आइए जाने प्राकृतिक खेती के बारे में

download (8)

——————-
लेखक :- धर्मपाल सिंह,
लेखक किसान हैं।

उत्तम खेती मध्यम बाण। निषिद्ध चाकरी भीख निदान। यह कहावत बचपन में सुनी थी। उस समय यह समझ नहीं आई थी। आज जब समझ में आई तो लगता है कि समय बहुत निकल चुका है। शेष बचा हुआ समय भी बहुत उपयोगी हो सकता है यदि कहावत के अर्थ को समझें।
दुनिया प्रमुख रूप से तीन कार्यो में लगी है। खेती, व्यापार और नौकरी। खेती को उत्तम दर्जा दिया गया, क्योंकि समस्त जीवन का आधार भोजन है, जो इससे प्राप्त होता है। पर्यावरण की शुद्धि के लिये भी पेड़-पौधे ही सहायक हैं, इसलिये ये कार्य उत्तम है। दूसरे नम्बर पर व्यापार को माना है। व्यापार में केवल तीन विचार प्रमुख रहते हैं। जहां से मुझे माल खरीदना है उसका विचार, जहां मुझे बेचना है उसका विचार, तीसरा लाभ यानि अपना विचार। तीसरे क्रमांक पर नौकरी को माना है। नौकरी में केवल अपना ही विचार होता है मेरी तन्खा, मेरी छुटटी, मेरी उन्नति आदि। वहां न अपने से छोटे कर्मचारी का विचार आता है और न ही अपने बड़े अधिकारी का विचार आता है।


आज की स्थिति यह है कि समाज में नौकरी का अधिक सम्मान होने के कारण श्रेष्ठ प्रतिभाएं नौकरी करना चाहती हैं। उस से कम प्रतिभावान लोग व्यापार करना चाहते हैं और उस से भी कम वाले लोग वे मजबूरी में खेती किसानी के काम में लगते हैं। हालांकि यह कोई स्थाई परिस्थिति नहीं, बल्कि एक अस्थाई प्रायोजित षडय़न्त्र है जो हम पर थोपा गया है।
यह भी सच है कि दुनिया के चार बड़े व्यापार आज खेती के कारण ही चल रहे है। यह खेती है रासायनिक (जहरयुक्त) खेती। इससे जुड़ा पहला व्यापार है – डीजल-पेट्रोल और उससे चलने वाली मशीनें। दूसरा व्यापार है कृषि में लगने वाले खाद्य यन्त्र (ट्रैक्टर), बीज, दवाई आदि। तीसरा व्यापार है – मनुष्यों की दवाई (एलोपैथिक) और अस्पताल। चौथा व्यापार है हथियारों का। ये चारों व्यापार यूरोपीय तथा अमेरिकी (विदेशी) व्यापार है। भारत का पैसा इन्हीं व्यापारों के माध्यम से विदेशों में जा रहा है। इन्हीं व्यापारों के कारण ही भारत गरीब दिखाई देने लगा है, बीमार दिखाई देने लगा है। चूंकि रासायनिक कृषि में यन्त्रों का अधिक प्रयोग होता है। डीजल-पेट्रोल अधिक लगता है। बीज हाइब्रिड हो गया है, खाद्य और जहरीली दवाओं के कारण खाद्यान्न (अन्न) जहरीला हो गया है और इस कारण बीमारों से अस्पताल भरे नजर आने लगे हैं।
इस विषैले भोजन के कारण आदमी की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो रही है। आज से 60—70 साल पहले बुढ़ापे में दवा की जरूरत पड़ती थी, अब गर्भ के अन्दर का शिशु भी दवा पर निर्भर हो चुका है। जैसा खाये अन्न वैसा होवे मन। जहरीला अन्न खा कर मन में शान्ति की जगह अराजकता का मानस निर्माण हो गया है। इस कारण हथियारों का व्यापार फल-फूल रहा है। भावी पीढ़ी का भविष्य अन्धकारभय व डरावना दिखाई देने लगा है। विश्व व्यापार सगंठन की चेतावनी आ रही है कि 2022 में मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता इतनी गिर जायेगी कि सामान्य बुखार और जुकाम जैसे बीमारियां महामारी का रूप धारण कर सकती हैं। 2030 में तो भयंकर महामारी के संकेत दे दिये है।


इन सभी संकटों का हल न तो सरकार के पास है और न ही बुद्धिमान वैज्ञानिकों के पास। इस संकट का हल केवल किसान के पास है। यदि किसान खेती को फिर से उत्तम बना दे, अपने खेतों में जहर डालने से परहेज करे, केवल देसी गाय के गोबर-गोमूत्र से प्राकृतिक खेती करे तो फिर से स्वस्थ, सम्पन्न और वैभवशाली भारत बनाया जा सकता है। उसके लिये न यन्त्रों की आवश्यकता है और न डीजल-पेट्रोल की। केवल संकल्प की आवश्यकता है। ऐसा बहुत से किसान कर के दिखा भी रहे हैं।
प्राकृतिक खेती यानि प्रकृति के संसाधन के द्वारा खेती। प्रकृति में जीवन है, जीवन यानि जीव—वन अर्थात् जीव और वन की प्रकृति में परस्परता निर्भरता है। जीव जो श्वांस के द्वारा ग्रहण करता है वह आक्सीजन है और जो त्याग करता है वह कार्बन डाई ऑक्साइड है। वन जो श्वांस में लेता है वह कार्बन डाई ऑक्साइड है और जो त्यागता है वह आक्सीजन है। एक दूसरे के श्वांस परस्पर एक दूसरे से होकर गुजर रहे हैं।
जीव जो मुंह के द्वारा खाकर त्याग करता है वह जीव का मल है। वह दन यानि वनस्पति का भोजन है। वन (वनस्पति) जो खाकर त्याग करता है, वह फल जीव का भोजन है। भोजन में भी एक दूसरे के प्रति निर्भरता है। इसलिये इस निरन्तर गतिमान चक्र को ही जीवन कहा है।
गाय के गोबर और गोमूत्र के द्वारा की जाने वाली प्राकृ तिक खेती में अधिक टिकाऊपन होता है। गाय के दो उत्पाद हैं। पहला गोबर व गोमूत्र और दूसरा दूध। गोबर को गोबर गैस के उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। गोबर गैस के भी दो उत्पाद हैं। पहला स्लरी अर्थात तरल गोबर और दूसरा गैस। स्लरी का उपयोग खेत मे किया तो खेत से भी दो उत्पाद मिलेंगे। पहला भूसा या पराली या अगोला यानि चारा और दूसरा अन्न अर्थात धान या गेंहू, सब्जी, फल आदि। गाय का पहला उत्पाद गोबर गोबरगैस का भोजन है। खेत का पहला उत्पाद चारा (पराली, भूसा, अगोला) गाय का भोजन है। यह एक प्राकृतिक चक्र है जिसमे मानव द्वारा उत्पादन की कोई आवश्यकता ही नहीं है। केवल इसकी निरन्तरता को स्वभाव में लाने की आवश्यकता है।
ऐसे करें प्राकृतिक कृषि का प्रबन्धन
(1) जुताई प्रबन्धन: प्राकृ तिक कृषि में बार—बार जुताई की या गहरी जुताई की आवश्यकता नहीं है। धरती को सूखी घास या पहली फसल के अवशेष से ढंक देते हैं, जिसे अच्छादन (मल्चिंग) कहते हैं तो अनन्त कोटि जीवाणु धरती की जुताई करते हैं और धरती को उपजाऊ बनाते हैं।
(2) सिंचाई प्रबन्धन: जब धरती सूखे पत्तों से ढंकी रहती है तो सूखा पत्ता पर्यावरण से नमी सोखता है और उसे धरती को प्रदान करता है। उदाहरण के लिये जंगल में जितनी वनस्पति है, सड़क के दोनों ओर रास्तों पर जो वनस्पति लगी हुई है, उनकी सिंचाई कोई नहीं करता, फिर भी वे पनपते हैं, बढ़ते हैं। उन्हें पत्तों के द्वारा ही नमी मिलती है। वनस्पति पानी नहीं पीते, वे अपनी प्यास 50 प्रतिशत हवा से तथा 50 प्रतिशत धरती की नमी से बुझाते हैं। केवल 10 प्रतिशत सिंचाई से ही उन्हें पर्याप्त नमी मिल जाती है।
(3) खरपतवार नियन्त्रण: यदि खेत में सूखे पत्ते या पहली फसल का अवशेष बिछा दें तो खरपतवार उगता ही नहीं। यदि फिर भी हो जाये तो आसानी से निराई हो जाती है।
(4) रोग प्रबन्धन: फसल में रोग दो कारणों से होते हैं। या तो असन्तुलित खाद व दवाई के कारण। जैसे कि स्वस्थ खेती पर सिस्टैमिक दवाई का छिड़काव करेंगे तो रोग आयेंगे। जैसे किसी स्वस्थ आदमी को बुखार की दवा दे दी जाये तो लीवर पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। यदि बिना दस्तों के दस्त बन्द करने की दवा दे दी जाये तो कब्ज होगा ही। इसी प्रकार यदि हमारे खेत में दो प्रतिशत पौधों में रोग के लक्षण हैं परंतु सभी पौधों को उस रोग की दवा दे दी तो सामान्य पौधों की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जायेगी। तब वे वातावरण से भी रोग पकड़ेंगे। पानी की अधिकता के कारण फंगस के रोग आते हैं। प्राकृतिक खेती में रासायनिक खेती की तुलना में मात्र 10 प्रतिशत पानी ही नाली के द्वारा दिया जाता है। इसलिए रोग की संभावना घट जाती है। गौमूत्र का छिड़काव भी पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
(5) कीट प्रबन्धन: प्राकृतिक कृषि में कीट प्रबन्धन प्रकृति का ही है प्रकृति मे 2 प्रकार के कीट है। (1)— शाकाहारी कीट (2)— मांसाहारी कीट। शाकाहारी कीट शाकाहार करते हैं यानी फसल को खाते हैं। मांसाहारी कीट फसल नहीं खाते, वे शाकाहारी कीटों को खाते हैं। जिस प्रकार मांसाहारी पशु शाकाहारी पशु का ही शिकार करते हैं। शेर गाय, बकरी, हिरन आदि का ही शिकार करता है चीते, भेडिय़े आदि को नही खाता, इसी प्रकार मांसाहारी कीट शाकाहारी कीट को ही खाता है। इस प्रकार मांसाहारी कीट भी प्राकृतिक रूप से फसल के लिए नुकसानदेह कीटों का नियंत्रण करता है।
इसके अलावा प्राकृतिक कीटरोधक भी बनाए जा सकते हैं। ऐसी वनस्पतियां जिन्हें शाकाहारी कीट भी नहीं खाते, जैसे, नीम, आखा या एरन्ड, तम्बाकू, हरी मिर्च, लहसून, भांग, धतुरा आदि के पत्तों को गोमूत्र में 20—25 दिन तक सड़ा कर कीटरोधक दवा तैयार कर लेते हैं। यह कीटनाशक नहीं, कीटरोधक है। कीट नाशक दवा से मांसाहारी कीट भी मरता है जबकि कीटरोधक दवा से मांसाहारी कीट नहीं मरता। शाकाहारी को खाता है।
(6) खाद्य प्रबन्धन: वनस्पति का 98 प्रतिशत भोजन पर्यावरण के द्वारा निर्माण होता है। दो प्रतिशत ही धरती के तत्वों के द्वारा बना होता है। यदि हम किसी भी फसल को काट कर पूरी तरह से सुखा दें 20 प्रतिशत भार ही शेष रहता है, यानि 80 प्रतिशत पानी की मात्रा थी, वह निकल कर चली गई। फिर शेष 20 प्रतिशत अवशेष में यदि आग लगा दी जाये तो हम देखते है कि किसी धुवें का रंग सफेद है, किसी धुवें का रंग काला है। किसी अग्नि की लौ लाल रंग यानि सूर्य के रंग की है, कोई हरी है, कोई बैंगनी या कोई नीले रंग में भी दिखाई देती है। यानि ब्रह्मान्ड में चांद, सूरज, ग्रह-नक्षत्रों से जो ऊर्जा वनस्पति ने ली थी, वह निकल-निकल कर जा रही है। यानि प्रकृति से जो भी लिया था, वह उसी प्रकृति में ही चला जाता है। धरती पर दो प्रतिशत राख बची। जो धरती से लिया था, वही धरती पर रहा। यह दो प्रतिशत जो बचा है, वह सूक्ष्म जीवाणुओं के माध्यम से लिये सूक्ष्म तत्व हैं। इन सूक्ष्म तत्वों को जमीन के अन्दर से निकाल कर लाने का काम केंचुआ करता है जो देशी गाय के गोबर की गंध से सक्रिय होता है। उन तत्वों को प्रस्संकरित करके रसायन के रूप में वनस्पति की जड़ों को उपलब्ध कराने का काम सूक्ष्म जीवाणु करते हैं, जो गाय के गोबर में किन्वन क्रिया के द्वारा पैदा होते हैं।
मिश्रित खेती के कारण भी प्राकृतिक खेती में पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है। किस फसल का सहजीवन किस फसल के साथ है, इसका यदि ध्यान करें तो पता चलता है कि एक दल वाली फसल का सहजीवन, द्वीव दल वाली फसल के साथ बहुत अच्छा परिणाम देती है।
(7) बीज की सन्तुलित मात्रा अथवा दूरी का सिद्धान्त: प्रकृति में हर वनस्पति का अलग अलग आकार व आयु है। उसके अनुसार ही एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी का निर्धारण भी वनस्पति के आकार-विस्तार के अनुकूल ही होना चाहिए। ज्यादा मात्रा में बीज डालने से या ज्यादा फासला देने पर भी उपज प्रभावित होती है।
✍🏻साभार – भारतीय धरोहर

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betpas giriş
betpas giriş
safirbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
hitbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
savoybetting giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş