सुप्रीम कोर्ट का संदेश – राजद्रोह से जुड़े औपनिवेशिक दौर के कानून का आज कोई औचित्य नही

प्रस्तुति – श्रीनिवास आर्य

​​आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 2019 के बीच राजद्रोह कानून के तहत चलाए जाने वाले मुकदमों की संख्या में 160 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यही नहीं इस दौरान दोषी पाए जाने वाले मामलों का अनुपात भी 33.3 फीसदी से घटकर 3.3 फीसदी पर पहुंच गया। यानी इन मुकदमों में सजा बहुत कम लोगों को हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने संदेश दिया है कि राजद्रोह से जुड़े औपनिवेशिक दौर के कानून का आज कोई औचित्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि इस सरकार ने औपनिवेशिक दौर के बहुत से कानूनों को खत्म किया है, लेकिन पता नहीं राजद्रोह कानून पर इसकी नजर क्यों नहीं पड़ रही है। इस सवाल में सचमुच दम है कि आखिर अंग्रेजों द्वारा लाया गया यह कानून, जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुषों की आवाज दबाने के लिए किया गया, अब तक क्यों बचाए रखा गया है। महात्मा गांधी पर 1922 में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ, तब उन्होंने कहा था, ‘सेक्शन 124ए के तहत मुझ पर केस दर्ज हुआ है। इंडियन पीनल कोड की जिन राजनीतिक धाराओं का इस्तेमाल नागरिकों की आजादी को दबाने के लिए किया जाता है, उनमें इस धारा को शायद राजकुमार जैसी पदवी मिली हुई है।’ 1962 में केदार नाथ बनाम बिहार सरकार में शीर्ष अदालत ने राष्ट्रद्रोह कानून को लेकर बड़ी बात कही थी। उसने स्पष्ट किया था कि सरकार विरोधी बयान के बाद अगर बड़े पैमाने पर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश नहीं होती है तो इस धारा के इस्तेमाल से बचा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इसकी नजीर भी पेश की। खालिस्तान समर्थक बलवंत सिंह ने भारत से अलग होने के लिए सिखों से हथियार उठाने की अपील की थी, लेकिन उसके बयान के कारण हिंसा नहीं हुई। इसलिए अदालत ने उसे बरी कर दिया। शीर्ष अदालत की इन नजीरों से भी इस कानून के दुरुपयोग में कमी नहीं आई है।

आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 2019 के बीच राजद्रोह कानून के तहत चलाए जाने वाले मुकदमों की संख्या में 160 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यही नहीं इस दौरान दोषी पाए जाने वाले मामलों का अनुपात भी 33.3 फीसदी से घटकर 3.3 फीसदी पर पहुंच गया। यानी इन मुकदमों में सजा बहुत कम लोगों को हो रही है। इसके अलावा कुछ और कानूनों का भी दुरुपयोग हो रहा है। नैशनल सिक्यॉरिटी एक्ट यानी एनएसए और अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट यानी यूएपीए जैसे कानूनों पर भी सवाल उठे हैं। इनके तहत गिरफ्तार किए गए कई लोग वर्षों सुनवाई का इंतजार करते रह जाते हैं। कानून की कड़ी धाराएं जमानत मिलना मुश्किल बना देती हैं। लिहाजा आरोपों की सचाई सामने आने से पहले ही उन्हें लंबी अवधि तक तरह-तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं। ऐसे मामलों में बरसों बाद अभियुक्त के बाइज्जत बरी हो जाने के बावजूद यह सवाल नहीं पूछा जाता कि आखिर सबूत न होने पर भी ऐसी धाराएं क्यों लगा दी गईं? आतंकवाद जैसी समस्याओं के मद्देनजर इन कड़े कानूनों की जरूरत भी है, लेकिन इनका दुरुपयोग रोकना भी उतना ही जरूरी है।
(एनबीटी से साभार)

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