कंप्यूटर का भाषाई पिछड़ापन

प्रमोद भार्गव

महाभारत में जलाशय के समीप खड़े यक्ष बने धर्म ने युधिष्ठिर से पूछा था कि दुनिया में सबसे तेज दौडऩे वाली चीज क्या है ? तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया,कि सबसे तेज गति में दौडऩे वाला होता है,हमारा ‘मन‘। यह हमें पलक झपकते ही यहां से वहां और वहां से और कहीं ले जा सकता है और फिर दूसरे क्षण वहां से कहीं और। मन से तेज आज भी किसी और वस्तु की गति नहीं है। लेकिन मन के बाद इंटरनेट ऐसा दूसरा तेज गति का माध्ययम है,जिस पर सूचनाएं सबसे तेज गति से दौडक़र मंजिल तय करती हैं। लेकिन ये सूचनाएं उसी भाषा में संप्रेशित होती हैं,जो भाषाएं कंप्युटर को सिखाई हुई हैं। दुर्भाग्य से भारत में कंप्युटर,जो इक्कीसवीं शताब्दी का सबसे तेज गति से दौडऩे वाला इंजन है,वह हमारी भाषा में नहीं है ? नतीजतन हम इसका भरपूर दोहन नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि कंप्युटर का भाषाई पिछड़ापन यथाशीघ्र दूर किया जाए।

सच्चाई तो यह है कि कंप्युटर पर काम करने के लिए अंग्रेजी की जरूरत नहीं है,लेकिन कंप्युटर को हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाएं सिखाने की जरूरत है। चीन,जापान,फ्रांस और अन्य पूर्वी देश कंप्युटर को अपनी भाषाएं सिखाने में दक्षता हासिल कर चुके हैं। गोया ये देश में कंप्युटर पर अपनी भाषाओं में बिना किसी बाधा के काम कर रहे हैं। हालांकि यूनिकोड में मंगल-अक्षरों के आविष्कार के बाद इस दिशा में हम लगभग आधा सफर तय कर चुके हैं,लेकिन टंकण के लिए हिंदी के यूनीकोड में अभी भी कुंजी-पटल अस्तित्व में नहीं आया है,लिहाजा अंग्रजी पर निर्भरता दूर नहीं हुई। चूंकि आने वाली युवा पीढिय़ों का भविष्य और आजीविका कंप्युटर आधारित होते जा रहे हैं,इसलिए जरूरी है कि कंप्युटर को भारतीय भाषाएं सिखाई जाएं।

हालांकि कंप्युटर के साथ एक बड़ी सच्चाई या विलक्षणता ये जुड़ी हुई है कि वह कोई भाषा नहीं जानता। वह तो सिर्फ 0 और 1 अथवा यूं कह लें अंडे और डंडे की भाषा जानता है। हम जानते हैं,शून्य का आविष्कार भारत में हुआ और 1 से लेकर 9 तक के अंक भी भारत में ही आविष्कार होकर पहले-पहल प्रयोग में लाए गए। गोया,हम कंप्युटर से कोई भाषा लिखना चाहते हैं तो उसे आदेश इसी भाषा में देना होगा। हम जानते हैं,ये दोनों अंक गणित जैसे कठिन विषय से जुड़े हैं। गणितीय सूत्र ही सबसे जटिल माने जाते हैं। लिहाजा इस गणितीय भाषा का प्रयोग आम आदमी के लिए सहज नहीं है। अत: कंप्युटर का दिमाग रचने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने 0 और 1 कि गणनाएं करके कुछ प्रोग्राम तैयार किए जो आदमी की भाषा को 0 और 1 की भाषा के जरिए कंप्युटर को संकेत देते हैं और काम हो जाता है। चूंकि कंप्यूटर का आविष्कार अंग्रेजीभाशियों ने किया,सो उसने पहले यही भाषा सीखी। हम जानते हैं,अंग्रेजी पूरी दुनिया कि भाषा नहीं है,सो जो देश अंग्रेजी नहीं जानते,उन्होंने अपने कंप्युटर को अपनी भाषा सिखा दी। अमेरिका से इन देशों ने कंप्युटर और उसके कार्यक्रम तब ही खरीदे,जब वे उनकी भाषा में गढऩे को तैयार हो गए। किंतु हमारे देश के नीति-नियंता ऐसा नहीं कर पाए,इसलिए आज भी हम अपनी भाषाओं में कंप्युटर तैयार नहीं होने के कारण पिछड़े हैं। कंप्युटर से जुड़े इस भाषाई पिछड़ेपन को दूर करने की जरूरत है।

शून्य और एक के माध्ययम से कंप्युटर विशेषज्ञ पिछले ढाई-तीन दशक से कंप्युटर को दुनिया की प्रमुख भाषाएं सिखाने के शोध-कार्य में लगे हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने भाषा-इंडिया नाम से पूरा एक विभाग खोला हुआ है। जो हिंदी समेत संविधान की अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं की कंप्युटर-लिपी गढऩे में लगा है। हिंदी के माध्ययम से भाषा प्रौद्योगिकी विकास के क्षेत्र में तमाम कंप्युटर अभियंताओं और गैर अभियंताओं ने अनेक भाषाई सॉफ्टवेयर तैयार किए हैं। इसका यह फायदा हुआ कि बहु-प्रकार की अक्षर लिपियां विकसीत हो गईं। इनका मुद्रण के क्षेत्र में डिजाइन के लिए खूब प्रयोग हो रहा है। इन अक्षरों के इतने प्रकार हैं कि ज्यादतर देवी-देवताओं और महापुरुषों से इन्हें चिन्हित करना पड़ा है। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेष, नारद, चाणक्य, गांधी, कृतिदेश इत्यादि। अक्षरों की इस विविधता ने एक नए तरह का संकट खड़ा कर दिया। वह यह है कि जब हम एक कंप्युटर से दूसरे कंप्युटर में पंजिका ;फाइल भेजते हैं या सीडी अथवा पेन-ड्राइव के जरिए खोलते हैं,तो वह खुलती नहीं है। ऐसा इसलिए होता है,क्योंकि यह जरूरी नहीं कि जिस प्रकार के अक्षरों में आपने साम्रगी अपने कंप्युटर में सामग्री टंकित की है वह अक्षर दूसरे कंप्युटर में भी हों ? हालांकि अब इस समस्या का हल अक्षर-परिर्वतकों से किया जाने लगा है और ये परिवर्तक गूगल पर निशुल्क उपलब्ध हैं।

इस समस्या ने यह विचार भी दिया कि हिंदी में कंप्युटर व इ्रंटरनेट की एक ऐसी मानक अक्षर-लिपि हो जो पूरी दुनिया में इंटरनेट पर बिना किसी बाधा के खुल जाए और जरूरत पडऩे पर उस सामग्री को कागज पर मुद्रित भी कर लिया जाए। इस दिशा में यूनीकोड के मार्फत मंगल-अक्षर अस्तित्व में लाए गए,जो नेट पर आसानी से खुल जाते हैं। दरअसल ‘यूनीकोड कन्सॉर्षियस‘ नामक स्वंयसेवी संगठन है,जो कंप्युटर को विश्व की प्रमुख भाषाओं की मानक लिपि सिखाने में लगा है। इसी संगठन ने हमें इस सदी के पहले दशक में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में कंप्युटिंग की मानक भाषा सुनिश्चित की और एनकोडिंग प्रणली दी। इस अनुसंधान से हमने अंग्रेजी की तरह हिंदी के मानकीकरण का समाधान तो निकाल लिया है,परंतु अभी भी हम टंकण के लिए कुंजी-पटल की एकरूपता न होने की समस्या से रूबरू हो रहे हैं। हिंदी के कंप्युटर बाजार में निरंतर मांग बढऩे के बावजूद न तो यूनिकोड के मंगल अक्षरों का कुंजी-पटल उपलब्ध है और न अन्य प्रकार की अक्षर-लिपियों का ? इस समस्या के फौरी हल के लिए हिंदी अक्षरों के स्टीकर चिपकाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। जबकि यूनीकोड तकनीक पर आधारित अन्य देशों की भाषाओं में कुंजी-पटल मौजूद हैं। बहरहाल,यूनिकोड के जरिए हमने अंतरराष्ट्रीय भाषा मानकीकरण का हल तो खोज लिया है,लेकिन अपनी भाषाओं में जब-तक कुंजी-पटल नहीं आएगा,कंप्युटर का भाषाई पिछड़ापन दूर नहीं होगा ?

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