यौन हिंसा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

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कई बार देश में ऐसा लगता है कि जैसे सर्वोच्च न्यायालय कि देश को चला रहा है। जब सरकारें और सारा प्रशासनिक तंत्र कहीं समस्याओं से बचते हुए या  दूर भागता दिखाई देता है तो सर्वोच्च न्यायालय अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाते हुए कहीं ऐसे आदेश निर्देश जारी करता है जो देश की डगमग होती व्यवस्था को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होते हैं। ऐसा ही एक फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने अभी दिया है।इस बार भारत का सर्वोच्च न्यायालय यौन हिंसा को लेकर मुखर हुआ है।


सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देश भर की अदालतों के लिए यौन हिंसा से जुड़े मामलों में खास एहतियात बरतने के ऐतिहासिक निर्देश जारी किए। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी जज यौन उत्पीड़न से जुड़े किसी मामले की सुनवाई करते हुए न तो किसी तरह की महिला विरोधी टिप्पणी करे और न ही दोनों पक्षों में समझौता कराने की कोशिश करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले में दिया जिसमें हाईकोर्ट ने छेड़छाड़ के आरोपी को इस शर्त पर जमानत दे दी थी कि वह पीड़िता के घर जाकर उससे राखी बंधवाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब न केवल निचली बल्कि कई ऊपर की अदालतों में भी यौन उत्पीड़न को लेकर हल्का रुख देखने को मिला है। ऐसे मामलों में जजों के फैसलों तथा टिप्पणियों को लेकर समाज के संवेदनशील हलकों में तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की गई, साथ ही न्यायपालिका के एक हिस्से की सोच पर सवाल भी उठे। न्याय के आसन से परे हटकर समाज के अन्य जिम्मेदार हिस्सों की ओर देखें तो ऐसे बयान थोक में मिल जाते हैं जिनमें महिलाओं को उनके कपड़ों के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र बांटने की हड़बड़ी नजर आती है।

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हालांकि भारत जैसे तेजी से बदलते समाज में महिलाओं को लेकर परस्पर विरोधी धारणाओं का मौजूद होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हजारों साल की पितृसत्ता से उबरने में अमेरिका और यूरोपीय देशों को कई शताब्दियां लग गईं, जबकि भारत में आजादी मिलने के ढाई साल के अंदर महिलाओं को सारे अधिकार देने वाला संविधान लागू हो गया। स्वतंत्रता और समानता के इस संविधान प्रदत्त परिवेश में महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के दरवाजे तो खुले, लेकिन परिवार और समाज के ढांचों में बदलाव की वह प्रक्रिया, जिसका काम उन्हें बराबर के इंसान के रूप में देखना संभव बनाना था, हमारे यहां काफी धीमी गति से आगे बढ़ी।
नतीजा यह कि महिलाएं पढ़-लिखकर अलग-अलग पेशों में ऊंचे ओहदों पर पहुंचती गईं, लेकिन समाज उनके बारे में दकियानूसी ढंग से ही सोचता रहा। यह सोच कभी किसी नेता के बयान, कभी किसी अफसर की हरकत और कभी किसी जज की टिप्पणी के रूप में सामने आकर देश को शर्मसार करती रहती है। खास बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा निर्देश में उन वाक्यांशों के उदाहरण भी दिए हैं जो अदालती फैसलों में अक्सर स्थान पाते हैं और जिनसे आगे बचना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-अदालतों के आदेश में पुरुषवादी सोच या रूढ़िवादी बातें न हो
‘महिलाएं शारीरिक तौर पर कमजोर होती हैं और उन्हें सुरक्षा की जरूरत होती है’ से लेकर ‘मातृत्व हर महिला का कर्तव्य है’, ‘पुरुष घर के मुखिया होते हैं’ और ‘महिलाएं भावुक होती हैं इसलिए अक्सर ओवर रिएक्ट करती हैं’ तक ऐसा हर वाक्यांश पितृसत्तात्मक सोच की पूरी कहानी बयान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश भले सिर्फ जजों के लिए जारी किया हो, यह पूरे समाज के लिए दिशानिर्देश का काम करेगा।

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