जापान में संस्कृत अध्ययन-अध्यापन की अखण्ड परम्परा

sanskrit1नोलाक्ष विक्रम

जापान देश में विगत चौदह शताब्दियों से संस्कृतअध्ययन-अध्यापन की अखण्ड परम्परा चली आ रही है। प्रो. हाजी-मे-नाका-मुरा के अनुसार तो भारतको छोडक़र संसार में सबसे अधिक संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन जापान में ही होता रहा है और एक बड़ी संख्या में वहां के विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते रहे हैं। जापान में संस्कृत की पुरातन परम्परा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के विश्वविद्यालयों में भारतीय दर्शन का विभाग सन 1917 में चालू हुआ, जबकि जापान के टोकियो विश्वविद्यालयमें यह विभाग सन्? 1904 में ही आरम्भ हो चुका था।

पिछली शताब्दी में यूरोप के अनेक विद्वान काल-कवलित हुए संस्कृत वाङ्मय की खोज में लग गये। इंग्लैंड के सर विलियम जोन्स, फ्रांस के प्रो. सिल्वांलेवी, जर्मन विद्वान मैक्सम्यूलर, हंगरी के चोमाखोरेशी, हालैण्ड के प्रो. एच. कर्ण और प्रो. सेदेस आदि विद्वानों ने भारत, तिब्बत, चीन, इण्डोनेशिया आदि की संस्कृत पाण्डुलिपियों तथा संस्कृत से अनूदित ग्रन्थों की खोज की। सहस्रश: ऐसे ग्रन्थों का पता चला जो विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में नष्ट हो चुके थे। इन संस्कृत एवं संस्कृत से अनूदित ग्रन्थों का उद्धार और सम्पादन संस्कृत जगत के लिये एक बड़ी चुनौती रही है। इस दिशा में जितना भी कार्य हुआ है उसका अधिकांश श्रेय यूरोप के संस्कृत विद्वानों को ही जाता है। दुर्भाग्य से भारत अभी इस क्षेत्र में बहुत पीछे है। मध्य पूर्वी एशिया में हजारों संस्कृत ग्रन्थ और ग्रन्थों के खण्ड संग्रहालयों में, पुस्तकालयों में अथवा भूमि के नीचे सोये पड़े हैं और उनमें सोया पड़ा है भारत के सांस्कृतिक अभ्युदय का इतिहास। अपनी मूक वाणी में वे पुकार रहे हैं ‘को माम उद्धरिष्यति शायद कोई नूतन कुमरिल भट्ट इस पुकार को सुने।

सन 1880 में जापान में बर्तानिया के दूतावास के एक अधिकारी अनैस्ट-सेटोअ को जापान की 18वीं शती के महानतम संस्कृत विद्वान ऋषिवर ‘जी-उन-सोंजा द्वारा लिखे गये एक हजार ग्रन्थों का पता चला। उन्हीं दिनों बर्तानिया में ऋग्वेद का प्रकाशन हुआ था। अनैस्ट-सैटोअ ने जापान में ओसाका द्वीप के गुह्य सरस्वती मंदिर ‘‘को-की-जी’ के अध्यक्षभिक्षु ‘काईशिन को वेद का सैट दियाऔर भिक्षु ‘काईशिन से मुनिवर ‘जी-उन-सोंजा के नब्बे ग्रन्थ प्राप्त किये। संस्कृत के इन नब्बे ग्रन्थों से यूरोप के विद्वानों में ‘को-की-जी के सरस्वती मंदिर और मुनि ‘जी-उन-सोंजा की धूम मच गयी। उन संस्कृत ग्रन्थों में से ‘उष्णीय विजया ण् धारिणी, ‘वज्रछेदिका और ‘सद्धर्म-पुण्डरीक का सम्पादन एवं प्रकाशन किया गया। फ्रांस के विख्यात भारतीयविद्याविशेषज्ञ प्रो. सिल्वांलेवी भी जापान में संस्कृत-अध्ययन के इतिहास की खोज करने लगे।

जापान के आचार्य ककुबन (1015-1148ई.) ने बीजाक्षर अ को देवतामानकर (अक्षराणामकारोह्ढस्मि-गीता) उसे अष्टदल कमल पर आसीन तथा उस कमल कोभी वज्र पर आधारित माना है। धर्म को शक्ति का आधार मिले तभी धर्म प्रभावीहोगा। ‘शिंगोन अर्थात सत्यवाक्य नाम दिया गया। अनेक मंदिर बनाये गये एवं संस्कृत ग्रन्थों के विनय अवदान सूत्र ग्रन्थों के अनुवाद होने लगे। किन्तु मंत्रों का महत्त्व अर्थों में ही नहीं बल्कि उच्चारणों में भी है और चीनी लिपि उच्चारण के लिये समर्थ नहीं है तो भारत की लिपि का संस्कृत के मंत्र लिखने के लिये प्रयोग किया गया। इस लिपि को सिद्धम कहा गया। 11वीं शती में ईरानी यात्री अल्बेरूनी ने भी अपने यात्रा-वृत्तान्त में लिखा कि भारत में सिद्धम लिपि का प्रचार है। कोबोदाईशी स्वयं सिद्धम के अच्छे लेखक थे। जापान में सिद्धम लिखना एक कला बन गयी, साधना बन गयी, साधना का मापदण्ड बन गयी। और आज तक यह स्थिति है।

चीन और जापान में ‘काञ्जी लिपि में लिखा जाता है जो कि चित्र लिपि है ‘कोबोदाईशी ने ध्वनियों को प्रकट करने के लिये नयी लिपि का आविष्कार किया जिसे काना कहते हैं। यह लिपि उन्होंने संस्कृत वर्णमाला के आधार पर बनायी। कोबोदाईशी से भी पहले सन 593 में राजकुमार ‘शोतोकु ने जापान का राज्यभार सम्भाला। ‘शोतोकु अपने महान आदर्शों एवं धर्मप्रचार के कारण जापान के अशोक कहलाये।

ईसा की छठी शताब्दी में शोतोकु ने जापान का 17 सूत्री संविधान बनाया जो कि भगवान बुद्ध के ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय सिद्धान्त पर आधारित था। सम्भवत: यह संसार का सबसे पहला संविधान है जो कि जापान के होर्यूजी मन्दिर के संग्रहालय में सुरक्षित है। संविधानके अवसर पर भारत से संस्कृत ग्रन्थ ‘उष्णीशविजयाधारिणी मंगवा कर उसका पाठ किया। यह संस्कृत धारिणी भी ‘होर्यूजी मन्दिर में रखी है। किन्तु वर्ष में एक बार ही दर्शनार्थबाहर निकाली जाती है। यह ग्रन्थ सम्भवत: संस्कृत की प्राचीनतम पाण्डुलिपि हो। संस्कृत की अधिक प्राचीन पाण्डुलिपियां भारत में नहीं, जापान से मिली हैं। भारत में 10शताब्दी तक की ही पाण्डुलिपियां हैं।

जबकि जापान में छठी शताब्दी की भी पाण्डुलिपियां मिलती हैं। राजकुमार शोतोकु ताईशी ने ‘सद्धर्म पुण्डरीक सूत्र ‘श्रीमाला देवी सिंहनादसूत्र और ‘विमजकीर्ति निर्देशसूत्र पर भी भाष्य लिखे। कुछवर्षों के पश्चात जापान सम्राट ‘शोमू ने तोदाईजी के मन्दिर के उद्घाटन के लिये भारतीय आचार्य बोधिसेन को बुलाने के लिये अधिकारियों का एक दल चीन भेजा।

इस दल की प्रार्थना को स्वीकार करके भारद्वाज ब्राह्मण आचार्य बोधिसेन ने 13 दिसम्बर सन 730 ई. को जापान के लिये प्रस्थान किया। इनके साथ वियतनामी भिक्षु फुचिये और चीनी भिक्षु ‘ताओ सुआन भी थे।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
parobet giriş
parobet giriş