शहरों में हम जहां एक ओर मानवता के संपूर्ण विकास का सपना संजोते हैं और उसे धरती पर उतारने का प्रयास करते हैं, वहीं मानव समाज को एक पाशविक समाज की भांति रहने के लिए अभिशप्त हुआ भी देखते हैं। इसे मानवता की घोर विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर जहां बहुमंजिली इमारतें हमारे विकास की कहानी गढ़ती व लिखती जान पड़ती हैं, वहीं झुग्गी झोंपडिय़ों का दूषित-प्रदूषित परिवेश मानव के विनाश की सारी संभावनाओं को भी प्रकट करता है।
भारत की स्वतंत्रता के 67 वर्ष बीत गये हैं, परंतु हम जनसमस्याओं का समाधान, नही खोज सके हैं। देश के असंतुलित विकास और आर्थिक संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार के चलते गरीबी और फटेहाली इतनी बढ़ी है कि देखी नही जा सकती। यदि शहरी क्षेत्रों की बात की जाए तो आंकड़े बहुत ही दु:खदायक और कष्टप्रद हैं। एक आंकलन के अनुसार 52 प्रतिशत शहरी जनसंख्या के लिए स्वच्छता सेवाओं का तनिक भी प्रबंध नही है। चतुर्थ श्रेणी के शहरों की 35 प्रतिशत जनसंख्या तथा प्रथम श्रेणी के शहरों की 75 प्रतिशत जनसंख्या को ही मलजल निकास प्रणाली की सेवाएं उपलब्ध हैं। शहरी क्षेत्रों में 34 प्रतिशत आबादी के पास तो अपने घरों के पास जमा होने वाले बरसाती पानी को भी निकालने की समुचित व्यवस्था नही है। भारत के म्युनिसीपल निकाय प्रतिदिन एकत्र होने वाले कूड़े में से मात्र 40 प्रतिशत को ही उठा पाते हैं, शहरी क्षेत्रों में 28 प्रतिशत कूड़ा सड़कों के पास गड्ढों में या फेेक्ट्रियों में यूं ही सड़ता है। जिसकी सड़ांध से कितने ही कीड़े मकोड़े, मच्छर, तिलचट्टे आदि उत्पन्न होते हैं और मानव स्वास्थ्य को भयानक रूप में प्रभावित करते हैं।
भारत में लगभग 497 शहर 640 जिले 5767 तहसीलें, और छह लाख गांव, कुल 28 राज्य और 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। इनमें से शहरी क्षेत्र के समुचित विकास के लिए ही हमें लगभग 15 हजार करोड़ वार्षिक की आवश्यकता है। यदि एक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कॉमनवैल्थ गेम्स घोटाला में जितना गोलमाल (70,000 करोड़) हुआ था, उसमें ही पांच वर्ष तक हम अपने देश के शहरों का समुचित विकास कर सकते थे। इससे विकास के नये रोजगार के अवसर उत्पन्न होते और राजस्व में कृषि भी संभावित थी परंतु घोटालेबाजों ने देश के विकास की गति ही बदल दी है। वर्ष 2000-2005 में राज्यों ने अपने स्थानीय निकायों के विकास के लिए केन्द्र से 42,000 करोड़ रूपये की मांग रखी थी, परंतु केन्द्र ने मात्र 400 करोड़ रूपये ही उपलब्ध कराये थे। मांग 42,000 करोड़ की और पूर्ति (पांच वर्ष के लिए) मात्र 2,000 करोड़ की। उसे भी स्थानीय निकायों के चेयरमैन और ई. ओ. आदि अपनी बंदरबांट में चट कर जाते हैं, तो विकास कैसे होगा?
यही कारण है कि हमारे गांवों से निकल निकलकर जो लोग शहरों में जा रहे हैं, उनकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि वो ना तो मरे हुओं में रहते और ना ही जिंदों में रहते हैं। सामान्यत: जलमल निकासी के अभाव में ऐसा देखा जाता है कि जो व्यक्ति अपनी तीस वर्ष की आयु में अपना मकान बनाता है, उसका मकान अगले बीस वर्षों में इतना नीचा पड़ जाता है कि उसे फिर ऊंचा उठाने की आवश्यकता पड़ती है, और तभी उस व्यक्ति के बच्चे भी विवाह योग्य होते हैं या उनके रोजगार आदि की समस्या से भी वह जूझ रहा होता है। अत: मकान ऊंचा करना, बच्चों को रोजगार देना और उनके विवाह करना आदि की इतनी विकराल समस्या उसके समक्ष होती है कि कितने ही लोगों को तो इस समस्या से जूझते जूझते ही ब्लड प्रैशर, सुगर और हृदयरोग लग जाते हैं। शहरों कस्बों का यदि सही आंकलन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि वहां अधिकांश मध्यमवर्गीय लोग इसी समस्या से जूझते हुए असमय ही मौत का ग्रास बन रहे हैं। भारत के विषय में यह भी चौंकाने वाला तथ्य है कि यहां लगभग बीस प्रतिशत की जनसंख्या के परिवार ऐसे हैं जो दस वर्ग मी. से भी कम में गुजर बसर कर रहे हैं। लगभग 44 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो एक कमरे वाले आवास में रहते हैं। भारत की संसद में इन 10 वर्ग मी. में रहने वालों के लिए या एक कमरे में रहने वाले 44 प्रतिशत परिवारों के कल्याण के लिए बनायी जाने वाली योजनाओं पर कभी गंभीर चिंतन होता हो, ये देखा नही गया है। सारा समय घिनौनी राजनीति के दांव पेंचों और ‘जयचंदी छलछंदों’ में ही व्यतीत हो जाता है। टी.वी. पर होने वाली चर्चाओं में भी राजनीति ही हावी-प्रभावी रहती है और देश की नब्ज पर हाथ रखकर बोलने वाले विशेषज्ञ वैद्यों का वहां भी अकाल सा ही रहता है।
प्रो. मार्शल ने 1950 के दशक में दिल्ली को देखा और उसकी मलीन बस्तियों के विषय में लिखा कि-”चारों ओर गंदगी और बदबू का आलम है। सारा क्षेत्र मक्खियों से भरा हुआ है तथा बच्चे नालों का उपयोग करते हैं। एक स्थान पर मैंने देखा कि एक व्यक्ति अपने घर के सामने मक्खियों के बीच तथा नालों के कूड़े करकट से कुछ गज की दूरी पर बैठकर दोपहर का भोजन कर रहा था। मैं लगभग टूट सा गया। मेरे साथ के शिक्षित भारतीयों ने अपने चेहरों पर रूमाल ढक लिया था। वहां बच्चों के खेलने के लिए महज एक छोटी सी जगह थी और वह भी बुरी स्थिति में, जब हम गाड़ी में बैठ रहे थे तो मैंने अपनी खिड़कियां ऊपर चढ़ी रखीं थी जिससे मक्खियां भीतर न घुस आयें। उस दिन मैं दोपहर का भोजन (मारे दुख के) नही कर सका था।….लगा बहुत कुछ देख लिया है।”
प्रो. मार्शल ने हमारे विषय में निस्संदेह ये दुखद टिप्पणी 1950 के दशक में की थी, परंतु आज हम 2014 में भी खड़े होकर देखते हैं तो प्रो. मार्शल हमें देखकर आज भी दोपहर का भोजन नही कर पाएंगे। शहरों में पॉश कालोनियों के पास से निकलने वाला नाला या मल जल निकासी की सारी व्यवस्था एक स्थान पर जाकर खुले नाले में मिल जाते हैं, जहां उस नाले के पास आप हजारों लाखों लोगों को उससे भी बुरी अवस्था में देख सकते हैं जो प्रो. मार्शल ने आज से साठ वर्ष पूर्व देखे थे। इस स्थिति को देखकर कौन कह सकता है कि हमने विकास किया है और इस देश में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मनाने के अर्थ क्या हैं? हमारे देश में एक व्यक्ति प्रतिदिन शहरों में लगभग तीन सौ ग्राम से लेकर पांच सौ ग्राम तक कूड़ा कचरा फेंकता है। जैसा जिसका कार्य है, या व्यापार है वह वैसा ही कूड़ा कचरा डाल रहा है। दिल्ली में 16-17 सौ बाजार हैं। जिसमें हरेक में सैकड़ों दुकानें हैं, लगभग 100 साप्ताहिक बाजार लगते हैं, जो घूूम घूम कर करीब 6000 स्थानों पर लगते हैं, इसके अतिरिक्त यहां लगभग 140000 अनौपचारिक खुदरा विक्रय इकाईयां हैं। 95000 औद्योगिक इकाईयां भी यहां विद्यमान हैं, लगभग 10000 इलेक्ट्रोप्लेटिंग करने वाली औद्योगिक इकाईयां बड़ी मात्रा में विषैला अवशिष्ट उत्पन्न कर रही हैं। यहां लगभग 85 अस्पताल और सैकड़ों नर्सिंग होम हैं। साल भर में इस शहर से 20 लाख मीट्रिक टन से भी अधिक कूड़ा उत्सर्जित हो रहा है। हम इस विशाल कूड़े को विनष्ट करने का सही उपाय आज तक नही खोज पाए हैं। सारी नगरीय व्यवस्था चौपट होकर रह गयी है। मल या कूड़े का बहुत बड़ा भाग हर शहर अपने पास से निकलने वाली नदी को ‘ससम्मान भेंट स्वरूप’ प्रदान कर रहा है, जिस देश में नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कभी लोग दूध का भरा लोटा पिलाया करते थे उसमें आज का सभ्य समाज अपनी ‘अयोग्यता’ को छिपाने के लिए कूड़ा डाल रहा है। भारत के अतीत के साथ यह घृणास्पद उपहास है और वर्तमान का एक ऐसा कड़वा सच है जो भविष्य को उजाड़ रहा है। हम अंधेरी सुरंग में घुस चुके हैं और हमें निकलने का इससे कोई रास्ता नही दीख रहा है। लगता है ‘पांडवों’ को समाप्त करने के लिए आज फिर किसी विशाल ‘लाक्षागृह’ का निर्माण कर दिया गया है।
विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 40000 मौतें प्रदूषित वायु के सेवन से हो जाती हैं। शहरों में लगभग ढाई किलोमीटर में ही एक गाड़ी एक लीटर पेट्रोल या डीजल खा जाती है, क्योंकि ‘ट्रैफिक जाम’ की स्थिति इतनी भयानक होती है कि उसमें गाडिय़ां चलती नही हैं, अपितु रेंगती हैं।
1954 में पंडित नेहरू दिल्ली के तुर्कमान गेट से गुजर रहे थे। चारों ओर बस रही मलीन बस्ती के लोगों की दयनीय अवस्था को देखकर वह द्रवित हो उठे थे। तब उनके मुंह से अनायास ही निकल गया था कि-”जला डालो इन्हें।” 1954 से 2014 आ गया है और लगता है कि 2054 भी यूं ही आ जाएगा, परंतु किसी ने भी इन्हें जला डालने का प्रयास नही किया है। नेहरू जी सही थे क्योंकि वह मान रहे थे कि यदि विकास के बीच कहीं ये सारी चीजें खड़ी रह जाएंगी तो विकास विनाश में भी बदल सकता है, क्योंकि विकास का एकांगी होना ही या असंतुलित होना ही उसे अपने लिए ही ‘लाक्षागृह’ बना लेने के समान है। हम यह नही सोच सकते हैं कि यदि कूड़े में आग लगेगी तो उससे हम बच जाएंगे। कूड़ा कूड़े को ही तो जलाता है और कूड़ा कहीं हमारे दिमागों में है इसलिए कूड़े की लपटें हमारे दिमागों तक पहुंचनी लाजिमी हैं। तब हम ही कैसे बच पाएंगे? अच्छा हो कि राजनीति और देश के गंभीर व्यक्ति अपने दिमागों का कूड़ा पहले जला डालें और विकास को विकास के ही रास्ते पर रहने दें।

Comment:

meritking giriş
betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betnano giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betnano giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
maritbet giriş
maritbet giriş
bahiscasino
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betpark giriş
casinoroyal giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
norabahis giriş
grandbetting giriş
grandbetting giriş
meritking giriş
virüsbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
casinoroyal giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
casinoroyal giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bahisfair giriş
casinoroyal giriş
bahisfair giriş
betlike giriş
betlike giriş
betorder giriş
betorder giriş
betbox giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt
betpipo giriş
bettilt
betpipo giriş
betbox giriş
padişahbet giriş
padişahbet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
limanbet giriş
betlike giriş
betlike giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
supertotobet
supertotobet
supertotobet
supertotobet
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
roketbet
roketbet
meritking giriş
meritking giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
vipslot giriş
vipslot giriş
casinoroyal giriş
casinoroyal giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
vaycasino
vaycasino
supertotobet
supertotobet