मजहब के अनोखे खेल : इंसानियत के नाम पर हैवानियत धारण करता इंसान

 

 

—विनय कुमार विनायक
आज मजहब के नाम इंसानियत खो रहा इंसान,
आज मजहब के नाम क्रूर कट्टर हो रहा इंसान!

धर्म और मजहब अलग-अलग चीज है रे इंसान,
धर्म वो जो धारण हो,मजहब दिखाते झूठी शान!

धर्म वो जिसमें हिंसा नहीं, हो मानवता का ज्ञान,
मजहब की आज हो गई खून-खराबे की पहचान!

धर्म में दया ममता करुणा समानता व सम्मान,
मजहब में ईर्ष्या द्वेष जलन गुटबाजी की आन!

धर्म में तर्क वितर्क, खंडन मंडन का है प्रचलन,
मजहब में मनाही,दूसरे धर्म की अच्छाई ग्रहण!

मजहबी उन्मादी है आज पराकाष्ठा पर आसीन,
मजहबी होते हैं चरित्र निर्माण के प्रति उदासीन!

मजहब में है अंतरराष्ट्रीय दिखावा औ’ दुर्भिसंधी,
मजहब में है धार्मिक जाति भेदभाव की हदबंदी!

मजहबी अलग वेशभूषा,शान-शौकत में इतराते,
मजहबी परधर्म के सद्गुण ग्रहण में कतराते!

मजहबवालों ने गैरमजहब से रार लिए हैं ठान,
अच्छाई-बुराई को जानकर भी बने हुए अंजान!

कहा तो गया है मजहब नहीं सिखाता बैरभाव,
पर आज मजहब में अच्छे गुणों का है अभाव!

मजहब में सर्वधर्म समभाव से नहीं कुछ काम,
हमेशा जनसंख्या बढ़ाने के लिए रहते परेशान!

विदेशी मजहबवाले देश पर नहीं हैं आस्थावान,
विदेशी आक्रांताओं को ऐ लोग समझते महान!

विधर्मियों ने हमारे पूर्वज का लिया है बलिदान,
पर आज मजहबवाले गाते उनका ही गुणगान!
—विनय कुमार विनायक

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