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सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक व फर्जी खबरें रोकने की चुनौती!

अजीत द्विवेदी

अब तक देश का प्रतिबद्ध मीडिया और आईटी सेल की ओर से प्रायोजित सोशल मीडिया अकाउंट्स विपक्षी पार्टियों, सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, किसान आंदोलनकारियों, छात्र व युवा नेताओं आदि को निशाना बनाते रहे थे, लेकिन अब पहली बार न्यायपालिका भी उनके निशाने पर है क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने उनके ऊपर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तभी अब तक विपक्ष से सवाल पूछने वाले मीडिया ने न्यायपालिका से पूछना शुरू कर दिया है कि पहले वह तो बताए कि उसके यहां इतने मामले क्यों लंबित हैं, लोगों को समय से न्याय क्यों नहीं मिल रहा है और उस पर सर्वोच्च अदालत क्यों नहीं टिप्पणी कर रही है! हालांकि यह बिल्कुल अलग मामला है और अदालतों में लंबित मामलों के लिए न्यायपालिका से ज्यादा कार्यपालिका जिम्मेदार है लेकिन सांप्रदायिकता, मूर्खता और सत्ता की चापलूसी के लिए प्रतिबद्ध लोगों को कौन समझा सकता है!

बहरहाल, पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने खबरों को सांप्रदायिक रंग देने वाली रिपोर्टिंग की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की रिपोर्टिंग से देश की छवि खराब होती है। चीफ जस्टिस का यह कहना देश के कई कथित दिग्गज और सम्मानित पत्रकारों पर सीधी टिप्पणी है, जो हर खबर को सांप्रदायिक रंग देते हैं। इसके बाद चीफ जस्टिस ने सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित होने वाली फर्जी खबरों पर भी चिंता जताई और उन्हें देश-समाज के लिए खतरनाक बताया। अदालत की इस टिप्पणी ने उन तमाम लोगों को नाराज किया है, जो राजनीतिक मकसद से खबरों को सांप्रदायिक रंग देते हैं या फर्जी खबरें फैलाते हैं।

सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी पिछले साल दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में हुए तबलीगी जमात के एक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के मामले में की। तबलीगी जमात के इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए देश के अलग अलग हिस्सों से दिल्ली आए लोग एक बंद जगह पर इकट्ठा हुए थे, जिससे उनके बीच कोरोना फैला। इसकी सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मरकज को खाली कराया और जमात के लोगों की कोरोना टेस्टिंग हुई तो बड़ी संख्या में लोग संक्रमित मिले। यह उस समय की बात है, जब कोरोना की महामारी शुरू ही हुई थी। तब लोगों को इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उस समय देश की मीडिया ने इस मुद्दे को ऐसा सांप्रदायिक रंग दिया, जिसकी मिसाल मुश्किल है। मीडिया ने तबलीगी जमात के बहाने समूचे मुस्लिम समुदाय को कोरोना के वायरस में तब्दील कर दिया।

मुख्यधारा के मीडिया ने तबलीगी जमात को राक्षसी रूप दे दिया और उस आधार पर महामारी के बीच समाज को पूरी तरह से सांप्रदायिक आधार पर विभाजित कर दिया। ऐसा करने वाले किसी एक मीडिया समूह या किसी एक पत्रकार का नाम लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर कोई थोड़ी तकलीफ उठाए तो बहुत सहज तरीके से ऐसे मीडिया समूहों और पत्रकारों को पहचान सकता है। टीआरपी रेटिंग में शीर्ष के पांच-सात न्यूज चैनलों के सबसे लोकप्रिय एंकर्स के ट्विटर अकाउंट के टाइमलाइन पर खोजें तो तबलीगी जमात का राक्षसीकरण करने वाले उनके ट्विट मिल जाएंगे। उन्होंने सिर्फ खबरों को ही सांप्रदायिक रंग नहीं दिया, बल्कि खुद भी उसी रंग में रंगे रहे। उन्होंने अपने निजी ट्विटर हैंडल से जहर फैलाने वाले ट्विट किए। इन तमाम अपढ़-कुपढ़ पत्रकारों ने अपने साथ साथ समूचे मीडिया समुदाय की छवि खराब की। सुप्रीम कोर्ट ने इनमें से किसी का नाम नहीं लिया लेकिन जैसी टिप्पणी की और इससे देश की छवि खराब होने की जो बात कही, उसे सुनने के बाद कुछ पत्रकारों को तो जरूर शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए था! पर वे ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि सांप्रदायिक होने से पहले वे शर्मनिरपेक्ष हो चुके होते हैं।

बहरहाल, सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी को बेहद गंभीरता से लेने और नासूर की तरह फैल रही इस बीमारी का समाधान खोजने की जरूरत है। यह सही है कि इसका समाधान बहुत आसान नहीं है। अगर सरकार कानून बना कर इसका समाधान करने का प्रयास करती है तो संविधान द्वारा दी गई वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है और एक तरह से आइडिया ऑफ डेमोक्रेसी खतरे में पड़ती है। दूसरी ओर अगर इसे मीडिया समूहों के स्वनियमन के भरोसे छोड़ा जाता है तो उससे कुछ हासिल होने की उम्मीद नहीं रह जाती है। इसलिए इसका समाधान मुश्किल है। परंतु ऐसा नहीं है कि समाधान हो नहीं सकता है। इसका समाधान तभी संभव है, जब सबसे पहले यह स्वीकार किया जाए कि यह एक राजनीतिक समस्या है! अगर सांप्रदायिक रंग वाली रिपोर्टिंग और फर्जी खबरों को राजनीतिक समस्या मान लिया जाए और इसके पीछे की सांस्थायिक ताकतों को पहचान लिया जाए तो इसका समाधान बहुत आसान हो जाएगा।

सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि यह काम अपने आप नहीं हो रहा है। सोशल मीडिया के करोड़ों उपयोक्ता इतने सक्षम नहीं हैं कि वे नफरत फैलाने वाले फर्जी वीडियो तैयार कर सकें या फर्जी खबरों का कंटेंट तैयार कर सकें। यह काम सांस्थायिक तरीके से होता है। तभी हैरानी नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं से लेकर उसके आईटी सेल के प्रमुख तक के सोशल मीडिया पोस्ट को फर्जी पोस्ट के तौर पर टैग किया गया। ऐसा नहीं है कि सिर्फ भाजपा का आईटी सेल फर्जी खबरें फैलाता है। बाकी पार्टियों के आईटी सेल के जरिए भी यह काम हो रहा है। फर्क इतना है कि विपक्षी पार्टियां सरकार का विरोध करने के लिए कंटेंट तैयार करती हैं और सरकारी पार्टी का आईटी सेल विपक्ष का विरोध करने के साथ साथ देश में सांप्रदायिक विभाजन बढ़ाने और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाला कंटेंट तैयार करता है। यह देश की बहुसंख्यक आबादी के भीतर ‘हिंदुत्व कॉमनसेंस’ विकसित करने के लार्जर प्लान का हिस्सा है। सो, अगर सत्तारूढ़ दल और कुछ हद तक विपक्षी पार्टियां भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से पैदा हुई चिंता को समझें और ईमानदारी दिखाएं तो यह समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी।

केंद्र सरकार के बनाए नए आईटी कानून में यह प्रावधान है कि किसी भी पोस्ट या वीडियो के ओरिजिन का पता लगाया जाए और उसके खिलाफ कार्रवाई हो। लेकिन मुश्किल यह है कि इस कानून को लागू भी तो उसी को करना है, जिसको इस तरह की पोस्ट या वीडियो से सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा होता है। तभी यह माना जा रहा है कि इस कानून के जरिए विरोधी पार्टियों और नेताओं की नकेल कसी जाएगी। आखिर इस कानून का पालन कराने की जबरदस्ती में ही सरकार ने ट्विटर को घुटने पर ला दिया और उसने राहुल गांधी सहित कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर रोक लगाई। सो, इस कानून के दुरुपयोग की ज्यादा संभावना है।

जहां तक मुख्यधारा की मीडिया का सवाल है तो उसे बदलना भी आसान नहीं होगा। अव्वल तो ज्यादातर चैनल और अखबार माई-बाप सरकार की कृपा से चल रहे हैं। सरकारी विज्ञापन बंद हो जाए या कम हो जाए तो दुकानें बंद हो जाएंगी। जहां विज्ञापन का दांव काम नहीं आता है वहां मीडिया समूह की स्थिति ‘दैनिक भास्कर’ जैसी कर दी जाती है। चूंकि लगभग सारे मीडिया समूहों ने मीडिया के अलावा दस तरह के दूसरे धंधे किए हुए हैं इसलिए उनके लिए सरकार के विरोध में खड़ा होना संभव नहीं है। ऊपर से पिछले सात साल में मीडिया का माहौल भी इतना सांप्रदायिक हुआ है कि अनेक स्वंयभू कमांडर पैदा हो गए हैं, जो पूरी प्रतिबद्धता के साथ खबरों को सांप्रदायिक रंग देते हैं ताकि सत्तापक्ष को लाभ पहुंचा सकें। तभी मीडिया एक दुष्चक्र में फंसा हुआ दिख रहा है, जिसमें से निकालना आसान नहीं होगा। इसे लोगों की जागरूकता और समझदारी के जरिए ही ठीक किया जा सकता है लेकिन उसमें बहुत समय लगेगा।

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