अभिभावक,विद्यार्थी और ऑनलाइन शिक्षा

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मानस प्रतिम गोहाईं

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में रहते हैं रुद्रसेन सिंह। उनका स्कूल पिछले सालभर से बंद है। ऑनलाइन क्लास भी नहीं चल रही। रुद्रसेन का कहना है, ‘ऑनलाइन क्लास चले भी तो हम पढ़ नहीं सकते। बेसिक फोन से ऑनलाइन पढ़ाई कैसे होगी? किसी के घर में एक एंड्रॉयड फोन है भी, तो उसी घर में तीन-चार बच्चे भी तो हैं। एक से सब कैसे पढ़ सकते हैं?’

रुद्रसेन के पास फोन नहीं है। उनसे यह बातचीत भी उनके ही गांव के एक दूसरे व्यक्ति के फोन से हुई। रुद्रसेन ने बताया कि उनके गांव में सैकड़ों ऐसे बच्चे हैं, जिनके पास फोन नहीं है। कहा, ‘सरजी और मैडमजी लोगों को भी पता नहीं है कि कंप्यूटर कैसे चलाया जाता है।’ यानी कई शिक्षकों को ऑनलाइन क्लास लेने का तरीका नहीं पता। कोविड महामारी के बीच लॉकडाउन के चलते स्कूल बंद हो गए। उसके बाद से देश में लाखों बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जूझना पड़ रहा है। कई बच्चे तो इंतजार करते हैं कि उनके मां-बाप काम से वापस लौटें तो फोन पर वह देखें कि स्कूल से क्या चीज वट्सऐप की गई। कुछ बच्चे पड़ोसियों से स्मार्टफोन देने की गुहार लगाते हैं।

आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले में जिला परिषद हाई स्कूल के सेकेंडरी सेक्शन में हिंदी पढ़ाते हैं सत्यनारायण शास्त्री। उनका कहना है कि उनके 5-6 फीसदी छात्रों के पास ही ऑनलाइन अटेंड करने की सुविधा है। यह सब सरकार की जानकारी में भी है। पिछले महीने ही शिक्षा मंत्रालय ने संसद की एक समिति के सामने कबूल किया कि छात्रों को डिजिटल डिवाइसेज की तंगी का सामना करना पड़ रहा है। मंत्रालय ने बताया कि उत्तर प्रदेश और झारखंड में करीब 55 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। राजस्थान में ऐसे बच्चों की संख्या एक लाख 80 हजार है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में लगभग 70 फीसदी बच्चों के पास ऑनलाइन क्लास करने की सुविधा नहीं है। यही हाल दूसरे राज्यों में भी है।

बिहार में 1 करोड़ 40 लाख छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई का इंतजाम नहीं है। झारखंड में आंकड़ा साढ़े 32 लाख और कर्नाटक में लगभग 31 लाख का है। असम में ऐसे 31 लाख छात्र हैं तो ओडिशा में 15 लाख और हरियाणा में 10 लाख। ओडिशा में सुंदरगढ़ जिले के लेहंड़ा गांव में एक सरकारी स्कूल है। वहां पढ़ाने वाले अनिल कुमार प्रधान बताते हैं कि कई घरों में स्मार्टफोन तो है, लेकिन इंटरनेट कनेक्शन नहीं है। प्रधान बताते हैं, ‘इसे देखते हुए हम हफ्ते में एक बार बच्चों के घर जाते हैं ताकि उन्हें कुछ समझा सकें और यह भी देख सकें कि टीचरों या स्कूल से ये बच्चे जब बिल्कुल ही कट जाते हैं, तो कैसे पढ़ते हैं।’

ईस्ट गोदावरी जिले में हिंदी पढ़ाने वाले शास्त्री ने बताया कि स्कूली पढ़ाई करने वाले बच्चों की माताओं के खाते में राज्य सरकार ने 15 हजार रुपये जमा कराए थे, लेकिन कुछ ही परिवारों ने इस पैसे से स्मार्टफोन खरीदे। शास्त्री बताते हैं, ‘सरकार ने कहा था कि या तो 15 हजार रुपये ले लो, या लैपटॉप ले लो। अधिकतर परिवारों ने पैसे लेना पसंद किया था। लेकिन उनमें से ज्यादातर ने वह पैसा दूसरी जरूरी चीजों पर खर्च कर दिया। कइयों के पास तो खाने-पीने का ठीक इंतजाम भी नहीं था।’

शिक्षाविद और CBSE के चेयरमैन रह चुके अशोक गांगुली ने कहा कि 15 महीनों से स्कूलों के बंद रहने से पढ़ाई पर तो असर पड़ा ही है, देश में डिजिटल डिवाइड से भी परदा हट गया। वह कहते हैं कि बच्चों को SMS के जरिए कई तरह की चीजों से जोड़ा जा सकता है। गांगुली कहते हैं, ‘गांवों और कस्बाई इलाकों में बच्चों और उनके मां-बाप को हफ्ते में एक बार स्कूल बुलाया जा सकता है।’ शिक्षाविद मीता सेनगुप्ता का कहना है कि ऑनलाइन क्लास न कर पाने वाले कई बच्चे अब हो सकता है कि कभी स्कूल न आएं। ऐसे में उनके लिए स्कूल वापसी का कार्यक्रम चलाना होगा।

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