भूत-प्रेत बनते हैं अफसरी भूत पालने वाले

आजकल सभी को अफसरी का जबरदस्त भूत सवार है। अफसरी का किसी पद से कोई सरोकार नहीं है बल्कि वे लोग हैं जो खुद कुछ करना न जानते हैं, न चाहते हैं लेकिन प्रदर्शित ऎसे करते हैं जैसे कि सर्वज्ञ, संप्रभुतासम्पन्न, सर्वव्यापी, सर्वप्रिय और सर्वोत्कृष्ट हैं और भगवान ने दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए ही पैदा किया हुआ है।

अफसरी का तात्पर्य अपने आप को बड़ा दिखाने और मनवाने से भी है। खूब सारे लोग समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में इस किस्म के हैं जिन्हें लोग व्यंग्यपूर्वक लाटसाहब भी कहते हैं और इनके द्वारा कारित कर्मों को लाटसाहबी कहते रहे हैं।

इन लाट साहबों का वजूद हर जगह पसरा हुआ है। कई लोग किसी न किसी पॉवर के मारे लाटसाहब बने हुए फब रहे हैं, खूब सारे दूसरों की पॉवर के बूते अपने रंग जमा रहे हैं तो कई सारे ऎसे हैं जो जनरेटरों की क्षमता के अनुरूप मौके-बेमौके अपने-अपने लाटसाहबी फन आजमा रहे हैं।

हम सबकी सबसे बड़ी समस्या या दुविधा यही है कि हममें से कोई भी इंसान सहज और आम नहीं रहना चाहता, सब चाहते हैं कि ऎसे बनें या दर्शाएं कि दूसरे लोग उन्हें खास अंदाज में आदर-सम्मान से नवाजें और हर तरफ वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता रहे।

इस छोटी सी आशा की पूर्ति के लिए लोग आजकल जाने क्या-क्या नहीं कर गुजर रहे। कोई औंधे मुँह लेटकर साष्टांग दण्डवत कर हाँ-जी, हाँ-जी और यस सर-यस सर की सांगीतिक ध्वनियों पर खुद ब खुद वाद्य बना हुआ नाच-गा रहा है, कोई ऎसे पसर कर अपने आपको समर्पित कर रहा है जैसे कि भगवान ने इन्हीं की सेवा के लिए धरती पर भेजा है, इसके सिवा दुनिया में इनके लिए न कोई काम शेष बचा है, न इनमें करने की कुव्वत है।

लोग अपने तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने और संबंधों को भुनाने के लिए आजकल जो कुछ करने लगे हैं, जो कुछ सादर समर्पित कर प्रसन्नता और सुकून का अनुभव करने लगे हैं, उसने इंसान को किसी गुमटी या दुकान से ज्यादा कुछ नहीं रहने दिया है जहाँ पूरी जिन्दगी एक व्यापार से ज्यादा कुछ नहीं है जिसमें नफा-नुकसान के आगे नाते-रिश्ते, घर-परिवार और कौटुम्बिक रिश्ते और सभी प्रकार के संबंध गौण हैं।

हर संबंध मुनाफे तक चलता है और काम पूरा हो जाने के बाद अपने-आप ऎसे समाप्त हो जाता है जैसे कि एक-दूसरे को पहचानते तक न हों। अफसरी भूत से लवरेज लोगों की यह नायाब किस्म ऎसी ही है कि उसका साफ मानना है कि यह पूरा जगत और तमाम जीव उनकी सेवा-चाकरी के लिए ही पैदा हुए हैं और इनसे किसी भी रास्ते का इस्तेमाल कर सेवा लेना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, भले ही यह समझदार लोगों की निगाह में शोषण माना जाए।

अफसरी भूतों के लिए अपनी दुनिया अलग ही हो जाया करती है जहाँ मानवीय संवेदनाओं, मूल्यों और नैतिकताओं के लिए कोई स्थान नहीं है। हर काम में इंसान को भुनाने और भूनने की कलाओं का खुलकर इस्तेमाल करने का कौशल ही वह धुरी है जिस पर सभी प्रकार के संबंध टिकने लगे हैं। फिर इसमें स्वाँग रचने का सामथ्र्य और हुनर आ जाए, तो बेहतर अभिनय के साथ अफसरी भूतों का नाच-गान यौवन पर रहने लगता है।

खुद भी अच्छा-खासा मनोरंजन कर लिया करते हैं और दूसरे लोग भी। अफसरी भूतों का सबसे बड़ा हुनर इसी में है कि वे हमेशा निर्देशक, अभिनेता या उपदेशक की भूमिका में रहते हैं, खुद परिश्रम करने से बचते हैं और दूसरों से यह अपेक्षा करते हैं कि दिन-रात कोल्हू के बैलों की तरह चलते रहें या कुलियों की तरह वज़न लादकर इधर-उधर दौड़भाग करते रहें बस।

अफसरी भूत जमीन से ऊपर उठे हुए होते हैं। इन्हें तोकने के लिए तोकेश्वरों की जरूरत पड़ती है और कहारों की भी। सवारी के लिए गधे चाहिए होते हैं या कि खच्चर, जिन पर विराजमान रहकर अफसरी भूतों का कारवाँ परिभ्रमण करता रहकर हर तरफ अपनी कृपा या क्रूर दृष्टि फेंक सकें।

इन भूतों की आँखों में तक में सोनोग्राफी की क्षमता होती है जिसके जरिये यह जान लेते हैं कि किन तिलों में कितना तेल है, कौन कितना दानी-मानी या कृपण है, किसके दिल में क्या है और किसे किस तरह वशीभूत किया जा सकता है, कौन किससे मानने वाला है।

 अफसरी भूत पालने वाले यानि की परिश्रम और पुरुषार्थ से दूर भागे हुए लोगों के जीवन निर्वाह का अचूक रामबाण है औरों का अपने हक़ में भरपूर उपयोग करना।  जो यह कला सीख जाता है वह जमाने भर के लिए चन्द्रगुप्त हो जाता है।

अफसरी भूतों का जीवन अपने आप में किसी मायावी संसार से कम नहीं होता जहाँ दिखता और दिखाया जाता कुछ और है, हकीकत कुछ और।  जो जैसा दिखता है वैसा होता नहीं, सिर्फ भ्रम पैदा करने के लिए आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ जीने और दिखाने की कोशिश करता है।

जो जितना अधिक कुरूप होता है उसे अपने आपको सुन्दर दिखाने के लिए उतने ही फैशनी रसायनों को चुपड़ने की जरूरत होती है, यही लागू होता है इस प्रजाति पर भी। पुरुषार्थ और परिश्रम से दूर औरों के बूते जिन्दगी भर शहंशाह रहने वाली इस प्रजाति के लोग उत्तरार्ध में अलग ही प्रकार का जीवन व्यतीत करने को विवश रहते हैं।

वार्धक्य के बावजूद इन लोगों की ऎषणाओं की फेहरिश्त कम नहीं होती है। इन ऎषणाओं का जंजाल इन्हें हमेशा ऎसा सताये रखता है कि अपनी यात्रा पूरी कर चुकने के बाद भी अतृप्त वासनाओं के साम्राज्य में इन्हें भूत-प्रेत के रूप में चक्कर काटने को विवश होना पड़ता है। अपने आपको सेवक मानकर जीवन निर्वाह करने वाले लोग खुद भी प्रसन्न रहते हैं और दूसरों को भी इनका सान्निध्य आनंददायी लगता है।

जो लोग अनासक्त रहकर अपने कर्मयोग को पूरा करते हैं, लोक मंगल की निष्काम भावना से काम करते हैं,  सेवा और परोपकार में रमे रहते हैं वे ही बच पाते हैं प्रेतयोनि से।

अपने आपको वर्तमान में रखें, वर्तमान के प्रति प्रेम, करुणा और दया का भाव रखें और यह कोशिश करें कि लोग हमें अफसरी भूतों के रूप में न जानें बल्कि सच्चे हितैषी, सेवक और सहयोगी के रूप में जानें-पहचानें।

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