जजमानी व्यवस्था बनाम बाजार

जजमानी व्यवस्था बनाम बाजार

“मतोली कोंहार खांचा भर दियली, कोसा, घंटी, खिलौना, गुल्लक लिए दरवाजे  बइठे  हैं। बच्चों की रूचि बार बार घंटी बजाने और मिटटी के खिलौनों को देखने और छूने  में है। बीच बीच में मतोली डपट लगाते जा रहे हां हां गदेला लोगन खेलौना  जादा  छू छा जिनि करा टूटि जाये । आवा  हे मलिकिनीया हाली हाली लेई देई ला लम्मे लम्मे बांटे के बा। अम्मा दियली वगैरह लेकर उसे सिराने चली जाती हैं। मतोली का नाती खेत में धान के बोझ गिनने गया है।”

मतोली शिल्पकार थे,वह खेती नही मिट्टी के बर्तन बनाते थे,पर उन्हें हर घर से अनाज, दूध, सामान समय समय पर मिलता रहता। फसलों के कटने का समय, शादी विवाह काज कोर्बद का समय, मतोली का हिस्सा सुरक्षित था।

ज्यादा पुरानी बात नही है, लगभग तीस साल पहले तक गांवों में जजमानी व्यवस्था विनिमय का आधार रही थी। वामपंथी से लेकर हर कोई बाजार की बुराइयों पर चिल्लाता है पर बाजारवाद के विकल्प के तौर पर हमारी पारंपरिक संरचना को स्वीकार करने को तैयार नही है। इसका एकमात्र कारण है हिंदुओं और उनके रीति तथा परंपराओं के प्रति जहर भरे होना। वैश्वीकरण ने स्थानीय व्यवस्थाओं को चौपट कर दिया। एक तरीके का घृणा भाव  लिए भूमंडलीकरण के अजगर ने बाजार के सहारे हमारी लोक संस्कृति को निगल लिया है।

मथुरा से जब अघासुर गोकुल आकर वहां  की गायें  को निगलना शुरू किया तो कन्हैया ने उसका वध कर दिया क्योंकि गायें ही अर्थव्यवस्था का आधार थीं।  आज गांवों को यह अघासुर निगल रहा है। गांवों की पहचान मर रही है ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रगति और परंपरा का समन्वय कर इस अजगर को समाप्त किया जाए नही तो कुछ नही बचेगा।

हमें यह व्यवस्था बचानी होगी उसे पुनर्जीवित करना होगा नही तो यह बाजार सब कुछ लील जाएगा। ध्यान रहे, वामी /अरबी गिरोह के लिए पूंजीवाद कोई मैटर नही करता वह हिंदू घृणा में इतने डूबे हैं कि वह पूंजीवाद को  अपना मित्र बना चुके हैं। यह काम हमें ही करना है।
✍🏻पवन विजय

अन्त में मेरा वही निवेदन जो गत कई दिनों के पोस्ट पर लगातार है, वही एक बार फिर से –

अभी त्यौहार शुरू हैं।
पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है। शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।
एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे, ढूंढिए कि आज वे किस स्थिति में है?
और  वर्षपर्यन्त तक, किसी को कोई रियायत नहीं। इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए! हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।

बस इतना करने का प्रयास कीजिए, शेष का मार्ग स्वयं स्पष्ट हो जाएगा –
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो.

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