महाराजा द्वारा निर्मित कानून ही धारा 370 का जनक:भीमसिंह

राकेश कुमार आर्य

प्रो भीमसिंह भारतीय राजनीति के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं जिन्हें कश्मीर संबंधी किसी भी प्रश्न पर उपेक्षित नही किया जा सकता। जम्मू-कश्मीर की हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या को लेकर वह पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सक्रिय हैं। प्रो. सिंह पैंथर्स पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और जम्मू कश्मीर विधानसभा में दो बार विधायक भी रहे हैं। उनकी बौद्धिक क्षमताओं के दृष्टिगत पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल तक बनाने का निर्णय ले लिया था। भारत के पूर्व चीफ  जस्टिस पी.एन. भगवती हों चाहे पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल हों और चाहें फि लिस्तीनी नेता यासिर अराफ ात जैसी विश्व हस्तियां हों सभी ने समय-समय पर प्रो. भीम सिंह की सूझबूझ, उच्च नेतृत्व क्षमता और उनके मानवीय गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। प्रो. सिंह ने पिछले दिनों पाकिस्तान का दस दिवसीय दौरा संपन्न किया है। इस सदभावना यात्रा में उन्हेांने लाहौर बार एसोसिएशन को भी संबोधित किया। जहां बार एसोसिएशन के सचिव श्री नईम गुज्जर ने उनसे विषय में कहा श्री सिंह यह सिर्फ वकील ही नही इंसान ही नही बल्कि फ रिश्ता हैं।

अब जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 के हटाने की एक बहस देश में चल रही है, तो हमने इस विषय में प्रो. सिंह से बातचीत करना उचित समझा। ‘उगता-भारत’ के लिए पत्र के मुख्य संपादक श्री राकेश कुमार आर्य को दिये गये अपने साक्षात्कार में प्रो. सिंह ने अपनी बेबाक बातचीत में कई नये तथ्यों का खुलासा किया। जिन्हें हम यहां पाठकों के साथ सांझा कर रहे हैं।

प्रो. सिंह का कहना है कि कश्मीर में धारा 370 को लगवाने के लिए कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह के द्वारा बनाये गये उस कानून के प्राविधान जिम्मेदार हैं, जो उन्होंने 1925 में कश्मीर के महाराजा बनने के दो साल बाद 1927 में बनाया था। महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर की वादियों में अंग्रेजों की बढ़ती चहल कदमी को रोकने के लिए यह कानून बनाया कि कोई भी भारतीय या अन्य प्रांतों से आने वाला कोई भी व्यक्ति इस प्रदेश में स्थायी रूप से निवास नही कर सकता और ना ही यहां जमीन खरीद सकता है। कश्मीर के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य की रक्षार्थ महाराजा ने यह कानून बनाया पर बाद में धारा 370 की आड़ में यही कानून पूरे देश के लिए जी का जंजाल बन गया।

प्रो. सिंह का मानना है कि 26 अक्टूबर 1947 को जब भारत के साथ जम्मू कश्मीर रियासत का विलय हो गया तो उसके बाद भी वहां राजशाही 1952 तक स्थापित रही। 20 अगस्त 1952 तक राजशाही को क्यों कायम रखा गया यह स्थिति तत्कालिक नेतृत्व को कठघरे में खडी करती है। यदि 26 अक्टूबर 1947 को ही इस रियासत का भारत में पूर्व विलय कर लिया जाता तो स्थिति दूसरी हो सकती थी। तब पाकिस्तान को भारत के 4600 वर्ग किमी के क्षेत्रफ ल को कब्जाने का मौका नही मिलता और बहुत संभव था कि तब बाल्टिस्तान, गिलगित सहित कई महत्वपूर्ण शहरों पर हमारा ही पूर्ववत कब्जा रहता।

प्रो. सिंह पं. नेहरू सहित पूरी संविधान सभा को ही कश्मीर के लिए धारा 370 का प्राविधान स्थापित करने के लिए दोषी मानते हैं। उनकी नजर में सही समय पर सही विरोध करने वाले डा. भीमराव अंबेडकर जैसे एक दो लोग ही थे। शेष ने इस राष्ट्रघाती प्राविधान को अस्थायी धारा के रूप् में संविधान में डालने की अपनी सहमति और स्वीकृति प्रदान की। प्रो. सिंह इस बात पर गहरा अफ सोस व्यक्त करते हैं कि आज यह अस्थायी धारा ही देश के लिए ‘सबसे पक्की और स्थायी धारा’ बन गयी लगती है। लगता है कि आप चाहे सारा संविधान बदल लें पर इस धारा को नही बदल सकते।

प्रो. सिंह ने हमें बताया कि कश्मीर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंम्हाराव भी सक्रिय थे पर उनकी कोशिशें किन्हीं कारणों के चलते सफ ल नही हो सकीं। यद्यपि उन्होंने व्यक्तिगत रूप् से इस समस्या को सुलझाने के लिए गंभीर प्रयास किये। इसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के लिए वह कहते हैं कि उन्हें काम करने का अधिक समय नही मिला, अन्यथा वह जिस प्रकार कश्मीर में रूचि दिखा रहे थे, उसका अच्छा परिणाम आ सकता था।

बीजेपी के प्रति पूरी तरह आक्रामक नजर आ रहे प्रो. सिंह ने भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अब तक सभी प्रधानमंत्रियों में कश्मीर के प्रति सर्वाधिक गंभीर और संवेदनशील माना। उन्होंने कहा कि अटल जी ने कश्मीर के लिए जीवन भर संघर्ष किया अत: उनका चिंतन कश्मीर के विषय में बहुत ही सुलझा हुआ था। लेकिन वह संसद में आवश्यक बहुमत का जुगाड़ ना होने तथा अपने सहयोगी दलों द्वारा इस विषय में सहयोग ना देने के कारण इस पर शासन स्तर पर कोई ठोस निर्णय नही ले पाए।

प्रो. सिंह से जब हमने पूछा कि इस धारा को हटाने के लिए क्या संसद में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है? तो उन्होंने कहा कि नही इस जैसी अस्थायी धारा को हटाने के लिए संसद में किसी भी सरकार के पास साधारण बहुमत प्राप्त करना ही पर्याप्त है। लेकिन यह भ्रांति फैला दी गयी है कि इस धारा को हटाने के लिए संसद में किसी भी पार्टी के पास दो तिहाई बहुमत होना आवश्यक है। ज्ञात रहे कि प्रो. सिंह भारत के सर्वोच्च न्यायालय के नामचीन अधिवक्ता और विधि विशेषज्ञ भी हैं। इसलिए उनकी यह राय मायने रखती है कि कश्मीर से धारा 370 हटाने के लिए किसी विशेष बहुमत की आवश्यकता नही है।

प्रो सिंह अतीत की यादों में खोते हुए कहते हैं कि 1952 में कश्मीर का सुल्तान बनाने की तैयारी शेख अब्दुल्ला की थी। जिसका विरोध डा. अंबेडकर ने ही किया था। मौलाना आजाद भी इस रियासत को अलग  रखने के हक में नही थे। तब शेख अब्दुल्ला ने कहा था कि कश्मीरी अपना फैसला अपने आप करेंगे और यहां से उसका राष्ट्रविरोधी चेहरा मुखर होता गया। फ लस्वरूप् उसे नेहरू के द्वारा ही जेल की हवा खिलानी पड़ी। वह कहते हैं कि 9 अगस्त 1953 को कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के बेटे करन सिंह को महाराजा के प्रतिनिधि से प्रोन्नत कर पं. नेहरू के आदेश से कश्मीर का ‘सदर-ए-रियासत’ बना दिया गया था और आधी रात को शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया था। इस निर्णय से नेहरू की मानसिकता साफ  झलकती है कि उन्होंने अपनी गलती का अहसास कर लिया था, और राष्ट्रविरोधी को जेल की सलाखों के पीछे भेजना ही उचित समझा था। शेख पर 8 साल केस चला।

प्रो सिंह कहते हैं कि शेख को शेरे कश्मीर बनाया इंदिरा गांधी ने। जिन्होंने 1975 में उसके साथ एक समझौता किया और कश्मीर का शासन उसे सौप दिया। मरने पर शेख को हिंदुस्तानी झंडे के साथ दफ नाया गया।

प्रो. सिंह कहते हैं कि कश्मीर में जो संविधान इस समय लागू है वह नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान नही करता। इसलिए कश्मीर में किसी प्रकार के मानवाधिकारों की अपेक्षा करना बेमानी है। प्रो सिंह कहते हैं कि उन्होंने विधायक रहते हुए कश्मीरी संविधान में मौलिक अधिकारों को रखवाने का प्रयास किया था परंतु वह प्रयास सिरे नही चढऩे दिया गया। प्रो सिंह इस बात पर गहरा अफ सोस व्यक्त करते हैं कि राष्ट्र के लिए काम करने वाले लोगों को इस देश में गुनाहगार समझा जाता है।

प्रो. सिंह ने आश्चर्य पूर्ण दुख व्यक्त करते हुए कहा कि आजादी के 60 वर्ष से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी देश में संविधान की धारा 370 अपने मूल स्वरूप में यथावत चल रही है। उन्होंने कहा कि केन्द्र की मोदी सरकार इस विषय में क्या निर्णय लेगी। यह कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगीे। इसलिए इस सरकार को अभी समय दिया जाना आवश्यक है। जब हमने  पूछा कि यदि आपकी सरकार कभी बनती है तो आप क्यों करेंगे? तो इस पर बड़ी बेबाक टिप्पणी करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि हमारी सरकार हमारे विरोधी कभी नही बनने देंगे, मैं यह भली प्रकार समझता हूं, मैं मोदी द्वारा खाली की जा रही बड़ोदरा सीट से चुनाव लडूंगा वहां भी आप देख सकते हैं कि राष्ट्रवाद की बात करते लोग या दल ही किस प्रकार मेरे विरोध में आ धमकेंगे। वह नही चाहते कि मेरे जैसा व्यक्ति देश की संसद में भी जाकर बैठे।

प्रो. सिंह कहते हैं कि कश्मीर का मौलिक भौगोलिक स्वरूप स्थापित कर इसका पुनर्गठन किया जाए और इस प्रदेश को आतंकवाद से मुक्त किया जाए। वह कहते हैं कि कश्मीर का भविष्य उन्हें अभी उज्ज्वल नही दीखता अभी लगता है कि सबेरा दूर है। पर फिर भी हमें आशावादी तो होना ही चाहिए कि बलिदानी पूर्वजों के बलिदान एक दिन कामयाब होंगे और कश्मीर का केसर पूरे देश को महकाएगा।

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