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अटल को मिलना ही चाहिए भारत रत्न

नरेंद्र मोदी सरकार ने जैसे ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन (२५ दिसंबर) को सुशासन दिवस के रूप में मनाने की, राजनीतिक हलकों में उन्हें भारत रत्न देने की मांग ने एक बार फिर ज़ोर पकड़ लिया है| वैसे अटल बिहारी वाजपेयी को देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने की मांग कई वर्षों से हो रही है किन्तु इस बार भारतीय जनता पार्टी के केंद्र में सत्तासीन होने से वर्षों पुरानी इस मांग के पूरे होने के आसार बनते दिखाई दे रहे हैं| भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम कार्यकर्ता तक की भावना अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न प्राप्त करते देखने की है वहीं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने भी सरकार की इस मंशा पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी है| हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न की मांग पर कुछ दलों में मंथन चल रहा है कि इस विषय पर भाजपा का साथ दिया जाए या नहीं| दरअसल महान विभूतियों को भारत रत्न से सम्मानित करने के पीछे राजनीतिक दलों ने अपने हितों को जमकर भुनाया है| आपको याद होगा, पिछले वर्ष नवंबर २०१३ में क्रिकेट की महान हस्ती सचिन तेंदुलकर को कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने भारत रत्न देने का एलान किया था| तेंदुलकर पहले ऐसे खिलाड़ी बने जिन्हें इस सम्मान से नवाजा गया| इससे पूर्व खिलाड़ियों को भारत रत्न देने की प्रथा नहीं थी| इस परिपाटी ने उस वक़्त विवाद का रूप ले लिया था| हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग करने वाले संगठनों ने कांग्रेस सरकार के इस पैंतरे को युवाओं को लुभाने का जरिया माना था| इससे इतर समाज के कई तबकों से उनके अनमोल रत्नों को भारत रत्न की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया था|

 यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि भारत रत्न से जुड़े तत्कालीन विवाद को राजनेताओं ने भी खुलकर हवा दी थी| भारत रत्न को लेकर इस प्रकार की स्थितियां पूर्व में भी बनती रही हैं| जिन भी महान हस्तियों को भारत रत्न देने की मांग ज़ोर पकड़ती रही है; इसमें संदेह नहीं कि सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में नाम कमाया है और अपनी मेहनत और प्रतिभा को समाज के समक्ष अनुकरणीय रूप में प्रस्तुत किया है; किन्तु वर्ष में ३ से अधिक भारत रत्न नहीं के प्रावधान के चलते सभी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना असम्भव ही है| खैर यह तो हुई राजनीतिक मजबूरियों की बात किन्तु देखा जाए तो देश के इस सर्वोच्च सम्मान से साथ राजनीति और विवादों का चोली-दामन का जो साथ बन गया है वह इस सम्मान की प्रतिष्ठा के कतई अनुरूप नहीं है| फिर यह भी एक संयोग ही है कि भारत रत्न को लेकर जितने भी विवाद हुए; कमोवेश सभी कांग्रेस या इनकी समर्थित सरकारों के कार्यकाल में ही हुए| हो सकता है देश पर ६५ साल से सत्तासीन कांग्रेस पार्टी ने राजनीतिक हित-लाभ के चलते इन पुरुस्कारों की महत्ता को कमतर किया हो, किन्तु ऐसा होना नहीं चाहिए था| विवादों का सरताज बन चुके भारत रत्न को कम से कम राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए था| इस सम्मान से जुड़े विवादों को निश्चित रूप से राजनीति ने ही हवा दी है|

उदहारण के लिए, देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पं. जवाहरलाल नेहरू को १९५५ में ही भारत रत्न दे दिया गया, वहीं उनके समकक्ष और लौहपुरुष के नाम से विख्यात स्व. वल्लभभाई पटेल को १९९१ में इस सम्मान का हकदार समझा गया| यह कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि जिन पटेल ने नेहरू के साथ मिलकर देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए तमाम कुर्बानियां दी, उन्हें भारत रत्न मिला भी तो नेहरू परिवार की तीसरी पीढ़ी के राजीव गांधी के साथ| क्या यह सरासर राजनीति नहीं है? बिल्कुल है और कांग्रेस का इतिहास इस तरह की राजनीतिक चालों का साक्षी रहा है| देश के सर्वोच्च सम्मान को तो कम से कम राजनीतिक चालबाजियों से मुक्त रखना ही चाहिए क्योंकि इस तरह के विवाद देश के सर्वोच्च सम्मान की विश्व पटल पर प्रासंगिकता कमतर करते हैं| सम्मानित कोई हस्ती हो पर विवाद से उसकी मेहनत और कर्मठता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है| फिर यदि सिफारिशों या दवाब की राजनीति करके भारत रत्न दिलवाए जाने लगें तो यकीन मानिए २६ जनवरी और १५ अगस्त को भारत रत्न लेने वालों की लाइन लग जाएगी| खैर, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरह सरकार हर मुद्दे पर बेबाकी से राय रख रही है, उससे ऐसा लग रहा है कि इस बार का भारत रत्न सम्मान निर्विवाद हो सकता है| वैसे भी अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा ही नहीं, अपने विपक्षियों में भी बेहद सम्मानित थे| उनकी स्पष्टवादिता, सहृदयता और कवित्व के सभी कायल थे| लंबे और निर्विवाद राजनीतिक जीवन के लिए नए-नवेले राजनेता उन्हें अपना आदर्श मानते हैं| अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न मिलना उस सम्मान का गौरव ही होगा| बिरले ही अटल बिहारी वाजपेयी जैसी लोकप्रियता हासिल कर पाते हैं और उस लोकप्रियता को सम्मान तो मिलना ही चाहिए|

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