आप करुणाशास्त्री हैं या अर्थशास्त्री?

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले की एक पंचायत के दो सरपंच और छह पंचायत सचिवों को गिरफ्तार किया गया है। क्यों किया गया है? क्योंकि ‘मनरेगा’ के नाम से बंटनेवाली सरकारी खैरात के 5.39 करोड़ रु. पर उन्होंने हाथ साफ कर लिया है। कई बैंक अधिकारियों की भी जांच चल रही है। गरीब मजदूरों को बंटनेवाली इस खैरात में घपले का यह पहला मामला नहीं है। अनेक अन्य राज्यों से भी ऐसी खबरें आती रही हैं। ग्रामीण मज़दूरों को साल में 100 दिन रोजगार देने और 137 रु. रोजाना के हिसाब से मेहनताना दिलाने वाली इस सरकारी योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है।

इस योजना से कुछ जिलों में अच्छा काम हुआ है और कई ग्रामीण परिवारों की भुखमरी भी दूर हुई हैं। 645 जिलों में चल रही इस योजना के अन्तर्गत 3 लाख करोड़ रु. बंट गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 7 लाख परिवारों को रोजगार मिला है। ये तो सरकारी आंकड़े हैं लेकिन असलियत क्या है? असलियत यह है कि यह योजना ग्रामीण मजदूरों को रोजगार नहीं देती है। यह उन्हें बेकारी भत्ता देती है याने यह बेकारी को आमदनी का अच्छा स्त्रोत बना देती है। बेकारी का महिमा मंडन करती है। बेकारी में निहित स्वार्थ पैदा करती है। यदि ऐसा नहीं होता तो बताइए कि अरबों रु. खर्च करके पिछले आठ साल में सरकार ने कौन से पुल बनवा दिए, नदियां और तालाब खुदवा दिए, बाग-बगीचे लगवा दिए, पशुशालाएं खुलवा दीं, ग्रामीण बस्तियां बसवा दीं, जिन्हें हम उल्लेखनीय कह सकें? अरबों रु. खर्च हो गए और ऐसा कुछ नहीं बना, जो लंबे समय तक गांवों के लिए लाभदायक हो। लोगों को बेकारी भत्ता देने की बजाय सरकार कुछ बड़ी योजनाएं बनातीं और उनमें लाखों लोगों को जुटा देती तो बड़े-बड़े निर्माण-कार्य भारत के हर जिले में हो जाते। जो लोग वहां काम करते, उन्हें 137 रु. की बजाय सरकार 250 रुपए रोज भी दे सकती थी। उन्हें भी यह नहीं लगता कि वे बेगार काट रहे हैं। उनका आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास भी बढ़ता। वे नई-नई दक्षता अर्जित करते।

लेकिन देखिए, कितनी विडंबना है? महात्मा गांधी के नाम पर शुरु हुई योजना देशव्यापी भ्रष्टाचार का स्त्रोत बन गई है। बड़वानी की छोटी-सी सेंधवा पंचायत में अगर अधिकारी लोग 5-6 करोड़ रु. डकार सकते हैं तो देश के अन्य बहुत पिछड़े और बड़े-बड़े जिलों में क्या हुआ होगा? ये अधिकारी सोचते हैं कि जो सरकारी पैसा बेगार में बांटा जा रहा है, उसे हम ही क्यों न ले ले? जिन्हें यह पैसा दिया जाता है, वे रजिस्टर पर सिर्फ दस्तखत ही तो करते हैं। ऐसे दस्तखत हम ही क्यों न कर दें?

इस योजना की दुर्दशा से मोदी सरकार अवगत है। इसीलिए उसने घोषणा की है कि फिलहाल वह इसे सिर्फ 200 जिलों तक सीमित कर देगी। अनेक नामी अर्थशास्त्री इसका विरोध कर रहे हैं। अर्थशास्त्रीगण यदि करुणा से प्रेरित होकर ऐसा कर रहे हैं, तो उनकी बात समझ में आती है लेकिन मैं पूछता हूं कि वे करुणाशास्त्री हैं या अर्थशास्त्री? अर्थशास्त्र तो यही कहता है कि पैसा वहीं लगाओ, जहां से उसका ठोस परिणाम आए। इस योजना के ठोस परिणाम सरकार को 2009 के चुनाव में मिले। वे राजनीतिक परिणाम थे। लेकिन 2014 के चुनाव में वे ठोस परिणाम भी खोखले सिद्ध हो गए। 132 रु. रोज की बेगारी को लोगों ने अपना जन्म-सिद्ध अधिकार समझ लिया। करुणा का तत्व ही अंतध्र्यान हो गया।

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