सच्चे तीर्थ माता-पिता-आचार्य व आप्त विद्वानों के सदुपदेश आदि हैं।

आजकल कुछ स्थानों अथवा नदी व सरोवरों को तीर्थ कहा जाता है। किसी से कोई पूछे कि इन तीर्थ स्थानों से इतर देश के अन्य सभी स्थान सच्चे तीर्थ क्यों नहीं है, तो इसका उत्तर शायद कोई नहीं दे सकेगा। तीर्थ शब्द संस्कृत भाषा का है और इसका प्रयोग वेद व वैदिक साहित्य में मिलता है। समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन करने के बाद जो निष्कर्ष निकलता है, उसके अनुसार तीर्थ में क्या भाव निहित है, यह जानना आवश्यक है। तीर्थ शब्द का अर्थ है जिससे मनुष्य दुःखसागर से पार उतरता है, वह तीर्थ होता है। वेदों में सत्याभाषण, विद्या, सत्संग, पांच यम अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह आदि, योगाभ्यास, पुरुषार्थ तथा विद्यादानादि शुभ कर्मों को दुःखसागर से निवृत्ति कराने वाले बताया गया है। यही सब वस्तुतः तीर्थ हैं। इसके विपरीत दुःखसागर में डूबाने वाले अशुभ कर्म हैं जिनमें मुख्यतः असत्याभाषण, अविद्या, कुसंग, पांच यमों के विपरीत आचरण व व्यवहार करना, योगाभ्यास न करना, निठल्ला होना व तपस्वी न होना एवं विद्याहीनता आदि। विचार करने पर ज्ञात होता है कि आजकल के जल-स्थल आदि तीर्थ इन तीर्थ विपरीत गुण-कर्म-स्वभाव को चरितार्थ करते हैं। जलस्थलादि कोई भी स्थान तीर्थ नहीं है क्योंकि किसी स्थान या नदी, सरोवर व जल के समीप जाने व स्नानादि करने से मनुष्य के दुःख दारिद्रय दूर नहीं होते अर्थात् इन तीर्थों से कोई दुःखों से पार नही होता। इससे तो धन व जीवन के सबसे मूल्यवान समय अर्थात् जीवनकाल का अपव्यय होने से हानि ही हानि व दुःखों में वृद्धि होती है। इन बातों को केवल विवेकशील मनुष्य ही जान सकते हैं, अज्ञानी व अविद्याग्रस्त बन्धु नहीं जान सकते और इसी कारण से अज्ञानी लोगों को भ्रम में डालकर कुछ लोग अपना मनोरथ सिद्ध करते हैं जो कि कालान्तर में उनके लिए भी दुःखदायी ही होता है।

 

आजकल कुछ विशेष मन्दिरों और नदियों में स्नान आदि को तीर्थ की संज्ञा दी जाती है। यह विचार व भावना वेद और दर्शन, उपनिषद, शुद्ध मनुस्मृति आदि शास्त्रों के विचारों से विरूद्ध होने से असत्य, भ्रामक व अन्धविश्वास की श्रेणी में ही मानी जा सकती है। जिन वेद आदि शास्त्रों में ईश्वर, जीव, प्रकृति तथा जीवों के परमार्थ व सांसारिक सभी कर्तव्यों का युक्ति व तर्क संगत ज्ञान है, उनमें किसी स्थान व नदी में स्नान आदि को तीर्थ न बताना सकारण ही है क्योंकि कोई स्थान व नदियों का जल पूजा व स्नानादि के रूप में तीर्थ होता ही नहीं है। महर्षि दयानन्द धार्मिक जगत में सत्य के अन्वेषी थे, अतः उन्होंने अपने समय में उपलब्ध सभी धार्मिक ग्रन्थों को पढ़ा था तथा ग्रन्थों में निहित विचारों पर युक्ति व तर्क को सामने रखकर चिन्तन भी किया था। उन्होंने अपने गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती, जो कि वेदों सहित आर्ष ज्ञान के प्रमाणित विद्वान थे, उनसे सभी विषयों पर चर्चा कर सत्य को प्राप्त किया था। उनका उद्देश्य जनता को बहका फुसला कर उनका धन हड़पना व उन्हें अपना चेला व शिष्य बनाना नहीं था अपितु जनता को सत्य मार्ग दिखा कर स्वयं और सभी को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कराना था। उनके समय में ही सहस्रों बुद्धिजीवी लोग उनके विचारों व मान्यताओं की महत्ता व सत्यता को जानकर उनके अनुयायी बने थे। उनसे वैदिक विद्वानों की एक लम्बी श्रृंखला चली है जिन्होंने उनकी वैदिक मान्यताओं को अनेक शास्त्रीय प्रमाणों, युक्तियों व तर्कों से सत्य सिद्ध किया है। स्वामी दयानन्द ने अपने समय में अन्य मत वालों से किसी भी धार्मिक विषय पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी थी। उन्होंने अनेकों से  शास्त्रार्थ किए भी तथा सभी शास्त्राथों में उनकी ही विजय हुई। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उनकी सभी मान्यतायें सत्य पर आधारित व अकाट्य थी। उनमें अज्ञान नहीं था और न ही उनका अपना कोई निजी हित व स्वार्थ था जिसके लिए वह यह सब कार्य कर रहे थे। उनका उद्देश्य तो मात्र ईश्वर का आज्ञा का पालन करना वा कराना था जो वेदों में विहित है और जिसका आचरण करना ही सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य व परम धर्म है।

महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में समूचे देश का भ्रमण किया था और तीर्थ स्थानों आदि में जो कुछ धर्माचरण के विरूद्ध होता है, उसे व उसकी सच्चाई को सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से सबके सामने प्रस्तुत किया है जिसको जानने के लिए सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन करना आवश्यक है। सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में स्वामी जी ने प्रश्न उठाते हुए कहा है कि क्या कोई तीर्थ सत्य है वा नहीं? इसका उत्तर हां में देकर वह लिखते हैं कि वेदादि सत्य शास्त्रों का पढ़ना-पढा़ना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार, धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, निर्वैर, निष्कपट, सत्यभाषण, सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रह्मचर्य पालन, आचार्य-अतिथि-माता-पिता की सेवा, परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना, शान्ति से युक्त जीवन, जितेन्द्रियता, सुशीलता, धर्मयुक्तपुरुषार्थ, ज्ञान-विज्ञान आदि शुभ गुण व कर्म दुःखों से तारने वाले होने से तीर्थ हैं। और जो जल स्थलमय स्थान हैं, वे तीर्थ कभी नहीं हो सकते क्योंकि ‘जना यैस्तरन्ति तानि तीर्थानि’ अर्थात् मनुष्य जिन कर्मों को करके दुःखों से तरे उन का नाम तीर्थ है। जल स्थल तराने वाले नहीं किन्तु डुबाकर मारने वाले हैं। प्रत्युत नौका आदि का नाम तीर्थ हो सकता है क्योंकि उन से भी समुद्र आदि को तरते हैं। वैदिक साहित्य के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ अष्टाध्यायी के 4/4/107 सूत्र में कहा गया है कि ‘समानतीर्थे वासी’ अर्थात् जो ब्रह्मचारीगण एक आचार्य से एक शास्त्र को साथ-साथ पढ़ते हों वे सब ब्रह्मचारीगण सतीर्थ्य अर्थात् समानतीर्थसेवी होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 16 में मन्त्र सूक्ति ‘नमस्तीथ्र्याय च’ में कहा गया है कि जो वेदादि शास्त्र और सत्यभाषाणादि धर्म लक्षणों में साधु हो उस को अन्नादि पदार्थ देना और उन से विद्या लेनी इत्यादि तीर्थ कहाते हैं। इस प्रकार वेदादि शास्त्रानुमोदित तीर्थ का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। मूर्तिपूजा, मन्दिर, जल व नदी युक्त स्थानों में स्नानादि से मनुष्य दुःखों से नहीं तरते, इस कारण इनका सच्चा तीर्थ न होकर मिथ्या होना सिद्ध होता है।

देश व समाज में हम देखते हैं कि तीर्थाटन करने से किसी का अज्ञान व दुःख दूर नहं होते। उत्तराखण्ड के केदारनाथ आदि तीर्थ स्थानों की विगत त्रासदी में यह देखा गया है कि इन स्थानों पर आकर तीर्थ यात्रियों को दुःख से तरने के स्थान पर मृत्यु आदि दुःख मिले हैं। अतः इनसे दुःख तारने की अपेक्षा पूरी नहीं होती। देहरादून आर्यसमाज में त्रासदी के बाद आर्य संन्यासी स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक से पूछे एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि ईश्वर सर्वव्यापक है। इसलिए उसके दर्शन व प्राप्ति के लिये किसी को कहीं जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, वह तो साधना करने से अपनी आत्मा में सर्वत्र हो सकते हैं। अतः वैदिक ज्ञान विज्ञान के संवाहक विद्वानों से रहित किसी स्थान विशेष की संज्ञा तीर्थ कदापि नहीं हो सकती और न ही ऐसी यात्रा तीर्थ यात्रा हो सकती है। तीर्थ माता-पिता-आचार्य-वैदिक शास्त्रों में निहित है और इनसे ज्ञानार्जन करना ही तीर्थ होता है। जिस प्रकार से कभी किसी को कोई रोगादि हो जाता है तो वैद्यों व चिकित्सकों के उपचार से वह स्वस्थ होता है अन्यथा नहीं। धनोपार्जन के लिए कृषि, व्यापार, सेवा आदि कार्य करने होते हैं, किसी मूर्ति आदि की पूजा व जलस्थलादि की यात्रा व पूजा आदि करने से दुःखों पर विजय प्राप्त नहीं होती, अतः वर्तमान के तीर्थ तीर्थ न होकर सत्य व यथार्थ तीर्थ की विकृतियां है जिससे मनुष्यों की भारी हानि हो रही है। यदि तीर्थों में किया जाने वाला पुरुषार्थ सत्य व ज्ञान पूर्वक स्वजीवन व सामाजिक के हित की भावना से हो, तो वह लाभकारी होता है। अतः वैदिक तीर्थों को जानकर उनका सेवन कर वर्तमान जीवन व परलोक के जीवन को सुधारना अर्थात् इनमें होने वाले दुःखों से पार होने के वैदिक उपायों को करना चाहिये। यही हमारे व्यक्तिगत व देश के हित में है।

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