चीन की विस्तारवादी नीतियों से उसके शत्रु ही नहीं मित्र भी परेशान

रंजीत कुमार

यह महज संयोग नहीं कि जब भारतीय नौसेना के चार सबसे ताकतवर युद्धपोत दक्षिण चीन सागर के मुहाने पर दस्तक दे रहे थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में संयुक्त राष्ट्र के प्रभावशाली सदस्यों ने एक स्वर से चीन को आगाह किया कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का पालन करे। इन दिनों दक्षिण चीन सागर में विनाशकारी मिसाइलों से लैस चार बड़े भारतीय युद्धपोत विचरण कर रहे हैं, जिनकी योजना अगले दो महीनों में दक्षिण पूर्वी एशिया के तटीय देशों वियतनाम, फिलीपींस, सिंगापुर और इंडोनेशिया के साथ साझा नौसैनिक युद्धाभ्यास करने की है। इसके बाद ये पोत पश्चिमी प्रशांत में जाकर अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ साझा मालाबार नौसैनिक युद्धाभ्यास भी करेंगे। चीनी की समुद्री सीमा के करीब भारतीय नौसैना अन्य देशों के साथ इस तरह अपना शक्ति प्रदर्शन पिछले कई सालों से कर रही है।

दक्षिण चीन सागर में सैनिक या व्यापारिक पोतों की खुली आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ही भारत हिंद-प्रशांत इलाके की अन्य बड़ी नौसैनिक ताकतों के साथ खड़े होकर चीन को ललकार रहा है, लेकिन चीन की भी हेकड़ी बढ़ती जा रही है। नतीजतन, दक्षिण चीन सागर में तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।

“दक्षिण चीन सागर का चीन पर नामकरण उसी तरह किया गया है, जिस तरह भारत के निकट के सागरीय इलाके को हिंद महासागर या इंडियन ओशन कहा जाता है। जिस तरह इंडियन ओशन भारत का नहीं है, उसी तरह दक्षिण चीन सागर भी चीन का नहीं है।”लेकिन चीन ने इस इलाके में एक काल्पनिक नाइन-डैश लाइन खींचकर उसके अंदर आने वाले सभी समुद्री इलाकों पर अपना दावा ठोक दिया है। इस इलाके में विदेशी पोतों के विचरण करने पर फिलहाल तो चीन केवल एतराज ही करता है, लेकिन यदि वह अपना प्रभुत्व जमाने में कामयाब हो गया तो भविष्य में इधर से किसी पोत के गुजरने पर रोक-टोक भी कर सकता है। भारत सहित दुनिया की बड़ी नौसैनिक ताकतों ने चीन के इन दावों को नजरअंदाज किया है। वे अक्सर युद्धपोत वहां भेजकर चीन को आगाह करते रहते हैं कि यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री इलाका है, जहां संयुक्त राष्ट्र की समुद्री कानून संधि (अनक्लास) के तहत सभी विदेशी पोतों को खुली आवाजाही की छूट है। यही जताने के लिए पिछले 2 अगस्त को जर्मनी ने दो दशक बाद पहली बार अपना एक फ्रिगेट दक्षिण चीन सागर के इलाके में तैनात किया। इसके पहले ब्रिटेन ने अपना नया विमानवाहक पोत एलिजाबेथ दक्षिण चीन सागर के इलाके में भेज कर चीन को चिढ़ाया था। अमेरिका ने भी पिछले महीने अपने विमानवाहक पोतों का विशाल बेड़ा वहां भेजा था। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के युद्धपोत भी इस इलाके में भेजे जाते रहे हैं।

इन विदेशी पोतों के जवाब में चीन ने अगस्त के दूसरे सप्ताह में अपने कई युद्धपोतों को उतारकर एक बड़ा नौसैनिक अभ्यास किया। ध्यान रहे, पूर्वी चीन सागर में भी चीन ने जापान के साथ द्वीपों के स्वामित्व को लेकर विवाद छेड़ा हुआ है। ठीक इन्हीं दिनों जब भारतीय युद्धपोतों ने दक्षिण चीन सागर में प्रवेश किया तो चीन ने अप्रत्यक्ष चेतावनी भरे लहजे में उम्मीद जताई कि कोई देश शांति भंग करने की कार्रवाई नहीं करेगा।
साफ है कि इस इलाके को लेकर चीन और अन्य क्षेत्रीय व बड़ी ताकतों के बीच जोर आजमाइश तेज होने लगी है। यदि दक्षिण चीन सागर के इलाके पर चीन के स्वामित्व के दावे को आज खारिज नहीं किया गया तो बाद में वह न केवल भारत बल्कि सभी विदेशी पोतों की आवाजाही को नियंत्रित कर सकता है। इस इलाके का अंतरराष्ट्रीय आवागमन के लिए खुला रहना इसलिए भी अहम है क्योंकि व्यापारिक पोतों के जरिए भारत का आधे से अधिक आयात-निर्यात इसी रास्ते से होता है। यदि दक्षिण चीन सागर के इलाके पर चीन के अधिकार के दावे को आज गैरकानूनी नहीं ठहराया गया तो वह बाद में इस इलाके से सैनिक पोतों की आवाजाही को पूरी तरह रोकने का अधिकार हासिल कर सकता है और व्यापारिक पोतों पर टैक्स लगाने का अधिकार भी ले सकता है। भारत के लिए विशेष चिंता की बात इसलिए है क्योंकि तनाव की स्थिति में चीन भारत के इस मार्ग से होने वाले आधे से अधिक व्यापार पर रोक लगा कर उसकी अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा सकता है।

दक्षिण चीन सागर जैसे समृद्ध इलाके पर चीन की ललचाई निगाह इसलिए पड़ी है कि यह दुनिया का सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्ग है, जहां से दुनिया के व्यापार का पांचवां हिस्सा गुजरता है। 36 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में 900 ट्रिलियन घन फीट प्राकृतिक गैस और सात अरब बैरल खनिज तेल है। इसके अलावा इस इलाके से दुनिया का कुल 12 प्रतिशत मछली व्यापार होता है। इस विशाल प्राकृतिक संपदा पर एकाधिकार जमाने के लिए ही चीन ने वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के साथ प्रादेशिक इलाकाई विवाद छेड़ रखा है और इस इलाके में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अपने समुद्री इलाके का कानूनी विस्तार करने की रणनीति अपना रहा है।

दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की इस दादागीरी को निरस्त करने के मकसद से भारत ने अन्य ताकतवर देशों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा अध्यक्षता अवधि में समुद्री सुरक्षा पर विशेष बैठक का आयोजन किया। जिस तरह चीन के दोस्त रूस ने भी इस बैठक में पारित साझा प्रस्ताव में भारतीय मसौदे का समर्थन किया, उससे चीन को समझ लेना चाहिए कि उसकी विस्तारवादी नीतियों से उसके साथी देश भी चिंतित हैं। इससे दुनिया में तनाव का माहौल पैदा होने लगा है, जिससे चीन की छवि एक दुष्ट राष्ट्र जैसी बनती जा रही है।

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