प्रधानमंत्री मोदी का अन्न उत्सव है अन्न बचाने का एक कारगर उपाय

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प्रमोद भार्गव

देश के गरीब कल्याण इतिहास में 7 अगस्त 2021 ऐतिहासिक दिन बनने जा रहा है। इस दिन नरेंद्र मोदी ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के अंतर्गत ‘अन्न उत्सव’ कार्यक्रम की शुरूआत करेंगे। इसी दिन मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान भी मध्य-प्रदेश में इस अनूठी योजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री से आभासी रूप मंे जुड़कर करेंगे। मध्य-प्रदेश की सभी 25,434 उचित मूल्य की दुकानों पर यह कार्यक्रम सम्पन्न होगा। प्रत्येक दुकान पर 100 हितग्राहियों को राशन की सामग्री सीलबंद थैले में वितरीत की जाएगी। इस योजना के लागू होने के बाद सबसे बड़ा लाभ देश को यह होगा कि गरीब को अनाज एक तो गुणवत्ता युक्त मिलेगा, दूसरे अनाज मिलावट से मुक्त रहेगा और तीसरे अनाज का छीजन नहीं होगा। दुकानदार तौलने में जो गड़बड़ी करते थे, वह अब नहीं कर पाएंगे। नतीजतन भोजन की पौष्टिकता बनी रहेगी। बच्चे कुपोषण से बचे रहेंगे। इस प्रकार से अनाज के वितरण में निरंतरता बनी रहती है तो हम यजुर्वेद के उस मंत्र को साकार रूप में बदलने में सफल होंगे जो भोजन और ऊर्जा के बीच अंतरसंबंध की व्याख्या करता है। शरीर को जिंदा रहने के लिए आहार की और आत्मा को अच्छे विचारों की जरूरत पड़ती है, जो शुद्ध और सात्विक भोजन से ही संभव है।

ऊॅ यन्तु नद्यौ वर्षन्तु पर्जन्या सुपिप्पला ओषधयो भवन्तु

अन्नवताम मोदनवताम मामिक्षगमयति एषाम राजा भूयासम्।

ओदनम् मुद्रवते परमेष्ठी वा एषः यदोदनः, पमावैनं श्रियं गमयति।

यजुर्वेद में दिए इस मंत्र का अर्थ है, ‘हे ईश्वर बादल पानी बरसाते रहें और नदियां बहती रहें। औषधीय वृक्ष फलें-फूलें और सभी वृक्ष फलदायी हों। मुझे अन्न और दुग्ध उत्पादन करने वालो ंसे लाभ प्राप्त हो और ऐसी धरती का मैं राजा बनूं। हे ईश्वर थाली रखा हुआ भोजन आपके द्वारा दिया प्रसाद है। यह मुझे स्वस्थ और समृद्ध बनाए रखेगा।’ साफ है राजा प्रकृति और अन्नदाता से उत्तम भोजन की सामग्री देते रहने की प्रार्थना कर रहा है। मोदी देश में शिवराज .प्रदेश में अन्न की सुरक्षा से जुड़े इसी तरह के उपायों को इस योजना के जरिए बल दे रहे हैं। इस योजना के शुरू हो जाने से देशभर के 80 करोड़ उन लोगों को लाभ मिलेगा, जो 2 रुपए किलो गेहूं और 3 रुपए किलो चावल सरकारी उचित मूल्य की दुकानों से प्राप्त कर रहे हैं। ये देश की आबादी के 67 प्रतिशत लोग हैं। हालांकि गरीबों को खाद्य सुरक्षा कानून को वजूद में लाकर यह सुविधा पूरे देश में लागू है। लेकिन इस सस्ते अनाज में मिलावट और कम तौले जाने की शिकायतें लगातार मिल रही थीं। कभी-कभी सड़ा और खराब अनाज देने की शिकायतें भी अखबारों की सुर्खियों में रही हैं। चूंकि अब बंद थैले में अनाज दिया जाएगा, इसलिए यह सुविधा इस कानून का उज्जवल पक्ष है। इसके दायरे में शहरों में रहने वाले 50 प्रतिशत और गांवों में रहने वाले 75 फीसदी लोग आएंगे।

देश में किसानों की मेहनत और जैविक व पारंपारिक खेती को मध्य-प्रदेश सरकार द्वारा बढ़ावा देने के उपायों के चलते कृषि पैदावार लगातार बढ़ रही है। अब तक हरियाणा और पंजाब ही गेहूं उत्पादन में अग्रणी प्रदेश माने जाते थे, लेकिन अब मध्य-प्रदेश, बिहार, उत्तर-प्रदेश और राजस्थान में भी गेहूं की रिकार्ड पैदावार हो रही है। इसमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, दालें और मोटे अनाज व तिलहन शामिल हैं। इस पैदावार को 2020-21 तक 28 करोड़ टन पहुंचाने का सरकारी लक्ष्य रखा गया था, लेकिन यह लक्ष्य 2019-20 में ही अनाज का उत्पादन 29.19 करोड़ टन करके पूरा कर लिया। यह अनाज देश की आबादी की जरूअत से 7 करोड़ टन ज्यादा है। 2020-21 में 350 मिलियन टन किसान ने अनाज उत्पादन कर कोरोना काल में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। आर्थिक उदारीकरण अर्थात पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की पोल कोरोना काल में खुल गई है, जबकी देश यदि इस कालखंड में भोजन से मुक्त रहा है तो यह खेती-किसानी की ही देने है। साफ है, देश की ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को तरल बनाए रखने के साथ देश की पूरी आबादी का पेट भरने का इंतजाम भी देश के अन्नदाता ने किया है।  मध्य-प्रदेश सरकार लगातार, भारत सरकार द्वारा रिकॉर्ड अनाज उत्पादन के क्षेत्र में कृषिकर्मण पुरस्कार प्राप्त कर रही है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और किसान को इसलिए भी बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि देश से किए जाने वाले कुल निर्यात में 70 प्रतिशत भागीदारी केवल कृषि उत्पादों की है। यानी सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा कृषि उपज निर्यात करके मिलती है। सकल घरेलू उत्पाद दर में भी कृषि का 45 प्रतिशत योगदान है। जिन 80 करोड़ लोगों को कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत सस्ता अनाज व अन्य लाभ दिए जाते हैं, खेती-किसानी, दूध और मांस उत्पादन में श्रमिक के रूप में बड़ी भागीदारी करते हैं। इसलिए सस्ता अनाज सुरक्षित रूप में इन तक पहुंचाने में बंद थैले की योजना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी सहित थॉमस पिकेटी दावा करते रहे हैं, कि कोरोना से ठप हुई ग्रामीण भारत पर जबरदस्त अर्थ-संकट गहराएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2017-18 के निष्कर्ष ने भी कहा था कि 2012 से 2018 के बीच एक ग्रामीण का खर्च 1430 रुपए से घटकर 1304 रुपए हो गया है, जबकि इसी समय में एक शहरी का खर्च 2630 रुपए से बढ़कर 3155 रुपए हुआ है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत में यही परिभाषित है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा में गरीब आदमी को ही सबसे ज्यादा संकट झेलना होता है। लेकिन इस कोरोना संकट में पहली बार देखने में आया है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार रहे बड़े और मध्ययम उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी न केवल आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, बल्कि उनके समक्ष रोजगार का संकट भी पैदा हुआ है। लेकिन बीते दो कोरोना कालों में खेती-किसानी से जुड़ी उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि देश को कोरोना संकट से केवल किसान और पशु-पालकों ने ही उबारे रखने का काम किया है। फसल, दूध और मछली पालकों का ही करिश्मा है कि पूरे देश में कहीं भी खाद्यान्न संकट पैदा नहीं हुआ। यही नहीं जो प्रवासी मजदूर ग्रामों की ओर लौटे उनके लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था का काम भी गांव-गांव किसान व ग्रामीणों ने ही किया। वे ऐसा इसलिए कर पाए, क्योंकि उनके घरों में अन्न के भंडार भरपूर थे।

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण नीति’ लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। गोया, बंद थैलों में गरीबों तक अनाज पहुंचाने का उपाय खेती-किसानी, दुग्ध पालकों और मांस उत्पादकों के श्रम से जुड़े मजदूरों को भविष्य में बड़ा सहारा बनेगी।

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