न्यायपालिकाओं को कोरोना काल में अधिवक्ताओं के ‘सहयोग’ की आवश्यकता

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अनूप भटनागर

कोविड-19 के दौरान देश की अदालतों में प्रत्यक्ष रूप से मुकदमों की सुनवाई लगभग बंद है। अदालतें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आवश्यक मुकदमों की सुनवाई कर रही हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई की व्यवस्था का यह लाभ है कि अदालत परिसर में अपने मुकदमे का इंतजार करने की बजाय वकील अपने चैंबर, घर, कार्यालय या किसी अन्य उचित स्थान से बहस कर सकते हैं।

इस दौरान वकीलों से अपेक्षा की जाती है कि वे अधिवक्ता कानून में प्रदत्त ड्रेस कोड और शिष्टाचार का पालन करेंगे। लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि वकीलों में पेशेगत गरिमा बनाए रखने, ड्रेस कोड का पालन करने और शिष्टाचार में चूक हो रही है। ऐसा करने वालों में डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता भी शामिल हैं।

यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय से लेकर निचली अदालत तक के पीठासीन न्यायाधीशों को अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए ऐसा आचरण करने वाले वकीलों को फटकार ही नहीं लगानी पड़ी है बल्कि उन पर जुर्माना भी किया है।

महामारी काल में न्यायपालिका ने वकीलों को ड्रेस कोड में मामूली-सी रियायत प्रदान की थी। न्यायपालिका को अपेक्षा थी कि वकील मुकदमों में पेश होते वक्त अपने पेशे के अनुरूप गरिमामय परिधान में होंगे और शिष्टाचार का ध्यान रखेंगे। लेकिन कुछ वकील न तो गरिमामय पोशाक में होते हैं और न ही वे अदालत के सम्मान के अनुरूप आचरण कर रहे होते हैं। वकीलों से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि न्यायालय की कार्यवाही के दौरान किसी प्रकार का शोरगुल या व्यवधान नहीं हो। लेकिन कई मामलों में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वकील सड़क के किनारे, पार्क में या फिर सीढ़ियां चढ़ते हुए अथवा स्कूटर पर यात्रा करते हुए ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बहस करते नजर आये।

उच्चतम न्यायालय ने लॉकडाउन से उत्पन्न स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 13 मई, 2020 को वकीलों के लिये ड्रेस कोड में कुछ राहत प्रदान की थी। न्यायालय ने वकीलों को काला गाउन नहीं पहनने की छूट दी थी लेकिन उनके लिए अगले आदेश तक या मौजूदा चिकित्सा अनिवार्यता रहने तक सफेद शर्ट-सलवार-कमीज-सफेद साड़ी पहने और गले में वकीलों का सफेद बैंड बांधना अनिवार्य था। इस राहत का तात्पर्य यह नहीं था कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई के दौरान न्यायाधीश के समक्ष पेश होते वक्त वकील रंग-बिरंगे कपड़े पहने होंगे, या फिर कार में सिगरेट पीते हुए या स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ कर बहस करेंगे। अधिवक्ता कानून, 1961 की धारा 49 (1) (जीजी) के तहत बने नियम वकीलों (नामित वरिष्ठ अधिवक्ता या अन्य अधिवक्ताओं) के लिये ड्रेस कोड निर्धारित करते हैं। इस ड्रेस कोड के अंतर्गत वकीलों के लिये सफेद शर्ट पहनना और सफेद नेक बैंड बांधना अनिवार्य है।

लेकिन, देखा जा रहा है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मुकदमों की सुनवाई में शामिल होने वाले वकील उचित परिधान में नहीं होते। स्थिति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कैमरे की स्थिति बदलने की वजह से एक वरिष्ठ अधिवक्ता सफेद शर्ट के साथ पैंट की बजाय नेकर पहने हुए कुर्सी पर बैठे नजर आये। कई बार वकील रंगीन कपड़े पहने हैं, या फिर सिर्फ बनियान ही पहने हैं या बिस्तर में हैं। चूंकि कैमरा झूठ नहीं बोलता है और इसी वजह से यह नजारे न्यायाधीशों की नजर में आ गये जिस पर उन्होंने कड़ी आपत्ति की और ऐसा आचरण करने वाले वकीलों को फटकार भी लगाई।

इस तरह का अजीब मामला पिछले साल उच्चतम न्यायालय में भी न्यायाधीशों के सामने आ गया था, जिसमें संबंधित वकील टी-शर्ट पहनकर कार्यवाही में शामिल हुए थे। न्यायालय को उस वकील का यह आचरण नागवार लगा और उसने उन्हें इस आचरण के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि वर्चुअल सुनवाई में भी कम से कम शिष्टाचार बनाए रखें। राजस्थान उच्च न्यायालय में तो एक वकील बनियान पहन कर ही पेश हो गये थे जिस पर पीठासीन न्यायाधीश ने नाराजगी व्यक्त की थी।

यही स्थिति उड़ीसा उच्च न्यायालय में देखने में आयी जहां एक वकील बहस के समय अपना नेक बैंड नहीं बांधे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अदालत ने उन पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी बार को ऐसे असावधानी नहीं बरतने की हिदायत दी और कहा कि एक मामले में वर्चुअल सुनवाई के दौरान एक वकील की कार में पीछे एक अन्य व्यक्ति भी बैठा हुआ था। इस तरह का आचरण अदालती कार्यवाही का अनादर है।

न्यायपालिका इस समय बहुत ही विषम परिस्थितियों में अदालती कामकाज निपटा रही है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका का ही अभिन्न अंग बार के सदस्य वकीलों से अपेक्षा की जाती है कि वे महामारी के इस दौर में स्थिति की गंभीरता को समझेंगे और सुचारु ढंग से अदालतों की वर्चुअल कार्यवाही के संचालन में सहयोग करेंगे।

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