ढोंगी संत धराशायी हो गया

हरियाणा सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय बधाई के पात्र हैं। यदि उन्होंने धीरज और संयम से काम नहीं लिया होता तो बरवाला के सतलोक आश्रम की मुठभेड़ में सैकड़ों लोग मारे जाते। रामपाल के आश्रम में  तैयारी उतनी घातक तो नहीं पर उसी तर्ज पर थी, जो 1984 में भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर में कर रखी थी। महीनों तक चलने वाली रसद, रिवाॅल्वर, बंदूकें, बम-गोले और तेजाब की बोतलें क्या-क्या नहीं मिला है, रामपाल के आश्रम से! रामपाल ने पुलिस पर हमला बोलने के लिए सेवानिवृत्त फौजियों की सेना भी खड़ी कर रखी थी। घायलों के इलाज के लिए पूरे अस्पताल जैसी तैयारी थी। 16 एकड़ के इस किलेनुमा आश्रम को रामपाल ने छोटे-मोटे राज्य में बदल दिया था। इस लघु-राज्य के महान राजा की तरह वह शासन और अदालत दोनों को खुली चुनौती देता था। उसके अनुयायी उसे ‘परमात्मा’ कहकर पुकारते थे। अदालत के कठोर आदेश के बावजूद वह 17-18 दिन तक राज्य सरकार को ब्लैकमेल करता रहा। वकीलों ने कहना शुरू कर दिया था कि रामपाल को कोर्ट के सामने पेश करना अब असंभव हो गया है। कोर्ट में उसकी पेशी के पहले उसके हजारों समर्थक अदालत और जजों को घेर लेते थे, लेकिन अब खट्‌टर सरकार की चतुराई के आगे रामपाल को भीगी बिल्ली बनना पड़ा। वह दुम दबाए अदालत पहुंच गया और सिर झुकाए कठघरे में खड़ा रहा। ढोंगी संत धराशायी हो गया।

 वह संत या ‘परमात्मा’ होता तो कुछ चमत्कार तो दिखाता। चलो चमत्कार न सही, यदि उसमें जरा-सी भी बहादुरी होती तो पुलिस से लड़ते-लड़ते जान दे देता। यदि वह सचमुच अध्यात्म-पुरुष होता तो आमरण-अनशन करके प्राण त्याग देता। यदि उसमें जरा भी शर्म होती तो वह जहर खाकर सो जाता, लेकिन अपने आपको संत कहने वाला यह व्यक्ति कितना डरपोक और कायर निकला। उसने दो हफ्ते तक अपने भोले भक्तों को तोप का भूसा बना दिया। उन्हें सशस्त्र पुलिस का सामना करने के लिए तैनात कर दिया। उन्होंने पुलिस को डराने-धमकाने की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने ‘रक्तहीन क्रांति-सी’ कर दी। जो छह लोग मारे गए हैं, वे मुठभेड़ के शिकार नहीं मालूम पड़ते हैं। वे भगदड़ या उस आश्रम के रहस्यमय कारनामों की बलि चढ़े हैं।  रामपाल का यह आश्रम है या किसी अय्याश सामंत का विलास-महल! उस आश्रम के सामने आए चित्रों-ब्योरों पर कौन विश्वास करेगा कि यह किसी संत का निवास है? अपने आप को महान संत कबीर का अवतार कहने वाले इस व्यक्ति के जीवन में कबीर का रत्तीभर भी अस्तित्व नहीं है। कबीर ने साधु या संत किसे कहा है? संत वह है, जो अकेला चलता है। वह हजारों हथियारबंद लोगों को जमा नहीं करता है। कबीर के शब्दों में ‘सिंहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहीं पांत। लालों की नहिं बोरियां, साधु चले न जमात।।’’

 हजारों चेले-चेलियों को अपने चक्कर में फंसाए रखने वाला कोई व्यक्ति क्या सच्चा साधु हो सकता है? अपनी पूजा करवाना इन साधुओं की सबसे बड़ी वासना होती है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वे जादू-टोने, चमत्कार, झाड़-फूंक, हाथ की सफाई, तंत्र-मंत्र और ज्योतिष आदि कई तिकड़मों का सहारा लेते हैं। रामपाल भी इन तिकड़मों का उस्ताद है, यह उसके गिरफ्तार चेलों के बयानों से पता चलता है। किसी को संयोगवश कोई फायदा हो जाता है, तो वह इन गुरुओं, संतों और बाबाओं को भगवान मानने लगता है। और वे गुरु सब बात समझते हुए भी सचमुच यह मानने लगते हैं कि वे भगवान हैं और अलौकिक शक्तियों के स्वामी हैं। इन स्वामियों, साधुओं, गुरुओं की पोल महर्षि दयानंद सरस्वती ने अब से डेढ़ सौ साल पहले जमकर खोली थी। उन्होंने देश में सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया था। वे स्वाधीनता-संग्राम के पितामह थे। आर्यसमाज के संस्थापक थे। उनके महान ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर रामपाल ने अनर्गल टिप्पणियां की थीं। हरियाणा के आर्य समाजियों ने उनका करारा जवाब दिया था।

 रामपाल के ढोंगीपन को उजागर करने के कारण ही 2006 में हरियाणा के आर्य समाजियों और रामपाल के अंधभक्तों में जमकर मुठभेड़ हुई थी। उसमें एक व्यक्ति की हत्या भी हुई थी। इसी हत्याकांड के सिलसिले में रामपाल ने 43 बार अदालत के वारंट की अवमानना की। उसने राज्य नामक संस्था को नकार दिया। उसने अपने भाषणों और पर्चों में जजों पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए और यह भी कहा कि उसे अदालत में घसीटने वाले जज ने उससे रिश्वत मांगी थी। उसे रिश्वत नहीं देने के कारण ही उसकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिए गए।

 वास्तव में हरियाणा सरकार ने रामपाल को क्या पकड़ा, सभी ढोंगी साधुओं और संतों को यह चेतावनी दे दी है कि उन्हें कानून का उल्लंघन करने की छूट नहीं दी जा सकती। इस कार्रवाई के बाद अब सरकार को चाहिए कि इस तरह के साधुओं, संतों और बाबाओं के आश्रमों, उनके आय-व्यय, उनके पाखंडों और उनके पट-शिष्यों पर कड़ी निगरानी रखे। जो सच्चे साधु और संत हैं, वे तो इस तरह की निगरानी का स्वागत करेंगे। उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता। उनका जीवन खुली किताब की तरह होता है। साधु और संत का वेश धारण करके जो लोग अनैतिक और अवैध धंधों में लिप्त रहते हैं, उनके पास हमारे कई नेतागण कतार लगाए रखते हैं, क्योंकि उनके लिए ये तथाकथित साधु वोट और नोट के मुख्य स्रोत होते हैं। अनैतिक और अवैध धंधों से जमा होने वाले मोटे पैसे और साधनों के आते ही ये सर्वस्व त्यागी साधु राजनीति में हस्तक्षेप करने लगते हैं। ये साधु जो नेताओं के गले के हार बनते हैं, उन्हें उनके गले का सांप बनते देर नहीं लगती।

ये ही साधु भिंडरावाला, रामपाल, आसाराम के रूप में पकड़े जाते हैं। अपराधी नेताओं को काबू करना तो आसान होता है, लेकिन धर्म की ओट में अपराध करने वाले लोग कहीं अधिक शातिर होते हैं। रामपाल की धूर्तता का आप जरा अंदाज लगाएं। वह रोज दूध से नहाता था और उस दूध की खीर का प्रसाद भक्तों में बांटा जाता था। ऐसी धूर्तता कानून के डंडे से नहीं रोकी जा सकती, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा, लेकिन इसी धूर्तता के आधार पर ये ढोंगी साधु राजद्रोह करने का दुस्साहस करने लगते हैं। अकेले हरियाणा में एक नहीं, कई रामपाल हैं। सारे देश में ये फैले हुए हैं। जहां-जहां अज्ञान है, असुरक्षा है, अभाव है, वहां-वहां रामपाल हैं।

ऐसे धूर्त संतों के विरुद्ध सबसे पहले सच्चे संतों को अपना शंखनाद करना होगा। वे लिहाज करेंगे तो वे अपने ही कुनबे को बदनाम होने में मदद करेंगे। महर्षि दयानंद ने अगणित आक्रमण सहे और अंत में विषपान भी किया, लेकिन अपनी पाखंड खंडिनी पताका को कभी झुकने नहीं दिया। दूसरा, समाज-सुधारक संस्थाओं को ऐसी ढोंगियों के विरुद्ध खुले-आम अभियान चलाना चाहिए। जो राजनेता इन ढोंगियों से अपना उल्लू सीधा करते हैं, उनकी कड़ी निंदा करनी चाहिए। तीसरा, आसाराम और रामपाल जैसे लोगों को जनता चाहे तो अपना ‘गुरु’ अवश्य धारण करे, क्योंकि उनके आचरण ने गुरुओं के पाखंड को बेनकाब कर दिया है। कबीर ने कहा भी है, सच्चा गुरु वही है, जो आंखें खोले।

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