क्या कांग्रेस सचमुच अपने आप में बदलाव करने को तैयार है ?

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जगदीश रत्तनाणी

कांग्रेस ही है जिसने देश को सोवियत संघ के तरीके वाली पंचवर्षीय योजनाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को सम्मानजनक ऊंचाइयां दीं और गरीबी की समस्या से निपटना शुरू किया। यह कांग्रेस ही थी जिसने तिजोरी खाली होते हुए भी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 1991 में ‘नव उदारवादी नीतियों’ पर चलने का मार्ग प्रशस्त किया। यह कांग्रेस ही हो सकती है जो हाशिए पर खड़े वर्गों की जरूरत और उनकी इच्छा-आकांक्षाओं के एजेंडे को फिर वापस ला सकती है। एक खुशनुमा पुनरुद्धार के लिए यह एक अच्छा मार्ग होगा।

पंजाब में कांग्रेस की असफलता सामने आ गयी है, लेकिन इसके साथ ही हाल के कई निराशाजनक वर्षों के बाद कुछ अच्छी बातें भी हुईं हैं- सौ साल से अधिक पुरानी पार्टी में कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी का आगमन और इसके साथ ही कुछ पुराने और बुजुर्ग नेताओं की बेचैनी से भरी विरोध की आवाजें। ये बातें मुख्य धारा में हाशिए पर जाती पार्टी में असहमति की आवाजें और बदलाव की जरूरत को दर्शाती हैं। आगामी विधानसभा चुनाव हों या उसके बाद आने वाले लोकसभा चुनाव, भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने में कांग्रेस असमर्थ एवं असहाय नजर आ रही है। विपत्ति पड़ने पर शांति की बनिस्बत अशांति बेहतर होती है और कोई बदलाव न होने की बजाय कोई भी परिवर्तन बेहतर होता है।

कांग्रेस में आगे बढ़ने का एक निर्धारित मार्ग है और वह है पार्टी के पहले परिवार के प्रति श्रद्धा; और श्रद्धा दिखाने का नाटक करना। एक बार यह करने के बाद पार्टी के बैनर तले राजनीति करने की आजादी है। सत्ता और सत्ता की शक्ति के रूप में मिलने वाला पुरस्कार इस सिस्टम को आगे जारी रखने में मदद करता है। यह उस समय तक चलता रहेगा जब तक गांधी परिवार में किसी को कुछ प्रदान करने या निकट भविष्य में कुछ देने का वादा करने की क्षमता रहेगी। इस समय जब पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के खेल में एक दावेदार के रूप में नज़र नहीं आ रही है तो उसका ढांचा चरमरा गया है। ‘हाईकमान’ की वैधता और विशेषज्ञता भी सवालों के घेरे में आ गई है।

पंजाब में हुई गलतियों के लिए जहां पूरा गांधी परिवार आलोचना का केंद्र बना हुआ है, वहीं कांग्रेस का शेष नेतृत्व भी ‘मिनी दरबार’ का समूह बना हुआ है। नेतृत्व के दूसरे स्तर के ये दरबारी अपने हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं और विशेषाधिकार कनेक्शन और सत्ता के खेल से जुड़े लोग हैं जो बिना कुछ ठोस काम किए हुए राजनीतिक पटल पर छाए हुए हैं। इनमें से कई लोग उच्च शिक्षित हैं परन्तु वे आम जनता की भाषा नहीं बोल सकते। ये लोग राजनीतिक सभाएं नहीं ले सकते हैं। ये लोग क्लब और टीवी स्टूडियो में खुद को ज्यादा आरामदेह स्थिति में पाते हैं। ये जड़ों से जुड़े हुए लोग नहीं हैं जहां मुद्दों पर निर्णय लिए जाते हैं। यह कटु सत्य है कि ‘गांधियों’ के नेतृत्व व नियंत्रण में कांग्रेस का जो पतन हुआ है उसमें इन मिनी नेताओं का भी अच्छा-खासा योगदान है।

दिल्ली में बैठे हुए इन नेताओं में से कोई भी जनता की इच्छा-आकांक्षाओं को पकड़ने में समर्थ नहीं है। वे राष्ट्र के सामने मौजूदा ज्वलंत समस्याओं को समझने-सुलझाने में विफल हैं और देश के ताने-बाने के लिए खतरा बनी चुनौतियों का सामना करने और इन परिस्थितियों को भीड़ के समर्थन और वोटों में बदलने की क्षमता नहीं रखते। वे कथित बुद्धिजीवियों की कल्पना को वोटों की आग में बदलने का माद्दा भी नहीं रखते हैं। क्या कांग्रेस में ऐसा कोई शख्स है जो वित्त, विदेश नीति, सुरक्षा और स्वास्थ्य के विषय पर विश्वसनीय आवाज हो? जब इन नामों को खोजते हैं तो ऐसे लोगों की सूची सामने आती है जो दूसरे दर्जे के दरबारी हैं, जो लंबे समय से सत्ता से जुड़े हैं और अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं तथा ज्यादातर नामों पर किसी न किसी रूप में दाग लगे हुए हैं।

कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी के कांग्रेस में आने से अगर यह संकेत मिलता है कि दूसरे स्तर के नेताओं को हटाया जा रहा है तो यह एक अच्छा संदेश होगा। फिर भी, यह केवल एक शुरुआत है। इसके साथ ही एक सवाल उठता है कि क्या इन दोनों का कांग्रेस प्रवेश एक उपलब्धि है या समायोजन है; और क्या इसे कांग्रेस में अंदरूनी तौर पर होने वाले बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है? कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी की जोड़ी के कांग्रेस प्रवेश को एक उपलब्धि के रूप में देखा जाता है तो कांग्रेस की इच्छा के मुताबिक यदि दोनों युवा नेता भीड़ खींचने और वोट बटोरने में सफल होते हैं तो ये दोनों भी अंतत: कांग्रेस में सत्ता के अपने-अपने केंद्र बन जाएंगे और पार्टी में एक और दरबार बन जाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह क्रिकेटर से टीवी शो आर्टिस्ट और पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने नवजोत सिंह सिद्धू के प्रादेशिक ड्रामा का राष्ट्रीय रिप्ले होगा- धमकाने का यह प्रकार कुछ ऐसा है कि मुझे सत्ता दो नहीं तो मैं पद छोड़ता हूं!

कांग्रेस के सामने एक रास्ता और भी है और वह यह है कि बाहर से आए युवा नेताओं को बढ़ने का मौका दिया जाए। उनको अपना आधार मजबूत करने दिया जाए और वे समय आने पर पार्टी में निहित स्वार्थों से जुड़े लोगों को चुनौती दें। यह पार्टी के मजबूत पकड़ और शक्तिशाली नियंत्रण से संचालन के तरीके में बुनियादी परिवर्तन की मांग करेगा। यह इस तरह भले ही कई बार भ्रमित लेकिन एक जीवंत पार्टी बन सकेगी। वैसे इस तरह के ‘पेरिस्त्रोइका’ से वर्षों से चले आ रहे पार्टी संचालन के ‘कमांड एंड कंट्रोल’ तरीके के नष्ट होने का खतरा है। इस तरह के परिवर्तन के ढेर सारे लाभ हैं लेकिन पार्टी के संचालन के तरीके को बदलना कतई आसान नहीं होगा। बहरहाल पार्टी के पास विकल्प बहुत कम हैं।

कन्हैया-जिग्नेश के आने से परिवर्तन का एक और संकेत मिलता है कि कांग्रेस का झुकाव तेजी से वाम विचारधारा की ओर हो रहा है और वह गरीबों, हाशिए पर किए गए लोगों और कमजोर वर्गों के मुद्दों को लेकर नयी जड़ों की तलाश कर आम आदमी के सपनों को पूरा करने की ओर बढ़ने की सोच रही है। भाजपा के शासनकाल में राष्ट्रीय ढांचा कई प्रमुख क्षेत्रों में दक्षिणपंथ की ओर बहुत ज्यादा झुका है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार आक्रामक और वीभत्स तरीके से नवउदारवादी नीतियों की ओर बढ़ी है। उससे जनता की तकलीफें बढ़ी ही हैं। ऊर्जा क्षेत्र का अधिक निगमीकरण, सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्योगों को निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने के नए तरीकों और साधनों को ढूंढने (जैसा कि राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइप लाइन के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है), किसानों के 1 साल से चल रहे आंदोलन के बावजूद कृषि कानूनों को लागू करने के हठ को उदाहरण के रूप में पेश किया जा सकता है। इसके बावजूद बिल्ली की तरह चोर कदमों से जाकर इन मुद्दों पर बदलाव के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

कांग्रेस कई मामलों में स्पष्ट नहीं है। जैसे, धारा 370 का मामला। इसके अलावा कन्हैया कुमार को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सदस्य के रूप में देखे जाने का भय जैसे मुद्दे कांग्रेस में स्पष्टीकरण के कई सवाल खड़े करते हैं। आज की आर्थिक नीतियां और पर्यावरणीय लूट में जो सोच है वह पार्टी की मदद करने वाली नहीं है। हकीकत में कांग्रेस भी अतीत में इन मामलों में उतनी ही दोषी है और अब तर्क दिया जा सकता है कि भाजपा ने इसे और उछाल दिया है। आगे की नयी यात्रा के लिए उस अतीत को त्यागना और मिटा देना होगा।

इसके साथ ही कांग्रेस को महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ किए गए सफल गठबंधन की तरह रणनीतिक साझेदारी का निर्माण और प्रबंधन करना चाहिए। बाल कथाओं में वर्णित सब कुछ अकेले ही खा जाने वाले दानव की तरह की भाजपायी प्रवृत्ति को इसी तरह पराजित किया जा सकेगा। रणनीतिक साझेदारियां, गठबंधन की नयी संभावनाओं के नए रास्ते खोलेगा जो आज के दूषित राजनीतिक माहौल को बदलने में मदद करेंगे। इसलिए कन्हैया-मेवानी का कांग्रेस में प्रवेश पार्टी में एक नए बड़े परिवर्तन की ओर इशारा करता है। कांग्रेस के लिए यह परिवर्तन का संदेश देने वाला समय है। अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है।

यह कांग्रेस ही है जिसने देश को सोवियत संघ के तरीके वाली पंचवर्षीय योजनाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को सम्मानजनक ऊंचाइयां दीं और गरीबी की समस्या से निपटना शुरू किया। यह कांग्रेस ही थी जिसने तिजोरी खाली होते हुए भी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 1991 में ‘नव उदारवादी नीतियों’ पर चलने का मार्ग प्रशस्त किया। यह कांग्रेस ही हो सकती है जो हाशिए पर खड़े वर्गों की जरूरत और उनकी इच्छा-आकांक्षाओं के एजेंडे को फिर वापस ला सकती है। एक खुशनुमा पुनरुद्धार के लिए यह एक अच्छा मार्ग होगा।

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