भारत के वैज्ञानिकों ने बढ़ाया है विश्व में भारत का सम्मान

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिक दुनिया में किसी से भी कम नहीं
हमारे टीकों को ना केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन से मान्यता प्राप्त और विश्वसनीय माना जाता है अपितु दुनिया के देशों में इन टीकों की गुणवत्ता पर पूरा भरोसा है। याद कीजिये कोरोना के शुरुआती दौर में अमेरिका ने किस तरह से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के लिए दबाव बनाया।

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कोरोना महामारी से निजात के लिए सरकार द्वारा दो-दो वैक्सीनों को अनुमति के बावजूद हमारी वैक्सीनों को हम ही संदेह के कठघरे में खड़े करने में सबसे आगे हैं। एक साथ दो वैक्सीनों के आपात उपयोग के लिए अनुमति देने वाला भारत दुनिया का पहला देश है। कल तक अमेरिका, सोवियत रूस व अन्य देशों की ओर वैक्सीनों की आस लगाए दुनिया के देशों को सबसे अधिक विश्वास भारतीय वैक्सीनों पर ही रहा है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक देश जल्दी से जल्दी भारतीय वैक्सीनों की सप्लाई शुरू करने का दबाव बना रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने भारतीय कोविड वैक्सीनों को आपात उपयोग की अनुमति की सराहना की है वहीं ब्रिटेन सहित चार देशों ने आपात उपयोग के लिए भारतीय वैक्सीन को मान्यता दे दी है। दुनिया के देशों से बड़े आर्डर मिलने वाले हैं। ब्राजील तो जल्दी से जल्दी सप्लाई का दबाव बना रहा है। हालांकि चार हजार अरब से अधिक के सालाना कारोबार की संभावना को देखते हुए भारतीय वैक्सीन निर्माता दोनों कंपनियों के बीच अंदरखाने प्रतिस्पर्धा चल रही है जिसका परिणाम सामने है। फिर भी भारतीय वैज्ञानिकों ने एक बार फिर दुनिया के देशों को दिखा दिया है कि स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में वह दुनिया के देशों में किसी से भी कम नहीं हैं। आज हालात यह हैं कि कोरोना महामारी से दुनिया को निजात दिलाने के लिए देश में एक-दो नहीं बल्कि नौ कोरोना टीकों के अनुसंधान में हमारे वैज्ञानिक पुरजोर ताकत के साथ लगे हुए हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों का अपमान है
दरअसल हम आलोचना के नाम पर हम इस हद तक पहुंच जाते हैं कि देश के हित-अनहित को ही भूल बैठते हैं। हम भूल जाते हैं कि दुनिया के देशों में आज भी भारतीय टीकों का डंका बजता है। हम भूल जाते हैं कि दुनिया के विकसित देशों से लेकर विकासशील और अविकसित देशों में भारतीय वैक्सीनों ही नहीं बल्कि दवाओं तक का जादू चलता है। आज हम हमारे देश में हमारी जैनेरिक दवाओं को वो स्थान नहीं दिला पाए जो दुनिया के देशों में भारत द्वारा निर्मित जैनेरिक दवाओं को मिला हुआ है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि अमेरिका, यूरोपीय देशों सहित दुनिया के देशों की कुल मांग की 20 फीसदी से भी अधिक आपूर्ति भारतीय जैनेरिक दवा निर्यातक कंपनियां कर रही हैं। इस पर देश को गर्व होना चाहिए कि दुनिया के 60 फीसदी बच्चों को लगने वाली वैक्सीन भारत और भारत में भी सीरम की वैक्सीन ही लग रही है। दुनिया के करीब 170 देशों में डेढ़ अरब टीकों की खुराक हमारा सीरम इंस्टीट्यूट ही कर रहा है। यह सब इसलिए है कि हमारे टीकों को ना केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन से मान्यता प्राप्त और विश्वसनीय माना जाता है अपितु दुनिया के देशों में इन टीकों की गुणवत्ता पर पूरा भरोसा है। याद कीजिए कोरोना के शुरुआती दौर में अमेरिका सहित दुनिया के देशों ने किस तरह से हमारे देश द्वारा निर्मित और मलेरिया के लिए अतिविश्वसनीय दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को उपलब्ध कराने का दबाव बनाया और फिर भारत द्वारा अमेरिका को दवा उपलब्ध कराने के कारण आलोचना का शिकार भी होना पड़ा। खैर आलोचना-प्रत्यालोचना अलग बात है पर हमें इसका गर्व होना चाहिए कि अमेरिका जैसे देश को कोरोना के हालातों में हमारी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन पर विश्वास जताना पड़ा।

आज दुनिया के देशों में बच्चों को जितने प्रकार के टीके लगाए जाते हैं उनमें भारत द्वारा निर्मित टीकों का ही बोलबाला है। एक जमाने में टिटनेस जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए टिटनेस का टीका तैयार कर सामने आये पूना के सीरम इंस्टीट्यूट ने पोलियो जैसी बीमारी से निजात दिलाने के लए दो बूंद के नाम से ख्यातनाम पोलियो की पीने की खुराक तक बना कर दुनिया को बता दिया कि अनुसंधान के क्षेत्र में हम दुनिया से दो कदम आगे ही हैं। सीरम ने टिटनेस के बाद सांप काटने के ईलाज के लिए एंटीडोट्स उतारा। कोविशील्ड के पहले पोलियो वैक्सीन के साथ ही डिप्थिरिया, पट्र्युसिस, एचआईवी, बीसीजी, आर-हेपेटाइटस बी, खसरा, मम्स, रुबेला जैसे टीकों का निर्माण और निर्यात हो रहा है। 1967 में टिटनेस के टीके के उत्पादन से शुरू हुई इस कंपनी ने 2004 में दुनिया का पहला तरल एचडीसी रैबिज तरल टीका उतारा तो स्वाईन फ्लू का टीका भी उतारा जा चुका है। आज दुनिया के देशों के बच्चों के जो जीवनदायी टीके लगाए जा रहे हैं उनमें 60 फीसदी भागीदारी हमारे टीकों की है। यह हमारी गुणवत्ता और विश्वसनीयता की पहचान है। ऐसे में कोरोना के विश्वव्यापी संकट के दौर में हमारे स्वदेशी टीकों की ओर दुनिया टकटकी लगाए हुए है। हमारे वैज्ञानिकों के प्रयास से वो दिन दूर नहीं जब कोविशील्ड और कोवैक्सिन का डंका भी दुनिया भर में बजेगा। आज जिस तरह से दुनिया भारतीय वैज्ञानिकों की ओर आशा भरी नजरों से देख रही है उससे आने वाला समय भी हमारा ही होगा और इसके लिए हमें हमारे वैज्ञानिकों के अनुसंधान की ना केवल सराहना करनी चाहिए अपितु हमें इस सफलता पर गौरवान्वित भी महसूस करना चाहिए।

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