Categories
भारतीय संस्कृति

चाणक्य नीति के अनुसार पारदर्शी प्रशासन


उगता भारत ब्यूरो

चाणक्यकालीन भारत गणतांत्रिक राजतन्त्र था। विश्व इतिहास में ऐसे कम उदाहरण मिलते हैं जिनमे राजतन्त्र को देश और राज परिवार के आय व्यय का लेखा-जोखा जनता के सामने प्रस्तुत करना पड़ता रहा हो। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस बात की व्यवस्था है कि राजा के महामात्य और प्रधान अधिकारी आय-व्यय और राज्य भण्डार में रखी चीजों (जिसे नीवी कहा गया है।) का सही व्यौरा और जनता के समाने रखें। इस सम्बन्ध में झूठे तथ्य या प्रचार करने वालों के लिए दण्ड के प्रावधान भी थे।
अर्थशास्त्र में लेखा-जोखा निदेशक (चीफ/एकाउंटेट) को अक्षपटल अध्यक्ष, लेखा ऑफिस को अक्षपटल, हिसाब किताब लिखने वालों को कार्णिक, बही-खातों को निबन्ध पुस्तक की संज्ञा दी गयी है। हिसाब किताब रखने के लिए एक केन्द्रीय ऑफिस और सभी विभागों के अपने ऑफिसों के लेखा अधिकारी और कार्णिकों की नियुक्ति और उनकी जिम्मेदारियों का अर्थशास्त्र में विशद वर्णन है। निबन्ध पुस्तक कैसे बनायी जाय, उनमें किन किन मदों में कितना धन आया और कितना खर्च हुआ, उसको निर्धारित समय सीमा में लिखा जाय, नकद, सोना, चांदी, अन्न और विभिन्न तरह की प्राप्त वस्तुओं का पूरा ब्यौरा दिया जाय, समय समय पर हिसाब किताब की जांच की जाय। लेखा-जोखा में जान बूझकर छेड़छाड़ एवं गलत आंकड़े लिखने वालों, सरकारी धन का दुरुपयोग करने वालों, खजांचियों द्वारा समय के अन्दर धन राशि जमा न करने वालों और धोखाधड़ी करने वाले कार्णिकों और अधिकारियों को दण्डित करने की व्यवस्था का विस्तृत ब्यौरा अर्थशास्त्र में मिलता है.
लेखा कार्यालय के निर्माण के बारे में अर्थशास्त्र में निर्देश दिया गया है कि उसके दरवाजे पूरब या उत्तर दिशा में हों, अधिकारियों और लेखा कर्मियों के बैठने की उचित व्यवस्था हो, लेखा पुस्तकों के रखने के निर्धारित जगह हो अध्यक्षों की नियुक्ति के बारे में कहा गया है कि एक ही काम करने वालों के बीच से अध्यक्ष उसी को चुना जाय जो सबसे अधिक गुणी, निपुण और प्रतिष्ठित हो। कार्य की दुरुहता और महत्व के अनुसार अध्यक्षों को तीन श्रेणी में बाटा गया है- उत्तम, मध्यम और निकृष्ट जिनके आधार पर नियुक्तियों का प्रावधान है। सभी श्रेणी के लोगों के चरित्र और उनके पूर्व कार्यकलापों की जांच नियुक्ति के पहले की जानी चाहिये और सबके कामों पर निगरानी रखनी चाहिये। अध्यक्षों के वेतन के बारे में कहा गया है कि जिन अध्यक्षों ने पूरे वर्ष काम किया है, वे अधिक वेतन के अधिकारी है। जो लेखा वर्ष के मध्य में आए है, वे कम वेतन के पात्र है। तीन सौ चौवन दिनों का एक कर्म संवत्सर निधारित किया गया जिसकी समाप्ति अषाढ़ पूर्णिमा को होती थी। कर्मचारियों के काम की रिपोर्ट के लिए रजिस्टर की व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें नियमित रूप से सूचना दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। कर्मचारियों की कार्य व्यवस्था की जानकारी के लिए गुप्तचरों के प्रावधान की बात भी कही गयी है।
निबन्ध पुस्तक (एकाउंट बुक्स) के बारे में अर्थशास्त्र में जो निर्देश हैं, उनमें प्रमुख है – आय-व्यय के स्थान, समय, कारण मात्रा, स्रोत, अधिकारियों के नाम, धन के अभाव, जो वस्तुएं आयी हैं या दी गयी हैं, उनकी गुणवत्ता, माप तौल, कीमत, लाने और देने वालों के नाम, बची वस्तुओं और भण्डार के अधिकारी एवं संरक्षक के नाम आदि के विवरण। रजिस्टर में खाने इस प्रकार बनाए जाएं, जिससे उपरोक्त सभी विवरण व्यवस्थित रूप से लिखे जा सकें और जांचे जा सकें। लेखा पुस्तक, रजिस्टर आदि में आंकड़े दर्ज करने वाले के आचार-विचार और व्यवहार पर निगरानी रखे जाने की बात भी कही गयी है।
हिसाब किताब नियमित रूप से लिखने, सरकारी धन कोषाध्यक्षों और कर्मचारियों द्वारा समय सीमा के अन्दर जमा करने एकाउंट बुक्स निर्धारित समय और स्थान पर जांच के लिए प्रस्तुत करने सम्बन्धी निर्देश स्पष्ट और सख्त है, जिनका उल्लघन दण्डनीय अपराध माना गया है। हिसाब प्रतिदिन, प्रति पांच दिन, प्रतिपक्ष, प्रतिमास, प्रतिचार मास एवं प्रतिवर्ष के अन्तराल पर दर्ज होने चाहिए। एकाउंट्स के बारे में राजा को अवगत कराने की जिम्मेदारी अक्षपटल अध्यक्ष की होती है। क्षेत्रीय अध्यक्ष अक्षपटल अध्यक्ष को पूरी जानकारी देते हैं, हिसाब किताब में किसी तरह की गड़बड़ी के लिए सम्बांधित कार्णिक और अधिकारी जिम्मेदार होते है और दण्ड के पात्र होते है।
हिसाब किताब लिखने, रखने और देने में जो अनियमिततायें, गलतियां और धोखाधड़ी होती है, उसके कारणों का विश्लेषण भी अर्थशास्त्र में मिलता है। कौटिल्य ने इनके छह प्रमुख कारण गिनाये है – अज्ञान, आलस्य, प्रभाव, काम, क्रोध, पर्व और और लोभ जो धनोत्पादन में विघ्न पैदा करते हैं, जानकारी का अभाव, आलस्य के कारण परिश्रम से कतराना, वासना में लिप्त रहना, निन्दा, अधर्म और अनर्थ से भय खाना, किसी पर विशेष कृपा करना, नियमों को भूल कर किसी को लाभ पहुंचाना या किसी से नियम विरुद्ध लाभ लेना, क्रोधवश होकर क्रूरता पर उतर आना, राज प्रिय होने या विद्या और धन के अभिमान में अवैध काम करना, दूसरों पर दबाव बढ़ाना, व्यवसायियों से नाप-तौल और लेन-देन सम्बंधी मामलों में निजी लाभ कमाना आदि कारणों से एकाउंट्स और राजकोष विभाग के कर्मचारी और अधिकारी गड़बड़ी और धोखाधड़ी करते हैं। इनको रोकने के लिए दण्ड की व्यवस्था दी गयी है।
हिसाब किताब की गोपनीयता के विषय में भी स्पष्ट निर्देश है। आय-व्यय का ब्यौरा देने और सरकारी धन जमा करने आए कर्मचारियों को एक-दूसरे से तब तक मिलने और बातचीत करने से मना किया जाय जब तक कि वे हिसाब जमा नहीं करा देते। विभागीय अधिकारी द्वारा बताए गए आय से यदि लेखा पुस्तक में कम या अधिक रकम लिखी है तो इसकी तुरंत जांच की जाय। ऐसी अनियमितता के लिए आठ गुणा तक जुर्माना की व्यवस्था है। द्रव्य की वसूली करने वाले कर्मचारी यदि निर्धारित समय सीमा में वसूली न कर पायें तो उन्हें एक मास का समय दिया जा सकता है। यदि राशि बहुत छोटी है तो पांच दिन के समय की व्यवस्था है। यदि बढ़ी समय सीमा के अन्दर भी कर्मचारी रकम वसूल न कर सकें तो उस पर प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना वसूल किया जाय। एकाउंट्स क्लर्क यदि आये धन को रजिस्टर में दर्ज न करे अथवा किसी भी तरह की अनियमितता करे तो उसके लिए कठिन सजा का प्रावधान है।
कर्मचारियों एवं अधिकारियों को गड़बड़ी और धोखाधड़ी के लिए कितना दण्ड दिया जाय, इस पर कौटिल्य अर्थशास्त्र में प्राचीन मनीषियों के विचारों का भी उल्लेख है। आचार्य मनु, पाराशर, वृहस्पति और शुक्राचार्य के विचारों को उद्धृत करने के बाद कौटिल्य ने इस विषय पर अपनी मान्यता लिखी है। आचार्य मनु के अनुयायियों के अनुसार जो कर्मचारी जिस कारण अपराध करता है, उसे सजा भी वैसी ही मिलनी चाहिए। जैसे जो कर्मचारी आलस्यवश अनियमितता करता है तो नुकसान हुए धन का दुगना उससे वसूल किया जाय जबकि प्रमाद के कारण हुए नुकसान का तिगुना लिया जाय। आचार्य पाराशर के अनुयायियों के अनुसार कारण चाहे जो भी हो, सारे अपराधों के कारण नुकसान हुई राशि का आठ गुना दण्ड के रूप में लिया जाय। आचार्य बृहस्पति के अनुयायियों के अनुसार दण्ड की रकम नुकसान हुए धन का दस गुना होना चाहिये जबकि शुक्राचार्य के अनुयायी मानते हैं कि दण्ड की रकम नुकसान का बीस गुना होना चाहिए।
आचार्य कौटिल्य का मानना है कि दण्ड अपराध के अनुसार ही होना चाहिये। इसलिए उन्होंने हिसाब लिखने, रखने तथा देने, वसूल की गयी रकम जमा करने सम्बन्धी अनियमितताओं, धोखाधड़ी और जानबूझकर राज्य का नुकसान पहंचाने सम्बन्धी विभिन्न अपराधों के लिए अलग-अलग दण्ड की व्यवस्था की है। अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखकर दण्ड दिया जाय, जैसे क्रम के विरुद्ध उससे प्रकट कर विपरीत लिख देना, किसी वस्तु को बिना ठीक से समझे-बुझे लिख देना, एक ही वस्तु को दुबारा लिख देना जैसी अनियमितता पर जो दण्ड लगे, नीवी (बचा हुआ सरकारी धन) के हिसाब की गड़बड़ी पर नुकसान का दूना दण्ड लिया जाय। सरकारी धन का अपराध करने वाले से आय-व्यय का पांच गुना और गबन करने वाले से गबन की गई रकम का आठ गुना वसूल किया जाय। झूठ बोलने वाले को वैसी ही सजा दी जाय जो चोर को दी जाती है। छोटी-मोटी अनियमितता या अपराध को क्षमा किया जा सकता है। जैसे अध्यक्ष की गलती से सरकारी खाते का कोई नुकसान नहीं हुआ अपितु पहले से कुछ अधिक धन आ गया तो उसे दण्डित न किया जाय।
सरकारी हिसाब किताब रखने का तरीका, कर्मचारियों कोषाध्यक्षों और अधिकारियों की जिम्मेदारी से और जनता के प्रति उनके उत्तरदायित्व और हिसाब लिखने, रखने तथा देने में हुई अनियमितताओं और अपराधों के लिये दण्ड और सरकारी खजाने की भरपाई के सम्बन्ध में कौटिल्य अर्थशास्त्र में दी गयी व्यवस्था आज भी प्रासांगिक है और देश के नीति निर्धारकों के लिए मार्गदर्शक है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş