संदर्भ: संविधान दिवस –  संविधान का मर्म समझना ही सामाजिक समस्याओं का हल 

images (65)


न राज्यं न च राजासीत् , न दण्डो न च दाण्डिकः । स्वयमेव प्रजाः सर्वा , रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ 

न राज्य था, ना राजा था, न दण्ड था, न दण्ड देने वाला था. संवेदनशील राज्य की संवेदनशील जनता स्वयं सारी प्रजा ही एक-दूसरे की रक्षा करती थी. यही संविधान का या क़ानून का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए.  इस बात को बाबा साहेब आंबेडकर व हमारी संविधान लेखन समिति इतनी भली भांति समझ चुकी थी कि उन्होंने भारतीय संविधान के प्रत्येक अक्षर, शब्द और वाक्य को  अद्भुत जीवंतता व संवेदनशीलता से सराबोर कर दिया था. कितने दुखद आश्चर्य का विषय है कि भारत में संविधान तो था पर संविधान दिवस नहीं था. 1915 में बाबासाहेब की 125 वें जयंती वर्ष में बाबासाहेब के सम्मान में 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाना देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र जी मोदी ने प्रारंभ किया. बाबासाहेब अम्बेडकर देश के स्वतंत्रता संघर्ष के कालखंड से ही देश में कांग्रेस की राजनीति का शिकार रहे थे. स्वतंत्रता के बाद भी कांग्रेस ने बाबासाहेब को देश में वह स्थान नहीं मिलने दिया जिसके वह वास्तविक अधिकारी थे. जिस संविधान सभा में बाबासाहेब को उनके श्रेष्ठतम कानूनी विशेषज्ञ होने के कारण स्वाभाविक ही शीर्ष स्थान मिलना चाहिए था उस संविधान सभा में स्थान बनाने हेतु उन्हें किस किस प्रकार के संघर्ष करने पड़े यह किसी से छूपा नहीं है. संविधान सभा में सम्मिलित होने के बाबासाहेब के संघर्षों को विफल करने हेतु कांग्रेस ने किस प्रकार षड्यंत्र किए और प्रत्येक प्रकार के नैतिक अनैतिक षड्यंत्र किए यह भी समूचा देश जानता है. 

              2015 में बाबासाहेब की 125 वीं जयंती के अवसर पर नरेंद्र जी मोदी ने बाबासाहेब के सम्मान में नाना प्रकार के आयोजन, कार्यक्रम किए गये. इसी तारतम्य में 26 नवंबर को प्रतिवर्ष संविधान दिवस मनाना भी प्रारंभ किया गया. 26 नवंबर 1949 को देश की संविधान सभा ने अपने संविधान को अंगीकार किया था अतः बाबासाहेब के सम्मान में इस दिन को संविधान दिवस के रूप में चुना गया.  

सामाजिक समरसता के अग्रदूत, संविधान के शिल्पकार, भारत रत्न डाॅ.भीमराव आम्बेडकर जी ने सामाजिक असमानता को दूर करने तथा वंचित वर्गों को सामाजिक न्याय दिलाने के उद्देश्य से भारत के संविधान में अनेक प्रावधान किए. भारतीय संविधान के निर्माण में अतुलनीय उनके योगदान के लिए देशवासी सदैव उनके प्रति कृतज्ञ रहेंगे. हमारे संविधान में समरसता के तत्व को इस प्रकार सम्मिलित करना की किसी भी वर्ग की भावनाएं व हित आहत न हो, ऐसा बाबासाहेब ने ही सुनिश्चित किया था.

             हमारे संविधान में तीन तरह के संवैधानिक प्रावधान हैं – एक – आरक्षण के जरिये पंचायतों से संसद तक जनता और समुदाय का प्रतिनिधित्व का अधिकार मिलना ताकि उनका सशक्तिकरण हो सके; दो- क़ानून के जरिये हर तरह के सामाजिक-आर्थिक व्यवहार में छुआछूत और भेदभाव को ख़तम करना; तीन- वंचित समुदायों को सक्षम बनाने के लिए आरक्षण के माध्यम से शिक्षा के समान नहीं, बल्कि बेहतर और अतिरिक्त अवसर मिलना. इन तीन प्रावधानों में ही भारतीय संविधान के सामाजिक समरसता व सामाजिक समानता के प्राण निहित हैं. 

              थामस जेफरसन के विधिज्ञान व दार्शनिकता दोनों का अनुसरण करते हुए भारतीय संविधान को एक पुस्तक नहीं अपितु उसे एक जीवंत, संवेदनशील ईकाई बनाने में बाबासाहेब की भूमिका अविस्मर्णीय रही है. भारत के संविधान को एक चरित्र और जीवन्तता देने में डा. अम्बेडकर की भूमिका सबसे अहम् रही. 

        आरक्षण के संदर्भ में भारतीय समाज में आज भी जो एक प्रकार की विचित्र दृष्टि है उसे बाबासाहेब स्वतंत्रता पूर्व के कालखंड में ही समाप्त कर देते यदि नेहरू जी उन्हें कांग्रेस की राजनीति में अलग थलग करने के दुष्प्रयास न करते. आरक्षण के माध्यम से समानता के भाव को शेष देश व समाज की भावनाओं के साथ सावधानीपूर्वक एक सांचे में ढालने का कार्य बाबासाहेब ही कर सकते थे.  कांग्रेस के उनके प्रति दुर्व्यवहार ने बाबासाहेब के हृदय में नाना प्रकार कि आशंकाएं भर दी थी. 

                    नेहरुनीत कांग्रेस ने बाबासाहेब को संविधान सभा में जाने से रोकने की हर मुमकिन कोशिश की. अम्बेडकरजी की समाज सुधारक वाली छवि कांग्रेस के लिए चिंता का कारण थी, इससे नेहरूजी को भारत में उनकी बौद्धिक प्रासंगिकता ही संकट में दिखने लगती थी. यही कारण है कि नेहरुनीत कांग्रेस ने उन्हें संविधान सभा से दूर रखने की योजना बनाई. संविधान सभा में भेजे गए शुरुआती 296 सदस्यों में आश्चर्यजनक तरीके से बाबासाहेब का नाम नहीं था. बाबासाहेब कांग्रेस के झांसे में आकर सदस्य बनने के लिए मुंबई के अनुसूचित जाति संघ का साथ भी नहीं ले पाए थे. तत्कालीन मुंबई के मुख्यमंत्री बीजी खेर ने कांग्रेस से मिले संकेतों के आधार पर सुनिश्चित किया कि बाबासाहेब सदस्य न चुने जाएं. अंततः येन केन प्रकारेण दलित नेता जोगेंद्रनाथ मंडल के प्रयासों से वे संविधान में सम्मिलित हो पाए थे. 

                नेहरूजी बाबासाहेब से इतने भयभीत रहते थे व राजनैतिक रूप से उन्हें उलझाए रखने में इतने धारदार बने रहते थे कि उन्होंने चार हिंदू बहुल जिलों को कुटिलतापूर्वक पाकिस्तान की भेंट चढ़ाने में भी कोई संकोच नहीं किया. बाबासाहेब को चुनने वाले चार हिंदू बहुल जिलो को नेहरू ने पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया. परिणामस्वरुप बाबासाहेब इस आधार पर  भारतीय संविधान सभा की उनकी सदस्यता रद्द हो गई और वे पाकिस्तान के सदस्य कहलाए. अंततः बाबासाहेब ने नेहरूजी द्वारा उत्पन्न की जा रही तमाम बाधाओं को पारकर किसी प्रकार से राजनैतिक दबाव बनाकर संविधान सभा की सदस्यता प्राप्त की थी. 

                बाद में नेहरू सरकार द्वारा अनुसूचित जाति क्षेत्र की सतत उपेक्षा के कारण ही बाबासाहेब ने सितंबर 1951 में नेहरू कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया. नेहरू सरकार से उनके त्यागपत्र का एक बड़ा कारण हिंदू कोड बिल भी था. 1947 में प्रस्तुत हिंदू कोड बिल हिंदू समाज हेतु व विशेषतः उसकी आन्तरिक एकात्मता की रक्षा हेतु एक मील का पत्थर सिद्ध होता किंतु इसे कांग्रेस द्वारा विफल किया गया. यहां यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि कांग्रेस बाबासाहेब के इस बिल को पारित कराने हेतु उन्हें वचन भी दे चुकी थी. बाद में इस घटना को बाबासाहेब ने कांग्रेस की आत्मघाती घटना कहा था और आज उनकी कही वह बात चरितार्थ हो रही है. बाबासाहेब ने कहा कि प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद ये बिल संसद में गिरा दिया गया. इसके विपरीत देश की यशस्वी मोदी सरकार ने अपने मंत्रिमंडल में १२ अनुसूचित जाति के मंत्री बनाकर बाबासाहेब की भावनाओं का सम्मान किया है. आज देश के तीन महामहिम राज्यपाल अनुसूचित जाति से हैं. 

                            संविधान व संविधान के मर्म के प्रति देश की मोदी सरकार ने जितने सम्मान व आग्रह का प्रदर्शन किया है वह कोई अन्य सरकार नहीं कर पाई. कितने आश्चर्य की बात है कि देश में सात दशकों तक संविधान दिवस ही नहीं था. कांग्रेस ने आपातकाल लगाकर, कश्मीर में अस्थायी अनुच्छेद ३७० को स्थायी करके, अनेकों लोकतांत्रिक राज्य सरकारों को अनैतिकतापूर्वक धारा ३५६ से हटाकर कई अवसरों पर संविधान विरोधी कार्य किए हैं. मोदी जी ने अनुच्छेद ३७० हटाकर एक देश एक संविधान की संकल्पना को स्थापित किया.  

आज देश की मूल आवश्यकता ही यह है कि हम अपने संविधान के प्रति संपूर्ण निष्ठा, आस्था व समर्पण के साथ अपने सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक जीवन में समानता, समरसता व शुचिता को अपने अपने जीवन बाबासाहेब की भावनाओं के अनुरूप चरितार्थ करें. 

• लालसिंह आर्य 

लेखक भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. 

Comment:

vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betnano giriş
vdcasino
Vdcasino giriş
vdcasino giriş
ngsbahis
ngsbahis
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
damabet
casinofast
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vdcasino
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
truvabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
venusbet giriş
venüsbet giriş
venusbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
ultrabet giriş
ultrabet giriş
betnano giriş