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सहदेव समर्पित/राजेशार्य आट्टा

राखी गढ़ी सिविलायजेशन के एक भाग की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह सिविलायजेशन विश्व इतिहास की सबसे प्राचीन ज्ञात सभ्यता है। रिपोर्ट्स के अनुसार हार्वर्ड युनिवर्सिटी, बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट, व हैदराबाद के सी सी एम डी की जांच को डेक्कन ने परिणाम तक पहुंचाया है। अब कथित हड़प्पा संस्कृति का काल 5000 की बजाय 8000 से 9500 साल तक पीछे चला गया है। यह पुरातात्त्विक प्रमाण है, जो लम्बे समय तक इतिहास से छल करने वाले कथित स्वयंभू ‘बुद्धिजीवियों’ के मुंह पर तमाचा है।


इस रिपोर्ट के परिणाम कहते हैं कि हमने ही विश्व को नगर बसाने सिखाए थे। इसके परिणाम बताते हैं कि आर्यों के आक्रमण की थ्यूरी बेहूदा, शरारतपूर्ण और 100 प्रतिशत झूठी है। हमारे लिखित इतिहास को मिथक कहकर कचरा घोषित करने वाले षडयंत्रकारी बेनकाब हो रहे हैं। महर्षि दयानन्द से लेकर डॉ0 भीमराव अम्बेडकर तक कहते हैं कि आर्यों के भारत से बाहर से आकर आक्रमण करने की थ्यूरी के कोई प्रमाण नहीं हैं। आर्यावर्त का प्रामाणिक लिखित इतिहास कहता है कि मनुष्य की उत्पत्ति त्रिविष्टप् (तिब्बत) में हुई और आर्यों ने ही आर्यावर्त बसाया। उससे पूर्व इस भूभाग में कोई नहीं रहता था। यहाँ अधिक संख्या होने पर आर्यों ने अन्य स्थानों पर प्रयाण किया और अन्य देशों को बसाया। इसके प्रमाण आर्यावर्त से भिन्न अनेक देशों में मिलते हैं कि उनका मूल आर्यावर्त ही है। यहाँ से प्रव्रजन कर गए लोगों का डीएनए मिलना भी स्वाभाविक ही है। इसलिये डीएनए वाली थ्योरी भी पाखण्ड के सिवा और कुछ नहीं है।
हमारे ही देश में रहने वाले मैकाले मानस के तथाकथित इतिहासकार-जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे हुए बच्चे को छाती से चिपकाए रखती है-उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता को भंग करने वाली, राष्ट्र के साथ गद्दारी करने वाली गली-सड़ी, मुर्दा विचार धारा को लिये फिरते हैं। हमेशा ही विदेशियों की वैशाखियों के सहारे चलते रहोगे? देखिये-
1- आर्यों के किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में उनके मूलस्थान अर्थात् पहले स्थान और भारत पर विजय प्राप्त करने के बारे में कहीं वर्णन नहीं है।
2- यदि संख्या बढ़ जाने से या खाद्य सामग्री की कमी हो जाने से आर्यों की टोलियाँ बाहर निकलती तो कुछ तो घर में रह जाते। जबकि मैक्समूलर द्वारा बताया गया आर्यों का आदि देश तो सर्वथा आर्य-शून्य है।
3- चीन, यूनान, मध्य एशिया, मिस्र आदि देशों के इतिहासों में यह संकेत भी नहीं मिलता कि आर्य लोग मध्य एशिया में निवास करते थे और वहाँ से बाहर गए।
4- संस्कृत भाषा प्राचीन काल से ही आर्यों की साहित्यिक भाषा है और आर्यों का सारा साहित्य भी भारत से ही मिलता है, किसी अन्य देश से नहीं।
5- ईरान में यह पढ़ाया जाता है कि चन्द हजार साल पहले आर्य लोग हिमालय पर्वत से उतरकर वहाँ आए और यहाँ का जलवायु अनुकूल पाकर ईरान में बस गए।
6- अभी तक इस बात का कोई निश्चित प्रमाण नहीं दिया जा सका कि आर्य विदेशी थे। सब अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा रहे हैं और आर्यों के विदेशी होने का कोई पुष्ट प्रमाण मिल भी कैसे सकता है। क्योंकि जब गुलदस्ता ही प्लास्टिक का है तो सुगन्ध कहाँ से आएगी। इसी प्रकार का यह सिद्धान्त है जो भारत शत्रु अंग्रेजों के विकृत मस्तिष्क की उपज है।
डॉ॰ बुद्धप्रकाश ने लिखा है कि आर्य लोग ही सिन्धु घाटी की सभ्यता के संस्थापक थे। उत्तरी धु्रव के सिद्धान्तकार लोकमान्य तिलक ने बाबू उमेशचन्द्र विद्यारत्न से कहा था कि हमने मूल वेद नहीं पढ़े, हमने तो केवल साहब लोगों के अनुवाद पढ़े हैं। प्रो॰ मैक्समूलर ने भी अपनी अन्तिम पुस्तक में ‘मध्य एशिया’ का ‘मध्य’ शब्द निकाल दिया था। आर्यों को विदेशी कहने वालों को फटकारते हुए स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है-‘‘किस वेद अथवा सूक्त में तुमने पढ़ा है कि आर्य दूसरे देश से भारत में आये? इस बात का प्रमाण तुम्हें कहाँ मिला है कि उन लोगों ने जंगली जातियों को मार-काट कर यहाँ निवास किया?’’ (प्राच्य और पाश्चात्य पृष्ठ 102)
वर्तमान भारत को प्राचीन आर्यत्व प्रदान करने वाले महर्षि दयानन्द, बाबू अविनाशचन्द्र, डॉ॰ सम्पूर्णानन्द, डॉ॰ गंगानाथ झा जैसे कितने ही विद्वान् भारत को ही आर्यों की आदि भूमि मानते हैं। अब भी यदि विदेशी विद्वानों की जूठी पत्तलों का मोह नहीं छूटा तो लीजिए-
अमेरिकी मानव वैज्ञानिक और पुरातत्त्व वेत्ता डॉ॰ जे॰मार्क केनोयर का मत है कि ‘‘भारोपीय (इंडोयूरोपीयन) तथा भारतीय आर्य (इंडो आर्यन) की परिकल्पनाओं के पीछे यूरोपीय विद्वानों का उद्देश्य अपनी श्रेष्ठता-प्रतिपादन करना था।’’ आर्यों के सिन्धु घाटी पर किये हमलों तथा सिन्धु घाटी के लोगों को घोड़े तथा लोहे से अपरिचित बतानेवालों का खण्डन करते हुए डॉ॰ केनोयर ने कहा है-‘‘हड़प्पा सभ्यता से जुड़े विभिन्न स्थलों पर 3100 वर्ष से अधिक पुराने लोहे मिले हैं। —इसी तरह सिन्धु घाटी में अश्वों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस तथ्य को झुठलाते हैं कि हड़प्पा वासी अश्वों से परिचित नहीं थे।’’ डाक्टर केनोयर का मानना है कि सिन्धु घाटी आर्यों की ही सभ्यता है और महाभारत का काल ईसा से 3102 वर्ष पूर्व माना है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के अध्यापक डॉ॰ बेनीमाधव बरुआ ने विद्वानों की दृष्टि एक चित्र की ओर आकर्षित की। जिसमें वैदिक त्रैतवाद को दर्शाते हुए एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। इसका सम्बन्ध ऋग्वेद के (1-164-20) मंत्र से है। डॉ॰ मैक्डानल्ड के आर्यों के समुद्र से अपरिचित होने का खण्डन करते हुए डॉ॰ फते सिंह ने लिखा है कि वेद में समुद्र का उल्लेख 289 बार हुआ है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के सिद्धान्त का पालन करने वाले आर्यों की सभ्यता के अंश संसार के अन्य देशों में देखे जा सकते हैं। रामायण के उत्तर काण्ड, सर्ग 102 के अनुसार-
‘‘कारूपथ (कैरोपेथियन) लक्ष्मण-पुत्र अंगद को दिया गया। इसलिए इसे अंगदियापुरी कहते थे, द्वापर में यही अंगदेश और हरिवर्ष कहलाया और उसका एक भाग अंगेराई (हंगरी) हो गया। अंगदिया-पुरी के दक्षिण में राक्षसों के आक्रमण रोकने के लिए लक्ष्मण जी ने एक छावनी बनाई, जो अब आस्ट्रिया (क्षत्रिय) कही जाती है। उत्तरी भाग में शर्मा (ब्राह्मणों) की ब्रह्मपुरी बसाई थी, जो शर्माणी (जर्मनी) कही जाती है। इनके मध्य में लक्ष्मण जी का मुख्यालय लक्ष्मणबृज (लेक्षनवर्ग) है। भरत जी के ज्येष्ठ पुत्र तक्ष के नाम पर तक्ष खण्ड (ताशकन्द) और द्वितीय पुत्र पुष्कल के नाम पर पुष्कलावर्त (पेशावर) बना।’’
मुसलमानी आगमन पर अफगानिस्तान में जादो वंश का राज्य था, जो ‘यादव’ का अपभ्रंश है। इन्हीं यदुवंशियों से यहूदी बनें। माहकुल को अरबी में मुगल कहते हैं और चन्द्रकुल को फारसी में माहकुल कहते हैं। इसका तात्पर्य चन्द्रवंशियों से है। इसीलिए ये लोग अपना वर्ष चन्द्र गणनानुसारी 354 दिनों का अब तक मानते आ रहे हैं और इनका धार्मिक ध्वज भी ‘चाँद-तारे’ वाला है।
वैदिक सभ्यता का 10-15 हजार वर्ष पुराना होना भी सत्य नहीं है। तथाकथित कार्बन डेटिंग से तो उसी समय का पता चल सकता है जिस समय यह सभ्यता स्थापित थी और जिस समय के अवशेष अब प्राप्त हुए हैं। यह कब बसी थी, जब इसको जानने की प्रामाणिक विधियाँ मनुष्य को ज्ञात हो जाएँगी, तब ये रिसर्च सत्य के और अधिक निकट पहुंच पायेंगे। हमें तो उस दिन की प्रतीक्षा है जब मानव के 1960853119 वर्ष के इतिहास को जाना और माना जाएगा।

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