महर्षि दयानंद और गौ रक्षा

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* गावो विश्वस्य मातर: *

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है।

प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है। इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।

गोकरुणानिधि का उद्देश्य
इस ग्रंथ की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी लिखते है कि “यह ग्रंथ इसी अभिप्राय से लिखा गया है जिससे गौ आदि पशु जहाँ तक सामर्थ्य हो बचाये जावे और उनके बचाने से दूध, घी और खेती के बढ्ने से सब का सुख बढ़ता रहे।”

आर्यराज (स्वराज्य) और गौ
ऋषि वचनामृत1ऋषि वचनामृत

महर्षि जी लिखते है कि “जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे। तभी आर्यावर्त व अन्य देशों में बड़े आनंद से मनुष्य आदि प्राणी रहते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकार गौ आदि पशुओं को मरने वाले राज्याधिकारी हुए है तब से क्रमश: आर्यों के दु:खों की बढ़ती होती जाती है क्योंकि “नष्टे मुले नैव फलं न पुष्पम।” (सत्यार्थ प्रकाश) परंतु शोक! महाशोक! विदेशियों से आजादी मिलने के बाद भी हमारे शासकों ने इस भारत रूपी वृक्ष की जड़ को सींचने की बजाय काटने का ही कार्य किया है।

गौ सब सुखों का मूलऋषि वचनामृत3
महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”

गौ की उपयोगिता
गौ का हमारे दैनिक जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव है और खाद्य समस्या को हल करने आदि बातों पर महर्षि जी लिखते है – “इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता। क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में दूध आदि मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है। दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।”

गौ की विशेषताऋषि वचनामृत2
सभी पशुओं की रक्षा का आदेश देते हुए ऋषि ने सबसे अधिक बल गौ पर ही दिया है। उन्होने लिखा है – “वर्तमान में परमोपकरक गौ की रक्षा में ही मुख्य तात्पर्य है।” एक ही गौ से होने वाले लाभ का सविस्तार ब्योरा लिखने के बाद ऋषि लिखते है कि “एक गाय कि एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हजार छ: सौ मनुष्यों का पालन होता है और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ा कर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है।” (स०प्र०) गुणों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही आर्यों ने गाय को सब पशुओं को सर्वोत्तम माना है। आजकल तो सभी विद्वानों आदि ने स्वीकार कर लिया है कि भारत की देशी गाय के दूध में A२ होता है जिससे सभी रोग यहाँ तक की कैंसर व एडस जैसे असाध्य रोग भी ठीक हो सकते है।

गौवध महापाप
‘गोकरुणानिधि’ में एक गाय से होने वाले लाभ की चर्चा करते हुए स्वामीजी लिखते है कि “जबकि एक गाय की एक पीढ़ी में कई लाख मनुष्यों का पालन होता है। इसके मांस से अनुमान है कि केवल ८० मांसाहारी मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते है। देखों, तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य प्राणियों की हानि करना महापाप क्यों नहीं है?”

महोपकारक गौ और क्रूर मनुष्य
महर्षि जी लिखते है कि “देखिये, जो पशु नि:सार तृण, पत्ते, फल, फूल आदि खावे और सार दूध आदि अमृतरूपी रत्न देवे, हल गाड़ी आदि में चलके अनेकविध अन्न आदि उत्पन्न कर सब के बुद्धि, बल, प्राक्रम को बढ़ा के नीरोगता करे, पुत्र, पुत्री और मित्र आदि के समान पुरुषों के साथ विश्वास और प्रेम करें, जहाँ बांधे वही बंधे रहे, जिधर चलावे उधर चलें, जहां से हटावे वहां से हट जावे, देखने और बुलाने पर समीप चले आवें, जब कभी व्याघ्रादि पशु या मरने वाले को देखें तो अपनी रक्षा के लिए पालन करने वाले के समीप दौड़ कर आवे कि यह हमारी रक्षा करेगा।ऋषि वचनामृत4

जिसके मरे पर चमड़ा भी कंटक आदि से रक्षा करे, जंगल में चर के अपने बच्चे और स्वामी के लिए दूध देने को नियत स्थान पर नियत समय पर चले आवें, अपने स्वामी की रक्षा के लिए तन-मन लगावे, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदि मनुष्यों के सुखों के लिए है, इत्यादि शुभ गुणयुक्त सुखकारक पशुओं के गले छुरों से काटकर जो अपना पेट भर सब संसार की हानि करते है, क्या संसार में उन से भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारी, दु:ख देने वाले और पापी जन होंगे? इसलिए यजुर्वेद के प्रथम ही मंत्र में परमात्मा की आज्ञा है कि [अघ्न्या: पशून् पाहि] हे पुरुष ! तू इन पशुओं को कभी मत मार अपितु इनकी रक्षा कर जिससे तेरी भी रक्षा होवे। इसी से ब्रह्मा से लेकर आज पर्यन्त आर्य लोग पशुओं कि हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और अब भी समझते है।”

राजा को चेतावनीऋषि वचनामृत5
गोवध से होने वाली हानियों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी लिखते हैं – “गो आदि पशु के नाश होने से राजा और प्रजा का भी नाश हो जाता है। क्योंकि जब पशु न्यून हो जाते है तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी घटती होती है। ……..और यह भी ध्यान रखिए, कि वे पशु आदि और उनके स्वामी खेती आदि कार्य करने वाले प्रजा के पशु आदि और मनुष्यों के अधिक पुरुषार्थ से ही राजा का ऐश्वर्य अधिक बढ़ता और न्यून से नष्ट हो जाता है।”

राजा का कर्तव्यऋषि वचनामृत6
ऐसी दशा में राजा के कर्तव्य का निर्देश करते हुए स्वामी जी लिखते है – “राजा प्रजा से कर (tax) लेता है कि उनकी रक्षा यथावत करे न कि राजा और प्रजा के जो सुख के कारण गाय आदि पशु है उनका नाश किया करे। इसलिए आज तक जो हुआ सो हुआ आगे आँख खोलकर सब के हानिकारक कर्मों को न कीजिये और न करने दीजिये। हां, हम लोगों का यही काम है कि आप लोगों की भलाई और बुराई के काम जता देवेन और आप लोगों का यही काम है कि पक्षपात छोड़ कर सब कि रक्षा और बढ़ती करने में तत्पर रहें।”

शासन विधान में गोवध-निषेध की मांग
स्वामी जी की निश्चित धारणा थी कि गाय जैसे उपकारी पशुओं का वध राजकीय व्यवस्था में दण्डनीय होना चाहिए और शासन विधान में गोवध का निषेध करने वाली धारा का समावेश होना चाहिए। ऋषि लिखते है कि “बड़े आश्चर्य की बात है कि पशुओं को पीड़ा न देने के लिए न्याय पुस्तक में व्यवस्था भी लिखी है कि जो पशु दुर्बल और रोगी हो उनको कष्ट न दिया जाये। जितना बोझ सुखपूर्वक उठा सके उतना ही उन पर धरा जावे। श्रीमति विक्टोरिया महारानी का विज्ञापन भी प्रसिद्ध है कि इन अव्यक्तवाणी पशुओं को जो-जो दु:ख दिया जाता है वह न दिया जावे। तो भला क्या मार डालने से भी अधिक कोई दु:ख होता है? क्या फांसी से अधिक दु:ख बन्दीगृह में होता है ?

आज उनकी मृत्यु के लगभग १३० वर्ष बाद भी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है बल्कि ओर ज्यादा खराब हुई है।

गोवध करने वाले को प्राणदण्डऋषि वचनामृत7
गौ की उपयोगिता को देखते हुए ऋषि ने गोवध करने वाले को मनुष्य की हत्या करने वाले से भी अधिक अपराधी माना। वे लिखते है – “इन पशुओं की हत्या करने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाला जानिए।” (स० प्र०)

इन मूक प्राणियों की दयनीय अवस्था पर आँसू बहाते हुए स्वामी जी उन पशुओं की अन्त:करण की आवाज कहलवाते है – “देखों हमको बिना अपराध के बुरे हाल से मारते है और हम रक्षा करने तथा मारने वालों को भी दूध आदि अमृत पदार्थ देने को जीवित रहना चाहते है और मारे जाना नहीं चाहते। देखो, हम लोगों का सर्वस्व परोपकार के लिए है और हम इसलिए पुकारते है कि हमको आप लोग बचावे। हम तुम्हारी भाषा में अपना दु:ख नहीं समझ सकते और आप लोग हमारी भाषा नहीं जानते। नहीं तो क्या हममें से किसी को कोई मारता तो हम भी आप लोगों के सदृश अपने मारने वालों को न्यायव्यवस्था से फांसी प न चढ़वा देते ?

गोचरभूमि की मांग
गोवंश की रक्षा और वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि गवादि पशुओं के चरने के लिए पर्याप्त जमीन पड़ी हुई हो। स्वामी जी ने इस आवश्यकता को अनुभव करते हुए लिखा है कि – “जो कोई मनुष्य भोजन करने उपस्थित हो उसके आगे से भोजन के पदार्थ उठा लिए जावे और उसको वहां से दूर किया जावे तो क्या वह सुख मानेगा? ऐसे ही आज कल के समय में कोई गाय आदि पशु सरकारी जंगल में जाकर घास और पत्ता जोकि उन्हीं के भोजनार्थ है बिना महसूल दिये खावे वा खाने को जावे तो बेचारे उन पशुओं और उनके स्वामियों की दुर्दशा होती है। जंगल में आग लग जावे तो कुछ चिंता नहीं, किन्तु वे पशु न खाने पावे। ध्यान देकर सुनिये कि जैसा सुख-दु:ख अपने को होता है वैसा ही औरों को भी समझा कीजिये।” राष्ट्रीय सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि वह उस समस्त गोचरभूमि को जोकि उसने जब्त की हुई है, तत्काल लौटा देवे जिससे भारत के मनुष्यों की भांति पशु भी स्वाधीनता पूर्वक विचार सकें।

हमारा कर्तव्यऋषि वचनामृत8
ऋषि लोगों को उपदेश करते है – “सुनो बन्धुवर्गो ! तुम्हारा तन, मन, धन गाय आदि की रक्षा रूप परोपकार में न लगे तो किस काम का ? देखो, परमात्मा का स्वभाव कि जिसने सब विश्व और सब पदार्थ परोपकार ही के लिए रच रखे है वैसे तुम भी अपना तन, मन, धन परोपकार ही के अर्पण करो।”

ऋषि के उपदेश को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है कि वह गोरक्षा आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्राणर्पण से जुट जावे।

गोकृष्यादि रक्षिणी सभा
इस (गोरक्षा) उद्देश की पूर्ति के निमित्त स्वामी जी ने गांव-गांव में गोकृष्यादि रक्षिणी सभाओं की स्थापना करने की योजना देश के सामने रखी थी। यदि देश ने उस पर आचरण किया होता तो उसमें भुखमरी की सृष्टि न हुई होती। होती भी तो उसका रूप इतना भयंकर कदापि न होता। गोधन के ह्रास के साथ-साथ हमारा आर्थिक ह्रास तो हो ही रहा है, हमारे शरीर भी दिन प्रतिदिन निर्बल होते है। हमारा सम्पूर्ण सुख और वैभव अतीत की कहानी भर रह गया है।

गौ भारत का अभिमान है, राष्ट्र की पताका है, स्वराज्य का आधार है, सुखों का स्त्रोत है, संपत्ति का केंद्र है, निर्धन का जीवन है, धनवान की शोभा है, सरलता और सौम्यता की सजीव मूर्ति है, परोपकार की प्रतिमा है और नि:स्वार्थ सेवा का पार्थिव रूप है। ऐसी गौ की हर प्रकार से रक्षा करना मनुष्य-मात्र का कर्तव्य है।

महर्षि दयानन्द जी का स्तुत्य प्रयत्न

१५ अगस्त सन् १८८२ को महाराजा नाहरसिंह वर्मा जी के नाम पत्र में महर्षि जी ने लिखा :-

“प्रथम तो श्रीमान् महाशयों ने करुणा पूर्वक ४०००० पुरुषों की ओर से हस्ताक्षर कर पत्र मुम्बापुरी में हमारे पास भेजा था परंतु अब इस विषय में श्रीमानों के प्रबन्ध से कितनी सही हुई है। जो महाशय इन महोपकरक माता-पिता के समान संसार के रक्षक करुणा पात्र गायादि पशुओं के दु:ख निवारणार्थ प्रयत्न किया है वा करते जाते हैं वह अवश्य सफल होकर इस आर्यावर्त की ओषधि रूप होकर सब आर्यों के हृदय की अग्नि को शान्त करेगा।”

ज्येष्ठ बदी ९ सम्वत् १९३८ में म० रूपसिंह जी को महर्षि जी ने लिखा :-

“आपने गोरक्षार्थ पत्र के बाबत में लिखा सो हमने जिस समय आपके पास पत्र भेजा था उसी समय लाहौर आदि स्थानों में पत्र भेज दिये थे। ऐसा आर्यावर्त के भीतर कोई देश बचा हो कि जहाँ दो-चार स्थानों में पत्र न भेजे हों। और जहाँ-जहाँ की यादगारी आती जाती है वहाँ-वहाँ अभी भेजे जाते है। क्या आप पुन: दो-एक मास की छुट्टी लेकर पंजाब हाथा, पटियाला और कश्मीर आदि राज स्थानों में गोवध के नुकसान व्याख्यान द्वारा विदित करा, बड़े-बड़े प्रधान राज पुरुष तथा राजा महाराजों को सही कराएँ तो बस आप आर्यावर्त के सर्वोत्तम प्रतिष्ठा और महापुण्य के भागी होंगे। यह लेख मैंने आपकी योग्यता समझ के लिखा।”

८ अप्रैल १८८२ को बम्बई से महर्षि दयानन्द जी ने जयपुर कौंसिल के एक मंत्री श्री ठा० नंदकिशोरसिंह जी को जो पत्र भिजवाया उसमें लिखा :-

“गोरक्षा के विषय में बड़ी तत्परता से कार्य चल रहा है और सफलता मिल रही है। बम्बई से गोहत्या को बंद करवाने के लिए २००० हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं। हम न केवल अपनी देशी रियासतों से ही गोहत्या को बन्द करवाना चाहते है बल्कि पार्लियामेंट को भी इस विषयक ऐक्ट (कानून) बनवाने के लिए आवेदन पत्र भेजना चाहते हैं। इस उद्देश्य से हम दो करोड़ व्यक्तियों के हस्ताक्षर इकट्ठे करना चाहते हैं। यह आशा है कि सब राजा लोग भी एक दूसरे को इस विषय में सलाह देंगे।

…… कृपा करके अधिक से अधिक व्यक्तियों के हस्ताक्षर उन फार्मों पर ले लें जिन्हें हम आप के पास पृथक् भिजवा रहे हैं।”

१२ मार्च सन १८८२ को महर्षि दयानन्द ने मंत्री आर्य समाज दानापुर को निम्न पत्र लिखा :-

“मंत्री आर्य समाज दानापुर आनंदित रहो। मैं आप परोपकार प्रिय धार्मिक जनों को सब जगत के उपकारक गाय, बैल और भैंस आदि की हत्या के निवारणार्थ दो पत्र एक तो सही करने का और दूसरा जिसके अनुसार सही करनी करानी हैं दो पत्र भेजता हूँ। इसको आप प्रीति और उत्साह पूर्वक स्वीकार कीजिये जिससे आप महाशय लोगों की कीर्ति की संसार में सदा विराजमान रहे। इस काम को सिद्ध करने का विचार इस प्रकार किया गया है कि दो करोड़ से अधिक राजे महाराजे प्रधान आदि महाशय पुरुषों को सही करा के आर्यावर्तीय श्रीमान् गवर्नर जनरल साहेब बहादुर से इस विषय की अर्जी कर के ऊपरी लिखित गाय आदि पशुओं की हत्या को छुड़वा देना। मुझ को दृढ़ निश्चय है कि प्रसन्नता पूर्वक आप लोग इस महोपकारक कार्य को शीघ्र करेंगे। अधिक प्रति भेजने का प्रयोजन यह है कि जहाँ-२ उचित समझे वहाँ-२ सही करा लीजिये।”

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