बिना न्यायालय के अनुमति के नहीं लिए जा सकते सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामले वापस

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अनूप भटनागर

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय की मंजूरी के बगैर सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले वापस नहीं लिये जा सकते। यह आदेश निश्चित ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार के लिए एक शुभ संकेत है, लेकिन इससे आपराधिक छवि वाले नेताओं को चुनाव लड़कर संसद या विधानमंडल में पहुंचने से रोकना संभव नहीं है।

आपराधिक छवि वाले नेताओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले वापस लेने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जघन्य अपराधों के साथ ही सफेदपोश अपराधों के आरोपी नेताओं को चुनाव प्रक्रिया से बाहर करने के लिए जरूरी है कि इनके खिलाफ मुकदमों पर तेजी से निर्णय सुनाया जाये क्योंकि अदालत द्वारा दो साल या उससे अधिक की सजा मिलने की स्थिति में वे स्वत: ही जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जायेंगे। आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को निर्वाचित होकर संसद या विधानमंडल में पहुंचने से रोकने के लिये राजनीतिक दलों, पुलिस-प्रशासन और आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों के गठजोड़ को तोड़ना बहुत जरूरी है। इस गठजोड़ को तोड़ने के लिये जांच एजेन्सियों को किसी भी तरह के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव से मुक्त कराना होगा। सुनिश्चित हो कि आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज मामलों की तेजी से जांच करके अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया जाये और निचली अदालतें तेजी से इन पर सुनवाई करके अपने फैसले सुनायें।

दरअसल, आपराधिक मामलों में इन माननीय नेताओं के खिलाफ जांच ही पूरी नहीं होती। जांच पूरी नहीं होती है तो आरोप पत्र दाखिल नहीं होते हैं। आरोप पत्र दाखिल नहीं होता है तो मुकदमा चलाने के लिये अभियोग निर्धारित नहीं हो सकते और ऐसे मुकदमे अधर में ही लटके रहते हैं। उच्चतम न्यायालय की मंशा है कि आपराधिक छवि वाले इन नेताओं के खिलाफ लंबित मुकदमों के तेजी से निपटारे हों। न्यायालय के सख्त रुख के बाद केन्द्र सरकार ने इन नेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित कीं लेकिन इसके बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इसकी वजह जांच एजेंसियों के कामकाज में सत्तारूढ़ दलों की ओर से पड़ने वाला कथित दबाव और पर्याप्त संख्या में इन एजेंसियों के पास स्टाफ का नहीं होना भी है।

सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की सुनवाई में विलंब की एक वजह अचानक ही संबंधित अदालत के न्यायाधीश का तबादला भी होती है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए अब शीर्ष अदालत ने आदेश दिया है कि सांसदों और विधायकों के विरुद्ध मामले की सुनवाई कर रहे विशेष अदालतों के न्यायाधीशों का अगले आदेश तक स्थानांतरण नहीं किया जाएगा। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति और मौत जैसे अपवादों में यह आदेश लागू नहीं होगा।

यह सही है कि विशेष अदालतें नेताओं से संबंधित मुकदमों की सुनवाई कर रही हैं लेकिन इनकी रफ्तार अपेक्षित नहीं है। किसी न किसी वजह से इन अदालतों में सुनवाई स्थगित होती रहती है। यह स्थिति तब है जब शीर्ष अदालत कह चुकी है कि विशेष अदालतें सांसदों और विधायकों से संबंधित उन आपराधिक मुकदमों को प्राथमिकता दें, जिनमें अपराध के लिए उम्र कैद या मौत की सजा हो सकती है।

यही नहीं, न्यायालय ने तो 16वीं लोकसभा के चुनाव से ठीक पहले मार्च, 2014 में एक आदेश में कहा था कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (1), धारा 8 (2) और धारा 8 (3) के दायरे में आने वाले अपराधों में मुकदमे का सामना कर रहे सांसदों और विधायकों के मामले, जिनमें आरोप निर्धारित हो चुके हैं, यथासंभव एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाए। यदि किसी वजह से ऐसे मुकदमे की सुनवाई एक साल के भीतर पूरी नहीं होती है तो विशेष अदालत को इसके कारणों के साथ उच्च न्यायालय को स्पष्टीकरण देना था। इसके बावजूद नेताओं के खिलाफ गंभीर अपराधों के मुकदमों की सुनवाई अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि डाकेजनी, अपहरण, जबरन वसूली, बलात्कार, बलात्कार के प्रयास, हत्या और हत्या के प्रयास जैसे अपराधों से इतर बड़ी संख्या में सांसद और विधायक सफेदपोश अपराध के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि इस समय 51 पीठासीन और पूर्व सांसदों सहित 120 से ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ धनशोधन के आरोपों की प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है जबकि 121 अन्य ऐसे ही माननीयों के खिलाफ तरह-तरह के अपराध के आरोपों में सीबीआई ने भी मामले दर्ज कर रखे हैं। प्रधान न्यायाधीश एनवी रमणा ने चिंता व्यक्त की और कहा कि प्रवर्तन निदेशालय के पास 76 मामले 2012 से लंबित हैं जबकि सीबीआई के पास 2000 से 58 मामले लंबित हैं। यह अपने आप में सारी स्थिति बयां कर रहे हैं। ऐसा महसूस होता है कि सत्तारूढ़ दल और नौकरशाही भी स्थिति में बदलाव नहीं करना चाहते। सत्तारूढ़ दलों में अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो निश्चित ही वे दूसरी मदों पर धन व्यय करने की बजाय अदालतों और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देते। न्यायपालिका को ही यह सुनिश्चित कराना होगा कि जांच एजेंसियां निर्धारित समय के भीतर जांच पूरी करके अदालत में आरोप पत्र दाखिल करें और विशेष अदालतों में किसी भी कीमत पर सुनवाई टाली नहीं जाये।

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