देश के धर्म-स्थलों पर हादसों में बदलते धार्मिक मेले

fairप्रमोद भार्गव
देश के धर्म स्थलों पर लगने वाले मेले अचानक टूट पडऩे वाली भगदड़ से बड़े हादसों का शिकार हो रहे हैं। नतीजतन श्रृद्धालु पुण्य लाभ कमाने के फेर में आकस्मिक मौतों की गिरफ्त में आ रहे हैं। इस क्रम में नया हादसा आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में पुष्करालू उत्सव में स्नान के दौरान घटा। गोदावरी नदी के पुष्कर घाट पर यह उत्सव बारह दिन तक चलता है। लेकिन प्रत्येक 144 साल बाद महा पुष्करालू उत्सव आयोजित होता है,जिसे दक्षिण का कुंभ कहा जाता है। जाहिर है,इस उत्सव में पुण्य कमाने की दृष्टि से लाखों श्रद्धालु भागीदारी करते हैं। यह घटना इसलिए घटी,क्योंकि करीब आधे घंटे पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने तट पर स्नान किया था। इनकी सुरक्षा के लिए सामान जन को रोक दिया गया था। लिहाजा भीड़ इक_ी हो गई। और जब दोनों मुख्यमंत्री स्नान के बाद लौट गए तो भीड़ को एक साथ घाट पर जाने के लिए छोड़ दिया गया। स्नान करने की जल्दी में कुछ महिलाओं के सीढिय़ों से पैर फिसल गए,नतीजतन भगदड़ मच गई जिसमें 13 महिलाओं समेत 29 लोगों की मौत हो गई।
हमारे देश में धर्म-लाभ कमाने की प्रकृति से जुड़े हादसे अब हर साल देखने में आ रहे है। इस क्रम में मध्यप्रदेश के सतना जिले के प्रसिद्ध तीर्थस्थल चित्रकूट में कामतानाथ मंदिर की परिक्रमा करते हुए अचानक भीड में भगदड़ मच जाने से 10 श्रृद्धालुओं की मौत हो गई थी। मध्यप्रदेश में ही इस घटना के पहले दतिया जिले के प्रसिद्ध रतनगढ़ माता मंदिर में नवमीं पूजा के दौरान आस्था के सैलाब में पुल टूटने की अफवाह से मची भगदड़ से 115 लोग मारे गए थे। इसी मंदिर में 3 अक्टूबर 2006 को शारदेय नवरात्रि की पूजा के दौरान 49 श्रद्धालू मारे गए थे। फरवरी 2013 में इलाहबाद के कुंभ मेले में बड़ा हादसा हुआ था, जिसमें 36 लोग मारे गए थे। मथुरा के बरसाना और देवघर के श्री ठाकुर आश्रम में मची भगदड़ से लगभग एक दर्जन श्रद्धालु मारे गए थे। करीब पांच साल पहले विश्व में षांति और सद्भावना की स्थापना के उद्देश्य से हरिद्वार में गायत्री परिवार द्वारा आयोजित यज्ञ में दम घुटने से 20 लोगों के प्राणों की आहुति लग गई थी। महज भगदड़ से अब तक ढाई हजार से भी ज्यादा भक्त मारे जा चुके हैं। बावजूद लोग हैं कि दर्शन, श्रद्धा, पूजा और भक्ति से यह अर्थ निकालने में लगे हैं कि इनको संपन्न करने से इस जन्म में किए पाप धुल जाएंगे, मोक्ष मिल जाएगा और परलोक भी सुधर जाएगा। गोया, पुनर्जन्म हुआ भी तो श्रेष्ठ वर्ण में होने के साथ समृद्ध व वैभवशाली भी होगा।
देश में हर प्रमुख धार्मिक आयोजन छोटे-बड़े हादसों का शिकार होता जा रहा है। 1954 में इलाहबाद में संपन्न हुए कुंभ मेले में एकाएक गुस्साये हाथियों ने इतनी भगदड़ मचाई थी कि एक साथ 800 श्रद्धालु काल-कवलित हो गए थे। धर्म स्थलों पर मची भगदड़ से हुई,यह सबसे बड़ी घटना है। सतारा के मांधर देवी मंदिर में मची भगदड़ में भी 300 से ज्यादा लोग असमय काल के गाल में समा गए थे। केरल के सबरीवाला मंदिर, जोधपुर के चामुण्डा देवी मंदिर, गुना के करीला देवी मंदिर और प्रतापगढ़ के कृपालू महाराज आश्रम में भी मची भगदड़ों में सैंकड़ों लोग मारे मारे जा चुके हैं। बावजूद अब तक के हादसों में देखने में आया है कि भीड़ प्रबंधन के कौशल में प्रशासन – तंत्र न केवल अक्षम साबित हुआ है,बल्कि उसकी अकुशलता के चलते हजारों लोग बेमौत मारे गये हैं।
भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही ह्रै। जिसके चलते दर्शनलाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाले भगदड़ों का सिलसिला जारी है। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें। किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती। इसलिए उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अकसर देखने में नहीं आती। लिहाजा आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेश बेकाबू ही नहीं हुए होते?
हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विशेष पर्वों के अवसर पर एक साथ तीन-तीन करोड़ तक लोग एक निश्चित समय के बीच स्नान करते हैं। किंतु इस अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि शासन-प्रशासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े हाते है। बावजूद लपरवाही बरतना हैरान करने वाली बात है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौशल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देशों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रशिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया किसी अन्य देश में किसी एक दिन और विशेष मुहूर्त के समय लाखों-करोडों की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं जा सकती ? बावजूद हमारे नौकरशाह भीड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण लेने खासतौर से योरुपीय देशों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रशिक्षण विदेशी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देशज ज्ञान और अनुभव से लिखने होंगे।

प्रशासन के साथ हमारे राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी सितारे और आला अधिकारी भी धार्मिक लाभ लेने की होड़ में व्यवस्था को भंग करने का काम करते हैं। इनकी वीआईपी व्यवस्था और यज्ञ कुण्ड अथवा मंदिरों में मूर्तिस्थल तक ही हर हाल में पहुंचने की रुढ़ मनोदशा, मौजूदा प्रबंधन को लाचार बनाने का काम भी करती है। नतीजतन भीड़ ठसाठस के हालात में आ जाती है। ऐसे में कोई महिला या बच्चा गिरकर अनजाने में भीड़ के पैरों तले रौंद दिया जाता है और भगदड़ मच जाती है। गोदावरी तट पर घटी घटना एक साथ दो मुख्यमंत्रियों के स्नान के लिए रोक दी गई भीड़ का परिणाम है। विशिष्ट लोगों को दर्शन या स्नान कराने की इस रूढ़ संस्कृति पर रोक नहीं लगती है तो यह हादसे रुकने वाले नहीं हैं। हालांकि कभी-कभी गहने हथियाने के नजरिए से भी बदमाश ऐसे हादसों को अंजाम देने का षड्यंत्र रचते हैं।

धार्मिक स्थलों पर भीड़ बढ़ाने का काम मीडिया भी कर रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया टीआरपी के लालच में इसमें अहम् भूमिका निभाता है। वह हरेक छोटे बड़े मंदिर के दर्शन को चमात्कारिक लाभ से जोड़कर देश के भोले-भाले भक्तगणों से एक तरह का छल कर रहा है। इस मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद धर्म के क्षेत्र में कर्मकाण्ड और पाखण्ड का आंडबर जितना बड़ा है, उतना पहले कभी देखने में नहीं आया। निर्मल बाबा, कृपालू महाराज और आशाराम बापू जैसे संतों का महिमामंडन इसी मीडिया ने किया था। हालांकि यही मीडिया पाखण्ड के सार्वजनिक खुलासे के बाद मूर्तिभंजक की भूमिका में भी खड़ा हो जाता है। निर्मल बाबा और आशाराम के साथ यही किया। मीडिया का यही नाट्य रुपांतरण अलौकिक कलावाद, धार्मिक आस्था के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविश्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईश्वरीय अथवा भाग्य आधारित अवधारणा को प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। दरअसल मीडिया, राजनेता और बुद्धिजीवियों का काम लोगों को जागरुक बनाने का है, लेकिन निजी लाभ का लालची मीडिया धर्मभीरु राजनेता और धर्म की आंतरिक आध्यात्मिकता से अज्ञान बुद्धिजीवी भी धर्म के छद्म का शिकार होते दिखाई देते हैं। जाहिर है धार्मिक हादसों से छुटकारा पाने की कोई उम्मीद निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रही है ? लिहाजा हादसों का दुर्भाग्यपूर्ण सिलसिला फिलहाल टूटता दिखाई नहीं देता।

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