व्याकुलता संवेग तीव्र कर …..

*वेद वाणी*

आचार्या विमलेश बंसल आर्या

ओ३म् अश्मन्वती रीयते संरभध्वं। उत्तिष्ठत प्र तरता सखायः। अत्रा जहीमो अशिवा। ये असन् शिवां वयं उत्तरेम अभि वाजान्।।-यजुर्वेद-३५-१०,
भजन🎤


बही जा रही बड़े वेग से,
नदी भरी जो पत्थर से।
आओ मिलकर पार करें सब,
पकड़ के हाथ परस्पर से।।
१-
मन में हिम्मत प्रथम उठाएं,
लक्ष्य साधने लें संकल्प।
व्याकुलता संवेग तीव्र कर,
चुभन करें कुछ पग की अल्प।।
धैर्य, विवेक, वैराग्य, जोश भर, बचें राग की फिसलन से।।
आओ मिलकर–
२-
काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, मद,
अशिव का बोझ यहीं छोड़ें।
ज्ञान वैराग्य से हल्के होकर,
लक्ष्य को सम्मुख रख दौड़ें।
शिवमय ही बांधें सामिग्री,
भय चिंता से रहित हँस के।।
आओ मिलकर—
३- उठो खड़े हो जाओ तत्पर,
समय आ गया तरने का।
एक के वश का नहीं काम यह,
बनकर सहायक बढ़ने का।
बोलो जय उस परमपिता की,
सुगम सरल हो उच्च स्वर से।।
आओ मिलकर—-
४- जिसने भी इस पथरीली
नदी,
को उद्योग से पार किया।
कभी न फिसला कभी न लुढ़का,
थाम हाथ कर्त्तार लिया।।
हम भी होकर विमल उसी के,
बढ़ते चलें पी रस खस के।।
आओ मिलकर—–

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