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राजनीति

अपने कर्तव्य से दूर भागते राजनितिक दल

Indian Politicsयह अब सर्वविदित हो चुका है कि संसद चर्चा के बजाय लड़ाई का मैदान बन गई है। एक ओर संसद सदस्य जनता और देश से सम्बंधित मुद्दों ,समस्याओं और मामलों पर संसद में चर्चा करने अर्थात अपने कर्तव्य से दूर भाग अपनी अकर्मण्यता सिद्ध कर रहे हैं , वहीँ दूसरी ओर वे अपने पर कोई अंकुश भी नहीं चाहते । अर्थात वे निरंकुश होना चाहते हैं।यही कारण है कि राजनीतिक दल स्वयं में सुधार लाने की कहीं कोई पहल नहीं कर रहे हैं। इसी कारण से राजनीतिक दल न तो आय-व्यय के अपने विवरण को ईमानदारी से सार्वजनिक करने को तैयार हैं और न ही सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में आने की जरूरत समझ रहे हैं।सर्वाधिक चिंताजनक स्थिति यह है कि वे राजनीति में सुधार के प्रयासों में अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। अब जनता को ही यह सोचना है कि इस समस्या का निराकरण कैसे हो ताकि देश सर्वांगीण विकास के मार्ग पर सरपट दौड़ सके ?

लोकतंत्र में बहुमत से बड़ी सर्वानुमति होती है। देशहित व जनकल्याण से जुड़े सवालों पर पक्ष-विपक्ष में बहस अवश्य होना चाहिए और इसका स्वागत भी किया जाना चाहिए,लेकिन अंतत: किसी ठोस निष्कर्ष पर भी पहुंच और उस पर सर्वानुमति बनाना ही राष्ट्र के लिए श्रेयस्कर हो सकता है अन्यथा देश का बेड़ा गर्क समझना चाहिए । इसके लिए पक्ष-विपक्ष दोनों को ही सजग व तत्पर रह देशहित व जनकल्याण से जुड़े चर्चाओं में भाग लेना सुनिश्चित करना चाहिए।परन्तु खेदजनक बात यह है कि हाल के दिनों में भारतीय संसद चर्चा के बजाय लड़ाई का मैदान बन कर रह गई है। इसमें कोई संशय नहीं है कि संसद पूर्व में भी हंगामे का शिकार बनती रही है और उसके चलते वहाँ कोई काम नहीं हो सका है, लेकिन यह शायद पहली बार है जब देश की जनता प्रचंड बहुमत की सरकार चुनकर भी विपक्ष के रवैये के कारण स्वयं को ठगा महसूस कर रही है। ध्यातव्य है कि विगत 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से विजयी होकर केंद्र में मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद देश के जनमानस की नयनों मे आशा व उम्मीदों की एक नई किरण दिखलाई देने लगी है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के सिर्फ दो बड़े नेताओं सोनिया गाँधी व उसके पुत्र राहुल गाँधी की हठधर्मिता के कारण विगत मानसून सत्र के दौरान देश की जनता का करोड़ों रूपया व समय व्यर्थ बर्बाद हो गया है।इस कार्य में विभिन्न राजनितिक दलों के मुट्ठीभर विपक्षी सांसदों ने भी कांग्रेस के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये में साथ दिया और संसद नहीं चलने दी । विडंबना यह है कि जिन राजनीतिक दलों के कारण संसद अखाड़ा बनी उनके रुख-रवैये में कोई बदलाव आता नहीं दिखा और संसद का मानसून सत्र समाप्त भी हो गया ।

स्मरणीय है कि भारतीय राजनीति में जिस प्रकार के अकर्मण्यता , निरंकुशता व उतार चढ़ाव का खेल शुरू हो गया है, इसका प्रत्यक्ष दर्शन हम सभी ने संसद के विगत मानसून सत्र के दौरान किया। कांग्रेस ने जिस प्रकार से ललित मोदी प्रकरण पर आक्रोश का प्रदर्शन करके पूरी संसद को ठप कर दिया था, उसी मुद्दे अर्थात प्रकरण से कांगे्रस ने उस समय किनारा कर लिया, जब सत्र समाप्त होने की ओर आ गया था। केन्द्र सरकार के बार-बार कहने के बाद भी कांग्रेस ने इस मामले पर बहस से किनारा किया, और व्यर्थ का हो-हंगामा खड़ा किया,फिर बाद में कांगे्रस को अचानक क्या सूझी कि वह बहस में भाग लेने को तैयार हो गई? इसका कारण है, कांग्रेस पहले से ही यह भली-भान्ति जानती थी कि उसके द्वारा लगाए गए आरोपों में उतना दम नहीं है, जितना उसने पूर्व में ही प्रदर्शित कर दिया है। यही कारण है कि बहस में भाग लेने को तैयार होने के बाद भी कांग्रेस इस मामले में सदैव ही बचाव की मुद्रा में दिखलाई दी और अब वर्तमान में भी कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से अपने बचाव की मुद्रा में ही खड़ी दिखाई देती है। चतुर्दिक आलोचना होते देख उसे अब पता चल चुका है कि उसकी यह चाल उलटी पड़ गई और उससे हे हे हे हे में एक बड़ी गलती हो गई जिसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है ।मानसून सत्र में एक बेहद शर्मनाक बात और हुई है कि लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने जब कांगे्रसी सांसदों को निलम्बित कर दिया तो राहुल गाँधी की प्रशंसा का पात्र बनने के लिए युवा कांग्रेस के लोगो ने इस  फैसले का विरोध करने के लिए अर्धनग्नहोकर प्रदर्शन किया। क्या कांग्रेस की नजरों में यही यह लोकतंत्र है?देश विभाजक कांग्रेस द्वारा महिला लोकसभाअध्यक्ष का अपमान भी किया जा रहा था और कांग्रेस की सर्वेसर्वा और महिला अध्यक्ष सोनिया गाँधी एक महिला के अपमान का मजे ले रही थी। विगत लोक व विधानसभा चुनावों में बड़ी बेशर्म होकर सत्ताच्युत हुई कांग्रेस के कार्य-कलापों ने यह सिद्ध कर दिया है कि आज कांग्रेस पूरी तरह से विनाशक हो गयी है और पूर्णतः विकासविरोधी बन गयी है। कांग्रेस यह कतई नहीं चाहती कि देशहित व आर्थिक सुधारों वाले विधेयकों को पारित कराने का श्रेय मोदी सरकार ले जाये। इसीलिए कांग्रेस व्यर्थ, फर्जी मामलों पर संसद का समय व पैसा बर्बाद करके देश को विकास की जगह विनाश के कगार पर ले जाने वाली राजनीति कर रही है। अब कांग्रेस विपक्ष में रहकर भी देश के लिए बोझ बनती जा रही है। देश के नामचीन बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस के रवैये पर निराशा जाहिर की है।लोगों का कहना है कि देश हित के सभी विधेयक लम्बित हो गये हैं। हालांकि प्रधानमंत्री  मोदी विकास के प्रति सजग हैं तथा वह किसी भी कीमत पर देश व जनता का नुकसान नहीं होने देंगे।

भारत विभाजन के बाद से आज तक के लंबे सफर में देश ने खोये हुए अतीत के गौरव को बहुत हद तक पाया अर्थात पुनः अर्जित किया है और आज स्थिति यह है कि विश्व भारत से तमाम उम्मीदें लगाए हुए इसकी ओर टकटकी लगाये देख रहा है। देश की जनता भी इन उम्मीदों के हिसाब से कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने को तत्पर है, लेकिन देश के राजनीतिक दल उसकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। देश में विभिन्न क्षेत्रों में सुधार की प्रक्रिया जारी होना जितना उत्साहजनक है , उससे ज्यादा निराशाजनक बात यह है कि जो राजनीति समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने और राष्ट्र को दिशा देने का कार्य करती है उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोई गंभीर चर्चा तक नहीं हो रही है।

प्रजातंत्र में मतभिन्नता का सम्मान होना चाहिए, और उसके लिए जगह भी बनी रहनी चाहिए। आत्माभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अर्थात अलग राय और विचारों का स्वागत होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रद्रोहियों, आतंकवादियों और किसी भी हत्यारे का पक्ष भी कतई नहीं लिया जाना चाहिए। देश में विकास की चहुंमुखी गंगा बहे इसके लिए आवश्यक  है कि परस्पर संवाद का वातावरण बना रहे। गौरतलब है कि संसद के पचास साल पूरे होने पर पीए संगमा की अध्यक्षता में हर दल और समूह की सहमति से निर्णय लेकर तत्कालीन सांसदों ने संकल्प लिया था कि भविष्य में प्रश्नकाल में व्यवधान नहीं पैदा किया जाएगा। संसद की संकल्पना में प्रश्नकाल का एक घंटा ऐसा होता है जब दलगत दीवारें विलुप्त हो जाती हैं, और जो रह जाता है उसमें एक ओर सरकार होती है तो दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि होते हैं। वर्तमान सांसद सदस्य कम से कम यही एक संकल्प  कर जनहित में राजनितिक पथ पर चलें, तो संसदीय लोकतंत्र में सुधार की शुरुआत हो सकती है, क्योंकि उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में नकारात्मक सोच वालों को जनता अंतत: नकार देती है।

 

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