हिन्दू महासभा की प्रचण्डता में ही छिपा है देश की अखण्डता का मूलमंत्र

हिंदू महासभा का अपना गौरवमयी अतीत है। 10 अप्रैल 1875 ई. में आर्यसमाज की स्थापना महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज के द्वारा मुंबई में की गयी थी। उसके पश्चात हिंदू सभा पंजाब (1882 ई.) का जन्म हुआ। 1909ई. में बंगाल हिंदू सभा की स्थापना की गयी थी। इससे पूर्व 1906 ई. में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की जा चुकी थी। यू.एन. मुकर्जी जैसे चिंतनशील व्यक्ति ने मुस्लिम लीग की स्थापना का उद्देश्य समझ लिया था कि इसका उद्देश्य अलगाववाद के अतिरिक्त और कुछ नही हो सकता। अत: उन्होंने बंगाल में हिंदू सभा की स्थापना की। मुकर्जी ने साम्प्रदायिक आधार पर बंगभंग (1905 ई.) होते देखा था और उससे अगले वर्ष ही मुस्लिम लीग की स्थापना होते देखी थी। अंग्रेज मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे थे, और हिंदू समाज को शोषण का शिकार बना रहे थे। अत: बंगाल में हिंदू सभा की स्थापना आवश्यक हो गयी थी।

इसी समय पं. मदनमोहन मालवीय जैसे गंभीर और धर्मानुरागी व्यक्तित्व का आविर्भाव हुआ। उन्होंने 1911 ई. में बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की नींव रखी। जो आज तक उनकी यश पताका फहरा रहा है।

जब देश में अंग्रेजों की शह पर मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिकता रंग दिखाने लगी और हिंदू हितों को चोट पहुंचाने लगी तो अखिल भारतीय स्तर पर हिंदू महासभा की स्थापना की आवश्यकता तत्कालीन नेताओं को होने लगी। संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की हिंदू सभा का नेतृत्व उस समय पं. मदन मोहन मालवीय जी के हाथों में था। पंडित जी संस्कारी जीव थे, वह सरकार की मुस्लिम पोषक नीतियों के विरोधी थी। 1915 ई. में हिन्दू महासभा को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने के लिए हिंदू सभाओं का जो सम्मेलन हरिद्वार में आहूत किया गया था, उसमें पं. मदन मोहन मालवीय जी एक कांग्रेसी नेता के रूप में उपस्थित हुए थे। इस अधिवेशन में कासिम बाजार नरेश मणीन्द्र चंद्र नंदी को अखिल भारत हिंदू महासभा का पहला अध्यक्ष चुना गया। इस अधिवेशन के सभापति भी महाराजा मणीन्द्र चंद्र नंदी ही थे। तब से लेकर अब तक यथा समय हिंदू महासभा का राष्ट्रीय अधिवेशन होता आ रहा है। इस संगठन का राष्ट्रीय कार्यालय इसी वर्ष इलाहाबाद से स्थानांतरित कर हरिद्वार में स्थापित कर दिया गया। 1915 ई. के दिसंबर माह में हिंदू महासभा का विशेष अधिवेशन बंबई में आहूत किया गया था, जिसकी अध्यक्षता पं. मदन मोहन मालवीय ने की थी। जबकि संगठन की स्थापना 13 अप्रैल 1915 को बैशाखी के दिन हो गयी थी।

1915, 1916, 1917 ई. के तीन राष्ट्रीय अधिवेशन पार्टी ने हरिद्वार में ही आहूत किये। जिससे इस संगठन को हिन्ंदुओं की प्रतिनिधि संस्था होने का गौरव प्राप्त हो गया। संगठन के मंचों पर डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. मुंजे, मोतीलाल नेहरू और गांधीजी जैसे लोग आने लगे। गांधीजी ने अपनी राजनीति का क, ख, ग, हिंदू महासभा से ही सीखा। उनके भीतर गंगा, गाय और गीता के प्रति यदि रंच मात्र भी श्रद्घा थी तो वह संस्कार उन्हें हिंदू महासभा से ही मिला था। सन 1917 में राजा नरेन्द्र नाथ के नेतृत्व में 38 सदस्यीय शिष्टमंडल ने तत्कालीन राज्यमंत्री मि. मांटेग्यू से भेंट की तथा हिन्दुओं के दावे को उसके सामने ज्वलंत रूप से प्रस्तत किया। इसके अतिरिक्त हिंदू नेता ने ‘कांग्रेस लीग-लखनऊ पैक्ट’ का तीव्रतम विरोध किया। जबकि 1918 ई. के राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता राजा ‘सर’ रामपाल सिंह नोमी ने की थी। इस अधिवेशन में देश के विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

कांग्रेस की भांति हिंदू महासभा ने कभी भी अंग्रेजों पर अंधा होकर विश्वास नही किया। कांग्रेस ने प्रथम विश्वयुद्घ में अंग्रेजों पर विश्वास किया तो अंग्रेजों ने जलियांवाला बाग हत्याकांड उसे पुरस्कार के रूप में दे दिया, जबकि हिन्दू महासभा ने उससे दूरी बनाकर रखी। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ खिलाफत के नाम पर सहयोग किया तो उसने गांधीजी के साथ असहयोग के नाम पर भी असहयोग ही किया। हिंदू महासभा ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाकर समस्याओं का समाधान खोजना चाहा, परंतु कांग्रेस ने कई बार दब्बूपन में तो कई बार व्यर्थ के आदर्शवाद में बहकर गलत नीतियों का चयन कर लिया। इसीलिए कांग्रेस ‘वंदेमातरम्’ से भागती रही और हिंदू महासभा ‘वंदेमातरम्’ को देश का्र प्राण घोषित करती रही। इसी प्रयास के अंतर्गत हिंदू महासभा ने अपना ‘शुद्घि आंदोलन’ चलाया। 1921 ई. में ‘मोपला-काण्ड’ के समय जब हिंदुओं की नृशंस हत्या केरल में की गयी, तो भी हिंदू महासभा ने तो राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अपनाया, परंतु कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सर्वथा दुर्बलता का परिचय दिया। डा. बी.एस. मुंजे का हृदय ‘मोकला हत्याकांड’ को देखकर द्रवित हो उठा था। वह लाला लाजपतराय से प्रभावित थे। देशभक्ति और राष्ट्रवाद उनके रोम-रोम में कूट-कूटकर भरा था। स्वामी श्रद्घानंद जैसे कट्टर आर्य समाजी नेता हिंदू महासभा के पौराणिक स्वरूप की चिंता किये बिना इसके मंच पर आए और पांच लाख मलकाने धर्मान्तरित राजपूतों की शुद्घि का कार्य करने में सफल रहे। उन्होंने गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना की, तो उन्हीं के साथी पं. मदन मोहन मालवीय जो कि घोर पौराणिक थे, ने पंजाब में कितने ही कन्या विद्यालयों की स्थापना कर नारी शिक्षा पर बल दिया। स्वामी श्रद्घानंद हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष 1922ई. बने। अपने शुद्घि अभियान और कट्टर राष्ट्रवाद के कारण वह एक मुस्लिम की गोली का शिकार बने और 1926 ई. में इस असार संसार से चले गये।

पं. मदनमोहन मालवीय भी 1918 में इस संगठन के अध्यक्ष रहे थे। वह हिन्दू महासभा को एक राजनीतिक संगठन न बनाकर धार्मिक संगठन बनाये रखने के पक्षधर थे। परंतु वह स्वामी श्रद्घानंद के शुद्घि आंदोलन के कट्टर समर्थक थे।

हिंदू महासभा के एक महान नेता जगदगुरू शंकराचार्य जी कूत्र्तकोटि जी ने 1924 ई. के प्रयाग अधिवेशन में ‘हिंदू सभा पत्र’ निकालने का प्रस्ताव पास कराया। स्वामी श्रद्घानंद जी महाराज ने अछूतों के उद्घार के लिए उन्हें मंदिरों में प्रवेश दिलाने की बात शिमला में स्पष्ट कर दी थी। हिंदू महासभा ने इस कार्य के लिए अपनी ओर से स्वामी जी को ही अधिकृत किया।

1925 ई. में हिंदू महासभा का राष्ट्रीय कार्यालय हरिद्वार से दिल्ली स्थानांतरित कर लिया गया। इस कार्य में लाला लाजपत राय की विशेष भूमिका रही थी। इस कार्यालय में संगठन की प्रथम बैठक 15, 16 मई 1925 को आहूत की गयी थी। इस अधिवेशन में देवता स्वरूप भाई परमानंद, पं. मदनमोहन मालवीय, स्वामी श्रद्घानंद, पं. दीनदयाल शर्मा, हरिस्वरूप शास्त्री, राय साहब, केदारनाथ, प्रो. जीवन शंकर याज्ञिक, पं. छविनाथ पांडे, मुकुट बिहारीलाल आदि नेताओं ने भाग लिया था।

हिंदू महासभा ने देश को मुस्लिम साम्प्रदायिकता से ही नही चेताया अपितु देश में फेेलती जा रही ईसाई मिशनरियों के मंतव्य पर भी चिंता प्रकट की। ईसाई मिशनरीज के विरूद्घ सन 1927 में हिन्दू महासभा के नेता पं. मदनमोहन मालवीय ने प्रमुखता से आवाज उठायी थी।

देवता स्वरूप भाई परमानंद और डा. शिवराम मुंजे ने साईमन कमीशन का विरोध न करने का निर्णय लिया था, क्योंकि वह इस कमीशन की इस संस्तुति को उचित मानते थे कि 250 निर्वाचन क्षेत्रों में से 150 हिन्दुओं को तथा 75 सीटें मुसलमानों को दी जा रही थीं। कालांतर में कांग्रेस द्वारा कमीशन का विरोध करने पर हिंदुओं को 105 सीटें ही मिलीं, और कांग्रेस उन्हें ही पाकर चुप हो गयी।

1928 ई. में महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. शिवराम मुंजे थे। उन्होंने सिंध का विभाजन करने की ब्रिटिश योजना का डटकर विरोध किया था। उनके पश्चात संगठन के नेता पद को भाई परमानंद ने सुशोभित किया। जिनके काल में महासभा राष्ट्रवाद की ध्वजावाहिका, धर्म की प्रचारिका, इतिहास की संरक्षिका और मानवता की संवाहिका बनकर भारत के राजनीतिक गगन मंडल पर स्थापित हुई।

सन 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए हिंदू महासभा ने पं. नानकचंद एन.सी. केलकर, राजा नरेन्द्र नाथ और तत्कालीन कार्यवाहक अध्यक्ष डा. मुंजे को प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया। पं. नानकचंद और एन.सी. केलकर किन्हीं कारणों से नही जा सके थे, तो गोलमेज सम्मेलन में अन्य दो नेताओं ने पार्टी का मंतव्य रखा। यहां डा. मुंजे ने मुस्लिम लीग के जिन्नाह की साम्प्रदायिक मांगों के सामने सीना तानकर खड़े हो गये थे। यही कारण था कि हिंदू महासभा ने ही पाकिस्तान की मांग का भी पहले दिन से ही विरोध किया।

1933 ई. में हिन्दू महासभा का दिल्ली स्थित महासभा भवन बनकर तैयार हुआ। लाला जुगलकिशोर ने इस भवन के निर्माणार्थ उस समय 70,000 रूपया दान दिया था। इससे पूर्व हिंदू सेवाश्रम दिल्ली की स्थापना 1932 ई. में हो गयी थी। पार्टी ने देश में चाहे प्राकृतिक आपदायें आयीं या मानवीय आपदायें आयीं सदा ही मानवता की सेवा को अपना सर्वोत्तम कत्र्तव्य समझा। बिहार भूकंप हो या कोई ऐसी अन्य घटना सब स्थानों पर संगठन ने सदा ही मानवता की सेवा की।

1937 ई. में स्वातंत्रय के प्रचेता और राष्ट्रवाद के प्रणेता, हिंदुत्व के ध्वजवाहक, और हिंदू धर्म के प्रसारक, हिंदू इतिहास के व्याख्याता और हिंदू संस्कृति के प्रचारक और उद्भट प्रस्तोता स्वातंत्र्य वीर सावरकर का प्रादुर्भाव संगठन के लिए हुआ। जिन्होंने कहा था कि-”जब तक मेरे देह में रक्त की एक बूंद भी शेष है, मैं अपने को हिंदू कहूंगा और हिंदुत्व के लिए सदा लड़ता रहंूगा।” 23 दिसंबर 1910 को उन्हें दो जन्मों का कारावास (55 वर्ष) हुआ था। 1937 ई. में वह रिहा हुए। हिंदू महासभा के नेता भाई परमानंद उन्हें महासभा में ले आए। उन्होंने कांग्रेस के नेहरू का प्रस्ताव ठुकराकर महासभा में आना उचित समझा। 30 दिसंबर 1937 ई. को महासभा के 19वें अधिवेशन में उन्हें भाई परमानंद ने पार्टी का अध्यक्ष बनाया। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, तथा हिन्दुत्व को नई परिभाषा दी।

उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा था कि –

आसिन्धु सिन्धु यस्य पर्यन्ता भारत भूमिका।

पितृभू: पुण्य भूश्चैव सर्वंवैहिन्दू रीति स्मृत:।।

उनका मानना था कि वह प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू कहलाने का अधिकारी है जो कि भारतवर्ष को अपनी पुण्य भू: व पितृभू: मानता और स्वीकार करता है। उन्होंने मुस्लिमों के साम्प्रदायिक आधार पर आरक्षण या तुष्टिकरण का विरोध किया और कांग्रेस तथा ब्रिटिश सत्ताधीशों को इस कार्य के लिए समय-समय पर खरी खोटी सुनाईं। उन्होंने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध किया। उन्होंने सदा ही गांधी के लचीले राष्ट्रवाद को देश के लिए उचित नही माना। सावरकर ने हिंदू महासभा को और भी प्रखरता प्रदान की। हिंदुओं को कांग्रेस की राष्ट्रवादी नीतियों से अवगत कराया।

नागपुर अधिवेशन में (1938 ई.में) संगठन की नियमावली में कुछ संशोधन किये गये। इसके अनुसार हिन्दू समाज के सभी अंगों को संगठित करना, हिंदू हितों को आगे बढ़ाना और उनकी रक्षा करना, अस्पृश्यता निवारण, हिंदू नारी का उत्थान, गोरक्षा को प्रोत्साहन देना, हिंदुओं की शारीरिक शक्ति को बढ़ाना, सैनिक शिक्षा देना, सैनिक विद्यालय खोलना, सैनिक स्वयं सेवकों की स्थापना करना, हिंदुओं में सैनिक भाव भरना, धर्मान्तरित हिंदुओं को पुन: गले लगाना, अनाथ बच्चों व निराश्रित स्त्रियों के लिए अनाथालयों एवं वनिताश्रमों की स्थापना करना। भारत में साम्प्रदायिक सदभाव उत्पन्न करना, राष्ट्रवाद को प्रबल करना इत्यादि को इनमें स्थान दिया गया।

वीर सावरकर के ओजस्वी भाषण को सुनकर ही 1938 ई. में डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा में आये थे। जो कि स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में हिंदू महासभा के प्रतिनिधि के रूप में उद्योग मंत्री बनाये गये थे। उन्होंने ही कश्मीर में ”दो निशान, दो प्रधान, दो विधान” की नीति का विरोध किया और इस राष्ट्रघाती कृत्य के विरोध में 1953 ई. में अपना बलिदान दिया था। 29-30वें अधिवेशन में वे संगठन के अध्यक्ष बनाये गये थे। हिंदू महासभा के झण्डा को सावरकर ने कुण्डलिनी कृपाणांकित गेरूवा ध्वज ‘हिंदू राष्ट्र ध्वज’ कहकर पुकारा।

हिंदू महासभा ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लिया है। नागरी हिंदुस्तान की लिपि हो। हिंदू महासभा ने देश के विभाजन का पहले दिन से विरोध किया। किंतु कांग्रेस ने 3 जून 1947 को ब्रिटिश सत्ताधीशों के साथ बैठकर देश का बंटवारा स्वीकार कर लिया। हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग को राष्ट्रघाती कहा और कांग्रेस को उसकी नीतियों की समर्थक एवं ब्रिटिश सत्ताधीशों को लीग के पोषक एवं संरक्षक के रूप में स्थापित किया,…. और देश के विभाजन का सच भी यही है। आर.एस.एस प्रारंभ में हिंदू महासभा का एक अद्र्घ सैनिक संगठन था। यह संगठन डा. हेडगेवार जी ने स्थापित किया था। सावरकर जी की प्रेरणा से इस  संगठन ने काफी विस्तार किया। परिस्थितियों के क्रूर प्रवाह ने 1951 ई. में डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे लेागों को संगठन से दूर कर दिया और उन्होंने बलराज मधोक के साथ जनसंघ की स्थापना की। इसी जनसंघ से भाजपा का सन 1980 में  जन्म हुआ, जो आज केन्द्र में सत्तासीन है।

वीर सावरकर गांधीजी के सत्याग्रह के स्थान पर शस्त्राग्रह और नेहरू के शांतिवादी बनने के लिए ‘बुद्घ नही युद्घ’ की बात कहा करते थे। उनका यह चिंतन देश के लिए कितना उपयुक्त था? यह परिस्थितियों ने स्पष्ट कर दिया। सावरकर जी ‘हिंदू, हिंदी, हिन्दुस्थान’ के उपासक थे। वह ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण’ करने के पक्ष में थे। भारतीय राष्ट्र की उन्नति के लिए यही आवश्यक भी है।

हिंदू महासभा देश की आर्थिक नीतियों की कौटिल्य के अर्थशास्त्र से संचालित करने की पक्षधर है, जबकि राजनीति को मनुस्मृति के आधार पर तथा औद्योगिक नीति को विश्वेश्वरैया की मनुष्य, माल, मुद्रा, मशीन, प्रबंध शक्ति और मांग इन सातों (मैन, मैटीरियल, मनी, मशीन, मैनेजमेंट, मोटिव पॉवर एण्ड मार्केट के सेवन एवं प्रिंसीपल) रू के आधार पर चलाना चाहती है।

शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति को सहिष्णु और नैतिक बनाना वह आवश्यक मानती है। देश में समान नागरिक संहिता, लागू करने की पक्षधर है, गौ को तुरंत राष्ट्रीय प्राणी घोषित कराना चाहती है, संविधान के उन अनुच्छेदों की विरोधी है जिनसे देश में सामाजिक समरसता उत्पन्न करने या राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में समस्याएं आयी हैं।

महासभा हिंदी को राजभाषा का स्तर देना चाहती है, उसके पश्चात देश की अन्य भाषाओं का विकास भी वह आवश्यक मानती है। देश की विदेश नीति की पूर्ण समीक्षा की पक्षधर है। भारत को विश्वगुरू बनाना अपना ध्येय मानती है, इसलिए धर्म संस्कृति तथा इतिहास को लेकर एवं वैचारिक क्रांति उत्पन्न कर भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को मानवतावादी बनाकर आरोपित करना वह समय की सबसे बड़ी आवश्यकता मानती है।

इसके अध्यक्ष पद को जिन प्रभावशाली व्यक्तियों ने सुशोभित किया है। उनमें महाराजा मणीन्द्र चंद नंदी, पं. मदनमोहन मालवीय, श्रीमंत राजा रामपाल सिंह, स्वामी श्रद्घानंद, शंकराचार्य डा. कुत्र्तकोटि, श्री एन.सी. केलकर, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय, राजा नरेन्द्र नाथ, डा. बी.एस. मुंजे, रामानंद चटटोपाध्याय, श्री विजय राम राघवाचार्य, भाई परमानंद, भिक्षु उत्तम, शंकराचार्य भारतीय कृष्ण तीर्थ, वीर सावरकर, डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, लक्ष्मण बलवंत भोपटकर, डा. एन. बी. खरे, श्री एन.सी चटर्जी, प्रो. रामसिंह,प्रो बीजे देशपांडे, महंत दिग्विजय सिंह, श्री एन.एन. बनर्जी, श्री ब्रज नारायण ब्रजेश, श्री एस.आर. दांते, श्री विक्रम नारायण, सावरकर, श्री बालाराव सावरकर, श्रीशिवचरण, श्री दिनेश चंद्र त्यागी इत्यादि सम्मिलित हैं। हिंदू महासभा भविष्य में अपनी नीतियों को यदि जन-जन तक यथा स्वरूप पहुंचाने में सफल हो जाती है तो निश्चय ही उसका भविष्य उज्ज्वल है। इसकी प्रचण्डता में देश भी अखण्डता का मूलमंत्र छिपा है।

इसकी नीतियों में देश का सर्वग्राही और सर्वतोन्मुखी विकास छिपा है, इसके इतिहास में देश के भविष्य की तड़प है, और वर्तमान की पुकार है। इसके चिंतन को समझने की आवश्यकता है।

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