चुनावी मौसम आते ही अकाली-बसपा साथ-साथ

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राजकुमार सिंह

पंजाब में अभी जबकि सत्तारूढ़ कांग्रेस जबर्दस्त अंतर्कलह में उलझी है तथा मुख्य विपक्षी दल आम आदमी पार्टी और भाजपा को अगले साल के शुरू में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति तय करनी है, कई बार सत्तारूढ़ रह चुके शिरोमणि अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान कर बड़ा चुनावी दांव चल दिया है। शनिवार को घोषित गठबंधन के अनुसार विधानसभा की 117 सीटों में से 20 पर मायावती की बसपा चुनाव लड़ेगी, जबकि शेष 97 पर अकाली उम्मीदवार उतरेंगे। भाजपाई नेतृत्व वाले राजग से अकाली दल के अलगाव के बाद ही तय हो गया था कि पंजाब चुनाव में चतुष्कोणीय मुकाबला होगा, लेकिन इस नये गठबंधन से लगता है कि कहीं मुकाबला त्रिकोणीय ही न हो जाये और भाजपा की उपस्थिति कुछ शहरी सीटों तक ही न सिमट जाये। बेशक चुनाव वोट बैंक का अंकगणित भर नहीं होते, लेकिन उसे पूरी तरह नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता। कमोवेश हर चुनाव में वोट बैंक के अंकगणित के आधार पर ही समीकरण बिठाये जाते हैं।

2017 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में, दो बार से सत्तारूढ़ अकाली–भाजपा गठबंधन की पराजय तय समझी जा रही थी, लेकिन मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आप के बीच सिमट जायेगा, इसकी उम्मीद शुरू में किसी को नहीं थी। अगर कुछ घटनाओं से अंतिम क्षणों में मतदाताओं का रुख नहीं बदला होता तो दिल्ली में मूलाधार वाली आप आज पंजाब की सत्ता पर काबिज होती। 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब के मतदाताओं से आप को जैसा अप्रत्याशित समर्थन मिला, वह अन्य दलों से निराशा का संकेत भी है।

हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन की पंजाब की परंपरा के मद्देनजर तो वर्ष 2012 में अकाली-भाजपा गठबंधन को मिला लगातार दूसरा जनादेश आश्चर्यजनक ही था। स्वाभाविक ही 10 साल के अकाली-भाजपा शासन से उपजी सत्ता विरोधी भावना का लाभ पिछले चुनाव में कांग्रेस और आप को मिला। अब खुद कांग्रेस में मुख्यमंत्री के विरुद्ध असंतोष जैसा मुखर है, उसके मद्देनजर जन भावनाओं का अनुमान लगा पाना मुश्किल नहीं होना चाहिए। ऐसे में स्वाभाविक सवाल यही है कि कांग्रेस शासन से निराश मतदाताओं का विश्वास कौन सा दल और नेता जीत पायेगा? अकाली दल से गठबंधन बिना भाजपा को पंजाब में बड़ी राजनीतिक ताकत कभी नहीं माना गया। देश में सर्वाधिक 32 प्रतिशत दलित मतदाता पंजाब में हैं। इसलिए दलित को मुख्यमंत्री बनाने का शिगूफा भले ही भाजपा ने छोड़ दिया हो, पर सच यही है कि उसके पास प्रदेश स्तर का कोई प्रभावशाली नेता ही नहीं है। दलित उप मुख्यमंत्री का शिगूफा कांग्रेस और अकाली दल ने भी छोड़ा है। आप ने पिछली बार चमत्कारिक प्रदर्शन किया था, लेकिन उसके बाद लगातार अंतर्कलह से उसने अपनी साख गंवायी ही है। भाजपा की तरह आप के पास भी प्रभावशाली नेता का अभाव है। इसीलिए वह दूसरे दलों के नेताओं से संपर्क में है। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर पंजाब की सत्ता के लिए मुख्य संघर्ष कांग्रेस और अकाली-बसपा गठबंधन में सिमट जाये। इन दलों में पहले भी गठबंधन रह चुका है और पंजाब के सामाजिक समीकरण के मद्देनजर यह निर्णायक भी बन जाता है।

अकाली दल का मुख्य जनाधार गांव-किसानों में है। उसमें भी जट्ट सिख ज्यादा मुखर रहते हैं। नये कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की दहलीज पर छह महीने से जारी किसान आंदोलन और इसी मुद्दे पर राजग सरकार से अलगाव का फायदा अकाली दल को मिल सकता है, पर यह तथ्य चौंकाने वाला है कि अपने संस्थापक कांशीराम की जन्मस्थली पंजाब में 32 प्रतिशत दलित मतदाताओं के बावजूद बसपा अकेले दम कभी बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन पायी।

बसपा ने दो बार ही प्रभावी चुनावी प्रदर्शन किया है। 1992 में विधानसभा की नौ सीटें जीत कर और उसके बाद अकाली दल से गठबंधन के चलते 1996 में लोकसभा की तीन सीटें जीत कर। जाहिर है, पंजाब के दलित मतदाता बसपा को अपनी एकमात्र राजनीतिक पहचान के रूप में नहीं देखते। इसलिए अकाली–बसपा गठबंधन का चुनावी प्रदर्शन इस पर ज्यादा निर्भर करेगा कि बसपा दलित वोटों में कितना हिस्सा बंटा पाती है, पर उससे पहले सबसे अहम्ा‍ सवाल यह है कि क्या तब तक यह गठबंधन बना रहेगा? हरियाणा का घटनाक्रम ज्यादा पुराना नहीं हुआ है, जहां बसपा ने कमोवेश उसी रफ्तार से साझीदार बदले थे, जिस रफ्तार से फैशन शो में परिधान बदले जाते हैं।

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