मैं हिंदी पुत्री हिंद की हूँ

हिन्दी

 

मैं हिन्दी पुत्री हिन्द की हूंँ ।
चूनर कश्मीरी सिन्ध की हूंँ ।।

संस्कृत पालि प्राकृत अपभ्रंश ।
हैं पितृ मेरे जिनकी मैं अंश ।।
आंँचलिक बोली मेरी बहने ।
आत्मीयता के उनके क्या कहने ।।
बहनों संग इतराती हूंँ ।
हृदय के भाव बताती हूँ ।।

कुछ छलिए देखो आते हैं ।
कुत्सित चालें चल जाते हैं ।।
भाषा विवाद जलाते हैं।
निज स्वार्थ में डूबे जाते हैं ।।
मेरी बहनों को बना सौत।
देना चाहें वह हमें मौत।।

हिन्दी की बात बहुत करते ।
हिंदी में बात नहीं करते ।।
पर कष्ट नहीं इस बात का है।
मुझको दिखता प्रकाश सा है।
तुलसी रहीम सूर कबीरा ।
महादेवी, निराला या मीरा ।।

प्रसाद द्विवेदी आते हैं ।
मेरा नवरूप सजाते हैं ।।
निज भाषा में अभिमान रहे ।
भारतेंदु सा स्वाभिमान रहे।।
प्रेमचंद की बात यही है ।
राष्ट्रभाषा बिन राष्ट्र नहीं है ।

अटल का अचल विश्वास हूँ मैं ।
बच्चों का नवल प्रयास हूँ मैं ।।
नई शिक्षा नीति का उदाहरण ।
है सही नीति का निर्धारण ।।
सकल विश्व में बोलने वाली ।
भाषाओं में तोलने वाली ।।

दिलाया मुझे स्थान प्रथम ।
निज बच्चों का है अद्भुत श्रम ।।
जन जन के मन की भाषा हूँ।
विकल सकल अभिलाषा हूंँ।।
मुझ में परंपरा है जिन्दी।
संस्कृति की पोषक मैं हिन्दी।।

मैं हिन्दी पुत्री हिन्द की हूंँ ।
चूनर कश्मीरी सिन्ध की हूंँ ।।

सपना सक्सेना दत्ता सुहासिनी

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *