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चंद्रभूषण

शेर और नीचे इंसान की धजा वाले नृसिंह अवतार के जन्म की कोई कहानी नहीं है और मनुष्य के धड़ पर हाथी के सिर वाले गणपति के उद्भव के साथ कोई जैविक क्रिया नहीं एक युद्ध जुड़ा है। लेकिन ग्रीक पुराणों में ऐसी विचित्र कथाओं के साथ बाकायदा जन्म का ब्यौरा नत्थी है। समुद्र के देवता पोसाइडन ने क्रीट के राजा मिनोस को बलि के लिए एक सांड़ भेंट किया, लेकिन मिनोस इसमें हिचक गया। इससे कुपित पोसाइडन ने मिनोस की बीबी पैसिफी के मन में उस सांड़ के प्रति वासना भर दी और दोनों के संसर्ग से इंसानी धड़ और सांड़ के सिर वाला राक्षस मिनोटोर पैदा हुआ।

हकीकत में ऐसी कोशिश सिर्फ अत्यंत उपयोगी और सख्तजान पशु खच्चर में कामयाब होती दिखी है, जो गधे और घोड़ी की संतान है। खच्चर कारोबारियों के लिए इन दोनों जीवों का सहमेल एक कमाऊ कौशल है, लेकिन इसकी सीमा यह है कि खच्चरों में नर-मादा की मौजूदगी के बावजूद उनके बच्चे नहीं होते। सन 1527 से सन 2000 के बीच पूरी दुनिया में इसका जितना रेकॉर्ड रखा जा सका है, उसमें खच्चरों द्वारा संतानोत्पत्ति के सिर्फ साठ मामले दर्ज हैं। इनमें ज्यादातर मादा खच्चर और घोड़े के संसर्ग से संभव हुए, जिससे जन्मी संतानें हर लिहाज से घोड़ों में गिनी जाने लायक थीं।

बहरहाल, जेनेटिक इंजीनियरिंग के उदय के बाद से दो जीवों को मिलाकर तीसरा जीव बनाने की कोशिशें ज्यादा तेजी से परवान चढ़ी हैं क्योंकि इसके मेडिकल तर्क काफी प्रबल हो गए हैं। पिछले महीने चीन की कुनमिंग यूनिवर्सिटी के जीवविज्ञानी ताओ तान और अमेरिकी, चीनी, स्पैनिश वैज्ञानिकों की एक टीम के केकड़े खाने वाले बंदरों के साथ भ्रूण के स्तर पर इंसानों का मेल कराने की कोशिश अभी चर्चा में है। इस टीम में सैन दिएगो यूनिवर्सिटी के जुआन बेलमोंट भी शामिल रहे हैं, जिन्होंने चार साल पहले सूअर और इंसान का मिला-जुला भ्रूण तैयार करने का प्रयास किया था। उसके नतीजे कुछ खास नहीं रहे और पाया गया कि गर्भस्थ शिशु की अवस्था में पहुंचने तक इस भ्रूण में मानव कोशिकाएं एक लाख में एक ही बची थीं।

खैर, अमेरिका, जापान और ज्यादातर विकसित देशों में भ्रूण स्तर की मानव कोशिकाओं के साथ वैज्ञानिक प्रयोगों पर रोक लगी हुई है, सो ऐसे प्रयोग अभी चीन में ही दूर तक जा पाते हैं। ताओ तान की टीम ने बंदरों के 132 निषेचित भ्रूणों में इंसानी स्टेम सेल्स डाल दीं, जिनमें कोई भी रूप ले सकने की क्षमता मौजूद होती है। यानी उनका आगे का रास्ता तय नहीं होता कि वे लिवर बनाएंगी या किडनी या दिल, दिमाग, आंख की पुतली, त्वचा, आंतें या फिर जननांग। प्रयोग का मकसद यह देखना था कि इस स्मार्ट बंदर के भ्रूण में मौजूद कोशिकाएं इंसानी स्टेम कोशिकाओं से कोई संपर्क-संवाद बनाती हैं, या सूअर वाले मामले की तरह उन्हें अलग-थलग करके मरने के लिए छोड़ देती हैं। पाया गया कि इंसानी कोशिकाएं भ्रूण के स्तर पर सूअर की तुलना में बंदर के साथ कहीं बेहतर सह-अस्तित्व दिखाती हैं। प्रयोग का 20वां दिन आते-आते सारे भ्रूण मर गए, लेकिन कुछ भ्रूणों में 17वें दिन तक मानव कोशिकाओं की 7 प्रतिशत तक मौजूदगी देखी गई। यह वह बिंदु था जहां बंदर का एंब्रियो वाला दौर खत्म होता है और बतौर फीटस उसमें दिल धड़कने लगता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि बेहतर कोशिशों के जरिये यह प्रयोग अगर संतानोत्पत्ति तक जाए तो बच्चा किस हद तक बंदर और किन मायनों में इंसान होगा। उसके इंसानी दिमाग वाला बंदर होने की संभावना कितनी है?

एक जीव में दूसरे जीव के अंश पाए जाने की परिघटना को जेनेटिक्स में काइमीरा का पौराणिक नाम दिया गया है। इलियड में काइमीरा एक ऐसा जीव है जो आगे से शेर, बीच से बकरी और पीछे से सांप है। इस लंतरानी के बरक्स अभी के काइमीरा बिल्कुल सीधे-सादे हैं। कोई काइमीरा हमारे-आपके बीच भी हो सकता है। जिन लोगों का बोनमैरो ट्रांसप्लांट हुआ रहता है उनके खून में ही नहीं, शुक्राणु तक में दो तरह के डीएनए पाए गए हैं। एक उनका और एक बोनमैरो डोनर का। लेकिन दो अलग प्रजातियों के तत्व एक ही जीव में मौजूद होना आज भी चमत्कार है।

इसकी एक मशीनी शक्ल जेनोट्रांसप्लांटेशन की शक्ल में जल्द ही देखने को मिल सकती है। इसमें दिल-गुर्दे जैसे जीवन के लिए अनिवार्य अंग सूअर से निकालकर इंसान में लगाए जाएंगे। बबून बंदरों में इनकी आजमाइश की जा चुकी है। सूअर का वजन इंसान के करीब है लिहाजा यहां ये वरदान साबित होंगे, बशर्ते शरीर द्वारा इन्हें खारिज कर दिए जाने की मुश्किल जल्द हल कर ली जाए। ऐसा पहला प्रत्यारोपण इसी साल कर लिया जाना था, लेकिन कोरोना के चलते अगर यह न हो पाया तो भी अगले दो-तीन साल में इसकी खबरें आने लगेंगी।

बहरहाल, जीवविज्ञानियों के लिए काइमेरा पर काम करने का मतलब एक जीव का कोई अंग दूसरे में फिट कर देना नहीं है। इसका अच्छा उदाहरण जापानी बटेर के दिमाग में गाने वाली ऑस्ट्रेलियाई चिड़िया जीब्रा फिंच के दिमाग का वह हिस्सा जोड़ने का है, जिसके जरिये वह नई धुनें सीख पाती है। 2012 में भ्रूण के स्तर पर की गई यह कोशिश काफी दूर तक गई, लेकिन फीटस बनने से पहले कुछ ऐसा हुआ कि नए जीव में सांस लेने का मेकेनिज्म नहीं बन पाया। मुर्गे का दिमाग लेकर बांग देने वाली एक बटेर इसके पहले बनाई जा चुकी है, हालांकि दोनों जीवों में यह बात साझा है कि मुर्गा और बटेर दोनों अपनी बोलियां अंडे से ही सीखकर आते हैं। इनके विपरीत जीब्रा फिंच अपने जीवन में ढेरों नई बोलियां सीखती है।

इसकी तुलना इंसान से करें जो जन्म से मृत्यु तक कुछ न कुछ सीखता ही रहता है, तब पता चलेगा कि इसका काइमीरा, किसी और जीव के साथ इसका मिक्स एंड मैच बनाना कितना मुश्किल है।

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