नंद के घर में उन्होंने प्रवेश किया और वहां से उनकी नवजात लडक़ी को उठाकर उसके स्थान पर अपने नवजात शिशु को सुलाकर जल्दी ही मथुरा की ओर लौट पड़े। घनघोर वर्षा से यमुना का जल प्रवाह अत्यंत तीव्र था, वसुदेव के लिए संतान की रक्षा का उत्तरदायित्व इस समय सर्वोपरि था। वसुदेव के उत्साह की तीव्रता से कृष्ण को सुरक्षित बचाने का कार्य सावधानी से पूर्ण हो गया। इसके पश्चात् प्रहरियों की ‘नींद’ खुलती है। वे तुरंत देवकी के पास जेल में जाते हैं और ‘बलात’ उससे नवजात लडक़ी को छीनने का प्रयास करते हैं।

देवकी की आठवीं संतान होने की सूचना कंस को भी मिल गई थी। इसलिए वह स्वयं आता है और उस कन्या को देवकी से छीन लेता है। कन्या को छीनकर उसने उसे मारने का प्रयास किया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वह उस कन्या को मार नही सका, अपितु कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश की ओर प्रस्थान कर गयी तथा उसे यह चेतावनी भी दे गयी कि तुझे मारने वाला कृष्ण जन्म ले चुका है। लगता है कि यह कन्या भी कंस द्वारा मार दी गई होगी।

बालकपन की घटनाएं: श्रीकृष्ण जैसे महामानव को अपनी पावन रज में खिलाने का सौभाग्य गोकुल और ब्रज की पावन भूमि को है। गौओं का समूह ब्रज कहलाता है और गोकुल से तो स्पष्ट ही है ‘गौओं का कुल’। स्पष्ट है कि कृष्ण जी का बालपन गौओं के मध्य व्यतीत हुआ। इसी से उनका एक नाम गोपाल और गोपालनंदन भी है। अपने पिता की दूसरी भार्या से उत्पन्न अपने बड़े भाई बलराम के साथ कृष्ण जी का बालपन ब्रज की मस्ती भरी भूमि की रज में व्यतीत हो रहा था।

गौओं के बछड़ों का स्वतंत्र विचरण और उच्छृंखल क्रीड़ा हर व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। साथ ही उन्हीं जैसी स्वतंत्र और मदमाती क्रीड़ाएं करने को मन भी करता है। ‘कृष्ण’ को भी ऐसी क्रीड़ाएं भाने लगीं इस प्रकार बचपन में वह अपने भाई बलराम व अन्य बच्चों के साथ बालपन की विशिष्टता ली हुई क्रीड़ाएं करते रहते। इन्हीं क्रीड़ाओं के चलते कृष्ण जी ने मल्ल क्रीड़ा में विशेष योग्यता प्राप्त कर ली थी। इस ‘मल्लक्रीड़ा’ में बलराम भी उन्हें सहयोग करते थे।

शनै:-शनै: उन दोनों भाइयों की ‘मल्लक्रीड़ा’ की ख्याति फैलने लगी। जो चलते-फैलते हुए कंस के कानों तक भी पहुंच ही गई। वह उनकी हत्या की योजनाएं बनाता रहता था। ‘मल्लयुद्घ’ में उनकी प्रसिद्घि के इस अवसर को भी उसने कृष्ण की हत्या के एक सुअवसर के रूप में प्रयोग करने का प्रयास किया। इससे पूर्व पूतना आदि के माध्यम से वह कृष्ण-हत्या का निष्फ ल प्रयास कर चुका था। इस बार उसने अपने राजदरबार के चाणूर और भुष्टिक नामक दो मल्लों को राजदरबार में मल्लयुद्घ का आयोजन करने का निर्देश दिया। इसमें सभी प्रसिद्घ मल्लों को आमंत्रित कराया गया। कृष्ण बलराम पर भी यह आमंत्रण पहुंचा। इस आमंत्रण को लेकर ‘अक्रूर’ को भेजा गया। अक्रूर के आमंत्रण को कृष्ण बलराम ने सहर्ष स्वीकार किया। निश्चित दिवस को निर्धारित लक्ष्य की ओर बहुत से ब्रजवासियों के साथ प्रस्थान किया। कंस ने कृष्ण को मारने के लिए अपना कुवलयापीड नाम का हाथी छोड़ दिया था। कृष्ण जी ने उसका दांत उखाडक़र उसे मार डाला। तत्पश्चात् कंस के चाणूर और मुष्टिक नाम के दोनों मल्लों का भी वध् कर दिया। अब बारी थी कंस की। कृष्ण ने उसके सिंहासन की ओर बढक़र उसकी चोटी पकडक़र उसे भी सिंहासन से नीचे पटककर मार डाला।  इस प्रकार कृष्ण का वह पहला महान कार्य पूर्ण हुआ जिसके लिए यह पुण्य और महान आत्मा इस संसार में आयी थी। कंस के क्रूर अत्याचारों से जनता त्राहिमाम कर उठी थी। आज जब वह अत्याचारी और दुराचारी दुष्ट कंस इस दुनिया में ही नहीं था तो जनता में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। कृष्ण की सर्वत्र जयघोष हो गयी। कृष्ण जी ने अपने नाना उग्रसेन को जेल से निकालकर राज सिंहासन पर विराजमान किया। यह कृष्ण का ही अनुपम और निराला व्यक्तित्व था कि जो एक राजा को हटाकर पूर्व राजा को गद्दी पर बिठाकर स्वयं मथुरा की ओर शांत भाव से प्रस्थान कर गया। आज के बिठाकर स्वयं मथुरा की ओर शांत भाव से प्रस्थान कर गया। आज के इस स्वार्थी संसार में यदि ऐसा होता तो परिणाम सर्वथा विपरीत ही होता। मगध् नरेश जरासंध् कंस का श्वसुर था। उसकी दो कन्याएं कंस को ब्याही थीं। कृष्ण द्वारा अपनी कन्याओं के वैधव्य की पीड़ा जरासंध् को सहन नहीं हो रही थी। जरासंध् स्वयं भी अत्यंत क्रूर और अत्याचारी शासक था। क्रूरता और अत्याचार की भावना व्यक्ति की न्याय प्रियता को समाप्त कर डालती है अत: जरासंध् की न्यायप्रियता उसे कृष्ण के प्रति प्रतिशोध् के डालती है अत: जरासंध् की न्यायप्रियता उसे कृष्ण के प्रति प्रतिशोध् के भावों से दग्ध कर रही थी। फ लत: उसने प्रतिशोध् की भावना के वशीभूत होकर मथुरा पर चढ़ाई कर दी। कृष्ण नीतिज्ञ थे। संकट के काल में मथुरा के जनसामान्य की प्राणहानि के भय से कृष्ण दक्षिण की ओर मथुरा से भाग गये। जरासंध् भी उन्हें खोजता हुआ वहीं पहुंच गया। गोमंत्र पर्वत पर कृष्ण ने जरासंध् और उसकी सेना को रण छोडक़र भागने पर विवश कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने दक्षिण के ही एक राजा श्रगाल को युद्घ में मारकर उसके पुत्र को राज्य सिंहासनारूढ़ किया। एतस्मिन पश्चात् कृष्ण मथुरा लौट आये।

21 वर्ष की आयु में कृष्ण और बलराम को संदीपन ऋषि के आश्रम में विद्याध्ययन एवं धनुर्विद्या हेतु भेजा गया। यहीं पर उनकी भेंट सुदामा से हुई थी। कृष्ण जी ने शीघ्र ही विद्याध्ययन और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा को पूर्ण कर लिया। वे वेद वेदांग और शस्त्रों में पूर्णत: निष्णात होकर मथुरा लौट आये।

जीवन की दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका:

महाभारत के प्रमुख पात्रों युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल के सहायक और युद्घ से पूर्व युद्घ टालने के कृष्ण जी के प्रयासों पर प्रकाश डालने से पूर्व हम कृष्ण जी के विवाह पर संक्षिप्त प्रकाश डालना उचित समझते हैं। कृष्ण जी का विवाह विदर्भ बरार नरेश भीष्मक की कन्या रूक्मिणी से हुआ था। जब विदर्भ नरेश भीष्मक ने अपनी पुत्री का स्वयंवर रचाया तो कृष्ण पर यह संदेश निमंत्रण के रूप में इसलिए नहीं पहुंचाया गया था कि राजा भीष्मक और उसका पुत्र रूक्मी जरासंध् के साथ उस सैन्य दल में थे जो कृष्ण के विरूद्घ तैयार किया गया था। रूक्मिणी की हार्दिक इच्छा थी कि उनका विवाह कृष्ण जी के साथ हो। इस इच्छा की सूचना स्वयं कृष्ण जी के पास भी उपलब्ध थी। अत: वह स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिए चल दिये। जरासंध और शिशुपाल जैसे उद्दण्डी और विरोधी नरेशों के बहुत भारी विरोध् के उपरांत कृष्ण जी ने रूक्मणी से स्वयंवर की शर्तों के अनुसार रूक्मणी द्वारा वरमाला डालने पर उनसे विवाह कर लिया। कृष्ण द्वारा जरासंध् के कई आक्रमणों को विफ ल किया जा चुका था। रूक्मणी स्वयंवर के पश्चात् जरासंध् द्वारा पुन: मथुरा पर आक्रमण किया गया। जिसको उन्होंने इस बार पूर्णत: कुचलने में सफ लता प्राप्त की। क्योंकि इसके पश्चात् फि र जरासंध् द्वारा कोई आक्रमण मथुरा पर नहीं किया गया। इसी युद्घ में पर्वतों में छिपने को विवश कालयवन को भी कृष्ण जी द्वारा परास्त कर उसे मृत्यु का ग्रास बनाया गया। इस प्रकार कृष्ण प्रजावत्सलता में जनता के हृदय में प्रथम स्थान बनाने लगे। जब वह जरासंध् से अपने आपको बचाते घूम रहे थे तभी उन्होंने ‘द्वारिका’ को बसाया था। जो कि सर्व प्रकार के संकटों से सुरक्षित थी। द्वारिका नगरी का शासक उन्होंने अपने पिता को अर्थात् वासुदेव जी को ही घोषित किया। इन महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिों और लोकहित के कार्यों से भी महत्वपूर्ण भूमिका कृष्ण जी की महाभारत के युद्घ के संदर्भ में है। कृष्ण का जीवनचरित बिना हस्तिनापुर की राजनीति में उनके हस्तक्षेप और महत्वपूर्ण योगदान के कार्यों के उल्लेख के अधूरा है। इसके लिए हमें सूक्ष्म सा अवलोकन करते हुए हस्तिनापुर के राजप्रासादों के भीतर की घात प्रतिघात की दूषित राजनीति को भी समझना होगा।

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