भारत का संविधान और वैदिक धर्म, दर्शन-संस्कृति

inm_21012_p_consitutionप्रो. राजेन्द्र सिंह

विगत एक सहस्र वर्ष से भारतवर्ष को वह बनाने की निरंतर चेष्टा की जा रही है जो इस सर्व प्राचीन राष्ट्र की सहज प्रकृति से कतई मेल नही खाता। विदेशी आक्रांता शासकों ने इस देश के मूलभूत स्वरूप को मिटाने के लिए बृहद हिंदू समाज पर अनगिनत अत्याचार किये थे। समय पाकर यह राष्ट्र विदेशी शासकों की शारीरिक दासता से तो मुक्त हने गया किंतु मानसिक पराधीनता बनी रहने के कारण दुर्भाग्य ने इसका साथ न छोड़ा। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि विदेशी शासकों का स्थान अब उन जैसी मानसिकता वाले देशी शासकों ने ले लिया।

शारीरिक रूप से स्वाधीन हो चुके भारत का संविधान मूलत: अंग्रेजी भाषा में लिखित है। बाद में जब इसका हिंदू अनुवाद किया गया, तब तक उसमें अनेक संशोधन किये जा चुके थे। संशोधित संविधान का यह अनुवाद ‘भारत के राजपत्र’ (असाधारण भाग 2 अनुभाग 1क, खण्ड 24, संख्यांक 7, दिनांक 23 अगस्त 1988 ईसवी) के पृष्ठ 289 से 481 पर प्रकाशित हुआ था। ”भारत का संविधान” (1 सितंबर 1991 को यथा विद्यमान) में और इसके आगामी संशोधित संस्करणों में इसी हिंदू अनुवाद का प्रयोग किया गया है। इसकी उद्देशिका में प्रयुक्त धर्म पद मूलत: अंग्रेजी में लिखित संविधान में आए फेथ शब्द का वाचक है। इसी प्रकार आर्टिकल 15 में प्रयक्त अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का भी हिन्दी अनुवाद धर्म किया गया है।

यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि पाश्चात्य जगत में जिस भाव से फेथ और रिलीजन शब्दों का प्रयोग होता है, भारतीय बहुसंख्यक जनमानस में धर्म शब्द का वह भावार्थ कदापि नही लिया जाता। हिंदी के शब्दों का आश्रय लेकर पाश्चात्य भावों को भारतीय संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करना वस्तुत: एक बहुत बड़ा छल है और यह भ्रामक अनुवाद के माध्यम से किया गया है।

हिंदी में प्रयुक्त होने वाला धर्म शब्द मूलत: वैदिक भाषा का शब्द है। ब्रह्मा के मानस पुत्र और शिष्य स्वायम्भुव मनु का स्पष्ट कथन है कि ब्रह्मा ने सब पदार्थों के नाम-संज्ञाएं शब्दों के पृथक-पृथक-कर्म-अर्थ (यास्कीय निरूक्त 1/21 में कर्म शब्द अर्थ का वाचक है) और शब्दों की पृथक संस्था (विभक्ति वचनों के रूप में) ये सब वेद शब्दों के आधार पर ही निर्धारित किये (मनुस्मृति 1/21) यहन्ी बात महाभारत शांतिपर्व 232 /24-26 में भी कही गयी है। इस प्रकार ब्रह्मा ने दैवी वाक अर्थात वेदवाणी का आश्रय लेकर लोक व्यवहार को सुचारू रूप से चलाने के उद्देश्य से एक संपर्क भाषा का परिश्रम पूर्वक विकास किया। मनुष्य मात्र का हित साधने वाली यह संपर्क भाषा मानुषी वाक व्यावहारिकी और लोकसभा कहलायी। कालांतर में यही संस्कृति के नाम से लोकप्रिय हुई। हिंदी को इसी संस्कृति की पुत्री होने का गौरव प्राप्त है।

वेदमयी दैवीवाक संस्कृत और हिंदी इन तीनों संबंधी भाषाओं में प्रयुक्त होने वाला धर्म शब्द अपना एक परंपरागत अर्थ रखता है। भारतीय संविधान के हिंदी अनुवाद में इस सुदीर्थ परंपरा से प्राप्त अर्थ की सर्वथा अवहेलना हुई है। अत: परंपरा के विरूद्घ किये गये मनमाने अर्थ को आधार बनाते हुए फेथ और रिलीजन शब्दों के अनुवाद के रूप में पहन्ले तो धर्म का भ्रामक प्रयोग करना और फिर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते रहना नितांत असंगत है। शब्दार्थ की भारतीय परंपरा के अनुसार धर्म शब्द सारे ब्राह्माण्ड को धारण करने वाले महासामथ्र्यशाली व्यापक तत्व का वाचक है। तैत्तीरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद से संबद्घ ) 10/63 में स्पष्ट लिखा है धर्मों विश्वस्य जगत प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति, धर्मेण पापमयनुदन्ति, धर्मे सर्व लोक में धर्मिष्ठ प्रजाएं ही आगे बढ़ती हैं, धर्म शील रहने से पाप दूर होते हैं, धर्म में सब कुछ प्रतिष्ठित है, इसलिए धर्म को परमश्रेष्ठ कहते हैं।

भारतीय दृष्टि में धर्म वस्तुत: परब्राह्म की चिदशक्ति है। सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म की इस चिद शक्ति को वैदिक भाषा में प्राण कहते हैं। सृष्टि का निर्माण करते समय पर ब्रह्म सबसे पहले अपनी चिदशक्ति प्राण को प्रकट करता है। इस संदर्भ में प्रश्नोपनिषद में बताया गया है कि परमात्मा से यहन् प्राण प्रकट होता है उसने प्राण को प्रकट किया। आत्मन एषप्राणो जायते स प्राणमसृजत। छान्दो ग्योप निषद में लिखा है कि सबसे पहले प्रकट होने के कारण् प्राण निश्चय ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च यह प्राण प्रकृति रूपी उपादान करण के तत्व रज और तम नामक त्रिगुणों की साम्यावस्था को अपनी महान सामथ्र्य से भंग करके, विषमावस्था को प्राप्त हुई प्रकृति से विश्व का निर्माण करता है। इसी कारण कठोपनिषद में स्पष्ट लिखा है कि इस जगत में किंचित मात्र भी जो कुछ है, वह सारा प्राण के स्पंदन से नि:सृत है यदिदं किंच जगत्सर्व प्राण एजति निसृतम। स्वयं वेदवपाणी भी ऐसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ प्राण को नमन करने का उपदेश देती है जिसके वश में सारा विश्व है जो प्रकट होकर सबका ईश बना हुआ है और जिस प्राण में सब कुछ प्रतिष्ठित है (प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्व प्रतिष्ठतम।। अर्थवेवद 11/4 /1) यही प्राण अपने महान सामथ्र्य से चूंकि सारे ब्रह्माण्ड और तदन्तर्गत प्रजाओं को भली भांति धारणा करता है इसलिए यह धर्म कहलाता है (धारणाद धर्ममिथ्याहुर्मिण विधृता: प्रजा:) य स्याद धारणसंयुक्त: स धर्म इति निश्चय:।। महाभारत शांति पर्व 109/11।

क्रमश:

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş