। अत: उनके भीतर इदन्न मम् का संस्कार इतनी प्रबलता से आरोपित किया जाता था कि वह बड़ा होकर किसी स्वार्थ की बात में आता ही नही था। वह माता-पिता के प्रति तो संस्कारित होता ही था साथ ही संसार के प्रति, अपने दायित्वों से भी प्रेरित होता था और उन्हीं के लिए कार्य करता था। इसी भावना को हमारे ऋषियों ने ‘धर्म’ का नाम दिया था। इसलिए देश में धर्म का शासन चलता था।
पुत्र के उत्पन्न होने पर मौहल्ले पड़ोस में भी प्रसन्नता इसीलिए होती थी कि वह सबके काम आएगा। पर इसका अभिप्राय यह नही कि हमारी बेटियों का सम्मान तब नही था, सम्मान उनका भी था क्योंकि वह भी सृष्टि संचालन के लिए उतनी ही आवश्यक मानी जाती थीं, जितना कि बेटा। हमारे बच्चों का जीवनोद्देश्य होता था राष्ट्र की सेवा करते-करते विश्व का कल्याण करना। कुटुम्ब का विस्तार करने के लिए वह चलता था और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर जाकर रूकता था। इसलिए मोह तोडऩा और स्वार्थ को दूर भगाना आवश्यक माना जाता था। इसके लिए आचार्य उसे गुरूकुल में इदन्न मम् यह मेरा नही इदं राष्ट्राय: यह राष्ट्र का है-का पाठ पढ़ाता था।
आज पश्चिम की (अ) सभ्यता ने हमें इस व्यवस्था के सर्वथा विपरीत शिक्षा दी है और बताया है कि बात उससे करो जिससे आपका स्वार्थ पूर्ण होता हो, काम उसका करो-जो तुम्हारे काम आता हो। फलस्वरूप सारा परिवेश ही स्वार्थपूर्ण हो गया है। आखिर कहां गये वे दिन जब एक किसान अपने किसी संबंधी के यहां दूर तक चलकर मात्र दस पांच रूपये के भुट्टे बच्चों को देने जाया करता था और वह संबंधी भी उस आगंतुक पर बड़ी सहजता से दस पांच रूपये के उसके भुट्टों की एवज में उस पर 100 रूपया खर्च कर दिया करता था। क्या लोग तब हिसाब नही जानते थे, या यह आत्मीय भाव उनके जीवन का एक श्रंगार था। कदाचित मोदी देश से लुप्त होते इसी आत्मीय भाव को पुर्नस्थापित करने के लिए हमें लालकिले से आंदोलित कर गये हैं कि-इदं राष्ट्राय:-इदन्नम मम् को अपना जीवनाधार बना लो, जीवन का श्रंगार बना लो। राष्ट्र का कल्याण हो जाएगा।

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