मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: से ‘ओल्ड एज होम’ तक

Matri-devo-bhavडा. इन्द्रा देवी

शब्दकोश का सबसे मार्मिक शब्द मॉं है। मातृ, मदर, आई बेबे, माती, नैने, अम्मी आदि  इसके पर्यायवाची हैं।  पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहा जाता है। पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जन इनके पुत्र हैं राष्ट्र भक्ति का परिचय भी भारत माता के रूप मेें ही देते है। स्वामी दयानन्द अपना उपनाम सरस्वती रखते हैं। स्वामी विवेकानन्द काली मॅंा के साधक हैं, गाय गंगा एवं यमुना नदी में मां जैसी करूणा एवं कल्याण भावना से हम इन्हे भी मैया कहकर सम्बोधन देते हंै। प्रत्येक वर्ग धर्म आयु एवं देश का व्यक्ति हर्ष , विषाद, शोक, उन्माद, उत्साह, ईष्र्या लज्जा, भय एवं ग्लानि आदि मनोविकारों को हाय मां के रूप में ही अभिव्यक्ति देता है। शिशु सबसे पहले अपनी मां को पहचानता है पिता कौन है यह जानकारी वह मां से ही प्राप्त करता है। मां शब्द का उच्चारण वह सबसे पहले करता है। मातृ पितृ देह दात्री और ज्ञानदात्री है । माता पिता को परिवार में सबसे घनिष्ठ और प्रिय माना जाता है।

           मां की महत्ता को मातृ सत्तात्मक परिवार प्रकट करते हैं। इनमें पारिवारिक सत्ता स्त्री की होती है। बच्चे अपनी माता के कुल या वंश का नाम ग्रहण करते हैं इन परिवारों में पुत्र को पिता से कोई सम्पत्ति प्राप्त नही होती, भारत में खासी एवं गारों आदि जन जातियों में तथा मालाबार के नायरों में मातृ सत्तात्मक या मातृवंशीय परिवार आज भी देखे जा सकते हैं। नायर स्त्री घर की मालकिन है, वह विवाह के पश्चात भी पति के घर नही जाती। वंश और सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार माता के हैं, पारिवारिक मामलों आर्थिक अधिकारों और वंश नाम के सम्बन्ध में मां का स्थान सर्वोच्च होता है।

           पितृ सत्तात्मक परिवार में सत्ता या अधिकार पिता या पति के हाथ में होता है। बालक अपने पिता के वंश या कुल के नाम को ग्रहण करते हैं बच्चों का अधिकार पिता की सम्पत्ति पर होता है माता के परिवार कि सम्पत्ति पर नही परिवार के सबसे बडे लडके का स्थान एवं अधिकार सबसे पहले होता है। पारिवारिक मामलों में एवं सम्पति के सम्बन्धों में सम्पूर्ण अधिकार पिता के पास सुरक्षित हैं। इस प्रकार के परिवारों में पिता, उसके भाई, उन सब के लड़के, इन लड़कों के बच्चे इन सबकी पत्नियां और अविवाहित लड़कियॉं आती हैं। भारत के अधिकांश भाग में रहने वाले हिन्दू, सिख, जैन, मुस्लिम एवं जनजातियों में पित्रवंशीय परिवार पाया जाता है, फिर भी वंश, नाम, निवास, अधिकार एवं उतराधिकारी के विषयों में पिता की स्थिति सर्वोच्च है, तो दूसरी ओर पारिवारिक जीवन के प्रतिदिन के विषयों में मां भी महत्वपूर्ण तथा स्वतंत्र भूमिका अदा करती है।

          हमारे पारिवारिक ढांॅचे में माता पिता का स्थान महत्वपूर्ण हैे। धर्म सूत्रों में प्रत्येक अवस्था में माता की सेवा और भरण पोषण करना पुत्र का परम कर्तव्य माना गया है। माता                                 पतित हो या कलकिंत हो या जाति भ्रष्ट हो प्रत्येक अवस्था में उसका पोषण अनिवार्य है। पिता के पतित होने पर भले ही उसका भरण पोषण न किया जाये, किन्तु माता के साथ ऐसा करना महापाप है। मां के त्रण को कभी चुकाया नही जा सकता मनुस्मृति में पिता के महत्व को दर्शाते हुए उसे प्रजापति की मूर्ति बताया गया है। यह बताया गया है कि माता पिता का बदला संतान सौ वर्ष में भी नही चुका सकती। ‘पराशर’मनुष्य के लिए पिता को ही परम देवता मानते हैं। पिता बालकों की रक्षा, पालन, पोषण देख-रेख और नियंत्रण करता है। प्राचीन काल से आज तक संतान को गणित विज्ञान एवं भौतिक आदि की शिक्षा देने का काम भी पिता का ही है। कालीदास ने पिता के इन कर्तव्यो को विनय रक्षण और भरण नाम से ंउल्लेखित किया है। वेद भी पिता के त्राता और खाद्य सामग्री संग्रह कर्ता के रूप में सुन्दर वर्णन करते हैं।

         व्यावहारिक रूप से भी सन्तान को जन्म देना पिता के लिए उतना महत्वपूर्ण नही है, जितना उसका पालन पोषण करना सुरक्षा और शिक्षा देना है। यही कारण है हमारे मन में पिता की जनिता या जनक के रूप में इतनी प्रतिष्ठा नही, जितनी की संतान के पालक रूप में है। इसलिए माता पिता की आज्ञा का पालन करना आदर करना एवं वृद्धावस्था में उनकी देख रेख करना सेवा करना संतान का सामान्य कर्तव्य माना जाता है, माता पिता की सेवा एवं आज्ञा पालन से अच्छे परिणामों की प्राप्ति, अभीष्ट सिद्धि एवं पुण्य प्राप्ति सम्भव है। पिता ही धर्म कर्म स्वर्ग और परम देवता है।  माता पिता में वरदान और अभिशाप की क्षमता है। महाभारत स्पष्ट धोषणा करती है कि सब पापों का कुछ न कुछ प्रतिकार है, परन्तु माता पिता से शाप पाये व्यक्ति का कही छुटकारा नही है। एक परिवार का यही आदर्श है । आध्ुानिक युग में इस आदर्श परिवार का अनेक रूप में विखण्डन हो रहा है, जिसकी विवेचना करने से पूर्व यह देख लें कि हमारे आर्ष गं्रथ एक ग्रहस्थ को इस विषय में क्या मार्ग दर्शन देते हैं? ग्रहस्थी जीवन मानव का सबसे महत्वपूर्ण भाग है । इस पर व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति निर्भर है । इसमें ऐसे कुछ कर्तव्य हैं जिनका पालन अन्य प्रवृत्ति अपनाने पर नही हो सकता। जैेेेेेेसे त्रिऋण से मुक्ति पंच महायज्ञ ऐसे ही विशिष्ट कर्तव्य हैं। मानव जन्म में प्रकृति की विभिन्न शक्तियॅंा देवों का योगदान रहता है। माता-पिता यदि साक्षात् रूपेण जन्म देते हैं, तो ऋषिगण विभिन्न प्रकार की शिक्षा-दीक्षा देकर व्यक्त्वि सम्पूर्ण बनाते हैं। माता पिता अनेक कष्ट सहकर समुचित संस्कार देकर उसे समाज का सम्माननीय नागरिक बनाते है, इसी से मनुष्य पर पितृ ऋण होता हेै । इस ऋण से मुक्ति के लिए ग्रहस्थ मृत पितरों का श्राद्ध जीवित माता-पिता की सेवा एवं सन्तानोत्पादन कर पितृ ऋण से उऋण होता हैं।

           भारतीय जीवन यज्ञमय है यज्ञ ईश्वर की उपासना और व्यक्ति की त्याग भावना का प्रतीक है । ग्रहस्थ के नित्य कर्तव्यों के रूप में पंचमहायज्ञों की परिगणना है। अविवाहित मनुष्य पंचमहायज्ञ नही कर सकता प्रत्येक ग्रहस्थ से प्रतिदिन महापंचयज्ञ अपेक्षित हंै। इनका उददेश्य है ईश्वर प्राचीन ऋषियों, पितरों जीवों एवं सम्पूर्ण प्रकृति के लिए स्वत: कर्तव्य पालन। ये पंचमहायज्ञ हैं- ब्रहमयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, नृपयज्ञ अथवा मनुष्ययज्ञ। पितृ यज्ञ में प्रतिदिन पितरों का सम्मान किया जाता है इस यज्ञ में केवल मृत पितर ही अभीष्ट नही है। अपितु अपने जीवित माता पिता आदि वृद्धजनों को भी प्रतिदिन भोजनालय से श्रद्धा पूर्वक तृप्त करे हमारी आचार सहिंता मनुस्मृति यही कहती है कुर्यादहरह: श्रद्धमन्नाधेनोदकेन वा अर्थात अपने यशस्वी और कृती मृत पूर्वजो का प्रतिदिन तर्पण करके ग्रहस्थ उनके गुणो को तो आत्मसात करे साथ ही जीवित माता पिता की सेवा करे।

         पयोमूलफलैर्वडपि पितृभ्य प्रीतिमावहन 8283 इस यज्ञ के प्रतिदिन किए जाने का वैज्ञानिक मानवीय अभिप्राय है माता पिता एवं वृद्धजनो कि सेवा परिचर्या एवं आदर सम्मान है यही पितृयज्ञ का प्रयोजन है।

         हमारी परिवार व्यवस्था निर्बल एवं अनाथों को सहारा प्रदान करती है एकाकी जीवन की समस्याओं से मुक्ति दिलाती है प्रत्येक सदस्य के मन में विश्वास होता है कि मैं अकेला नही विशेषकर वृद्ध अवस्था में इसमें संदेह नही कि संयुक्त परिवार वृद्धों के लिए एक अद्वितीय सुरक्षा केन्द्र था बालक भी बचपन से ही यह सीख जाता है कि उसका जीवन केवल उसी के लिए नही है अपितु उसके जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने में है। प्रत्येक बालक पर बड़े बूढों का दबाव और प्रभाव पडता है यह वृद्ध कार्यो से अवकाश ग्रहण कर चुके हंै सदैव घर पर ही रहते हैं वे बालकों के चाल चलन पर कडी निगरानी रखते हैं बच्चे उनके सम्पर्क से अनेक अनुभव प्राप्त करते है वृद्धो से बालक अनेक नई चीजंों को सीखते है बच्चंों कि तोतली बाते विसंगतिमय जिज्ञासा कूद फांद रूठना मनाना वृद्धों के मन को बहलाता है उन्हें अवसाद में नही जाने देता है साथ ही त्यौहारों करवा चौथ अहौई अष्टमी आदि पर सासू जी का बायना हंसी मजाक एवं लोक गीत आदि में वृद्धजन अपने गौरव तृप्त होता पाते है।

वृद्धजन जीवन के लम्बे अनुभव से छोटी आयु के लोगो को सदैव उचित मार्ग पर रखने का प्रयत्न करते है तीन पीढियों से संयुक्त परिवार सच्चे अर्थो में एक ऐसा सहकारी संस्थान बन जाता है जिसका प्रत्येक सदस्य अपने काम में लगा है किन्तु हाय आज का नौकरी पेशा लोगों के पास इतनी फुर्सत कहॉ नौकरी में तरक्की की बैचेनी के लिए यह वर्ग मानवीय सम्बन्धों के प्रति अत्यंत निर्मम और चरित्रहीन हो सकता है। वह किस तरह परिस्थियों को भरपूर भुनाने की जुगत  में रहता है ‘ओल्ड एज होम’ व्यवस्था इसका प्रमाण है अपने धर फ्लैट को स्र्माट लुक देने में वृद्ध माता पिता कितनी बडी बाधा है वे एक पुराने फ ालतु सामान कि भांति है किन्तु उन्हें स्टोर में अलमारियों के पीछे या कबाड़ी के हवाले भी नही किया जा सकता माता पिता इस अपमान की प्रतारणा अकेलेपन में झेलते हैं यह जानकर की इसमें भी उनके बालको की भलाई होगी वह ‘ओल्ड एज होम’ पहुचॅकर समझौता कर लेते है अपनी बूढ़ी बेजान ऑखों से अपने प्रिय जनों की प्रतिक्षा करते है धर से उपेक्षा निर्वासन पाकर वह अपने आपको दूसरों के लिए महत्वपूर्ण बनाने के भ्रम में हादसास्पद तक बन जाते है अनेक माता पिता अपनी संतान और परिवेश से कटकर तीर्थ एवं अध्यात्म की और चलते है जहॅा वास्तव में उनकी मुक्ति नही अपितु मृत्यु है भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ हमें ‘ओल्ड एज होम’ कल्चर पर अंकुश लगाने के लिए बाध्य करते हैं जो ग्रहस्थ केवल अपने लिए भोजन पकाते है वे भोजन नही अपितु पाप ही खाते है भूतयज्ञ समस्त जीवो के प्रति सहिष्णुता एवं उदारता का पाठ पढ़ाकर व्यक्ति को आत्मकेन्द्रित या स्वार्थी होने से बचाता है नृपयज्ञ के मूल में मानव मात्र के प्रति दया कृपा और समानुभूति कि सहज वृत्ति है यह नागरिकता के भाव की पुष्टि है हमारे पास भोजन न भी हो फिर भी आसन, जल, मीठी वाणी घर में सर्वदा प्राप्त होती है।

          आज के वर्तमान समय में आश्रम व्यवस्था या वेद स्मृति आदि ग्रथों में प्रतिपादित जीवन शैली तो हमारी नही है किन्तु इस व्यवस्था ने जिन गुणों कर्तव्यों एवं जीवन मूल्यों को स्थापित किया था वे सभी गुण आज भी हमारी मानसिक संरचना संस्कार में कम अधिक मात्रा में विधमान है एक पाश्चात्य विचारक को भारतीय समाज व्यवस्था में ‘ओल्ड एज होम’ का न होना बहुत आश्चर्य जनक लगा किन्तु आज जितनी फ्लैट कल्चर की ऊॅंचाई और सख्ंया बढ़ रही है उसी अनुपात में वृद्धश्रम सख्ंया बढ रही है कभी हम सोचते हैं कि फ्लैट व्यवस्था एक तरह से वृद्धो की श्रेणी के कारागार है।

कहा जाता है कि बचपन कभी लौटकर नही आता किन्तु माता पिता या वृद्ध जनो कि ऑखों में हम देखते है तो लगता है हमारा बचपन माता पिता सदैव करूणा के बादल बन संतति की सुरक्षा करतेेेे है असहाय असुरक्षित अयोग्य संतान कि और वे बार बार झुकते है और हर बार अनुभव करते है कि वही उनकी आवश्यकता है वही उनके जीवन की सार्थक्ता है आज के समझौता परस्त बाहरी दिखावे में लकदक, अवसरवादी माहौल में भी हम ऋणग्रस्त नही रखना चहाते फिर चले ओल्ड एज होम और वृद्धा श्रम की कुछ ईट निकाल अपने धर लाएं पितृ ऋण से मुक्त पितृयज्ञ में संलग्न हो जाएं।

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