Categories
स्वास्थ्य

स्वास्थ्यरक्षणम और आतुरस्य विकारप्रशमनं का सिद्धांत

 

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय

मोटे तौर पर हर साल 58 लाख भारतीय दिल और फेफड़े के रोगों, स्ट्रोक, कैंसर और मधुमेह से मर जाते हैं। देश में छह करोड़ से अधिक मधुमेह रोगियों के कारण भारत को मधुमेह की वैश्विक राजधानी कहा जाने लगा है। लगभग 77 लाख लोग मधुमेह से पीडि़त होने की कगार पर हैं। आज तीन करोड़ से अधिक हृदय रोगी हैं। देश में कुल मौतों में से 60 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। अस्पताल में कुल भर्ती होने वाले मरीजों में 40 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों या नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज के होते हैं। यह संख्या बढ़ती जा रही है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल द्वारा किये गये एक अध्ययन के मुताबिक़ भारतीय अर्थव्यवस्था को वर्ष 2030 के पूर्व गैर-संचारी रोगों के कारण 4.58 लाख करोड़ डॉलर की हानि हो सकती है। स्पष्ट है कि बीमारियों का उपचार जरूरी है, पर उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि रोगों से बचाव हो।


अपने उद्भवकाल से लेकर अंग्रेजी शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों तक भारत में आयुर्वेद का अपने मूल उद्देश्य से भटकाव नहीं हुआ। चरक संहिता जो आयुर्वेद का एकमूलभूत ग्रन्थ है, स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् और आतुरस्य विकारप्रशमनम् के सिद्धांत का मूल प्रतिपादक है। पाँच हजार सालकी लम्बी यात्रा के दौरान आयुर्वेद को अनेक दिग्गज आचार्य मिले, पर स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् की प्राथमिकता कभी नहीं बदली। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांगहृदय, भावप्रकाश, सारंगधर संहिता, चक्रदत्त आदि ग्रन्थों में रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और जरा-व्याधि नाशक आयुर्वेदिक रसायन चिकित्सा को सदैव प्राथमिकता दी गई। रोगी की चिकित्सा या विकारों के शमन पर भी आयुर्वेद का ध्यान था पर यहाँ बात सिर्फ प्राथमिकता की है। यही रहस्य था जिसके कारण प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय समाज कैंसर, डायबिटीज, हृदयरोग, मानसिक विकार आदि जैसे गैर-संचारी रोगों से प्राय: मुक्त रहा। परन्तु आज स्थिति भिन्न है।
यह सर्वविदित है कि अंग्रेजी शासनकाल के दौरान आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति, आयुर्वेद शिक्षा, तथा संबंद्ध आयुर्वेदिक संस्थाओं, और यहाँ तक कि आयुर्वेदाचार्यों को भी एक सोची-समझी रणनीतिक चाल के अंतर्गत दुर्बल और निष्प्रभावी किया गया। अंग्रेज जा चुके, देश आजाद हो चुका, और आजादी के बाद देश ने भारी प्रगति किया, पर आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा और पंचकर्म अपने मूल स्वरुप या लोकप्रियता पर आज तक न लौट सके। आयुर्वेदाचार्यों की वर्तमान पीढ़ी रसायन चिकित्सा को लगभग भूलती जा रही है। आयुर्वेदाचार्यों के हाथ से बाहर जाकर पंचकर्म अब बाजार का अंग बन चुका है, जहाँ पंचकर्म के नाम पर प्राय: भांति-भांति के तेल चुपड़कर मात्र अंगमर्दन हो रहा है।
बाजार का अर्थशास्त्र अपने आप में बुरा या अनैतिक नहीं है। चिंताजनक यह है कि अधिसंख्य भारतीय समाज यह भूल चुका है कि पंचकर्म अधकचरा अभ्यंग या मालिश मात्र नहीं, अपितु एक जटिल और विशुद्ध आयुर्वेदिक प्रक्रिया है जिसे प्रशिक्षित और दक्ष आयुर्वेदाचार्य की देखरेख में सावधानीपूर्वक अनेक चरणों में संपन्न किया जा सकता है। अनदेखी का परिणाम सामने है। तथाकथित पंचकर्म केन्द्रों की बाढ़ के बावजूद आज भारत गैर-संचारी रोगों जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर आदि गंभीर बीमारियों की वैश्विक राजधानी बनने की ओर तीव्रता से अग्रसर है।
रसायन चिकित्सा के प्रति बेपरवाही के मूल में मुख्यतया बहुसंख्य आयुर्वेदाचार्यों की वह उत्कट लालसा है जो आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को एलोपैथिक चिकित्सा की तर्ज पर ले जाने के किये लालायित है। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित एवं आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित रसायन चिकित्सा को लगभग दरकिनार करते हुये आयुर्वेदाचार्यों की वर्तमान पीढ़ी का एक हिस्सा एलोपेथी की गोलियाँ बांटने के अधिकार का जितना जश्न मनाता है, आयुर्वेद का उतना ही बंटाढार हो रहा है। एलोपैथी की नकल कर कर्तव्यों की इतिश्री करना न तो वैद्यों के कॅरियर के लिये अच्छा है और न देश के नागरिकों के लिये।
एलोपेथी के इतिहास या वर्तमान में, कुछेक बीमारियों के टीकाकरण को छोड़कर, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा नहीं, अपितु रोगों की चिकित्सा ही मूल उद्देश्य रहा है। एलोपेथी का इतिहास वस्तुत: रोगों की चिकित्सा का ही इतिहास है। एलोपैथी की जगह अपनी विधा पर समय और श्रम का निवेश करने से आयुर्वेदाचार्य ऐसा कुछ भी नहीं खो देंगे जो उन्हें चिन्तित करे। एलोपैथी को उस विधा में पारंगत चिकित्सकों पर छोड़ देना चाहिये, क्योंकि आयुर्वेदाचार्यों से बेहतर आयुर्वेद चिकित्सा करने के लिये और कोई प्रशिक्षित या अनुभवी नहीं होता। आज केवल मुीभर ऐसे वैद्य बचे हैं जिन्होंने विशुद्ध आयुर्वेद को, आधुनिक विज्ञान और अपने अनुभवजन्य ज्ञान के प्रकाश में जीवित, पल्लवित और पुष्पित कर रखा है। प्राय: यह मान लिया जाता है कि कोई एक चिकित्सा पद्धति में प्रशिक्षित डॉक्टर किसी दूसरी पद्धति में भी पारंगत हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह एक काबिलेतारीफ पर व्यक्तिगत उपलब्धि है। किन्तु प्राय: कम ही लोगों में ऐसी प्रतिभा के दर्शन होते हैं; जैसे प्रोफेसर एम. एस. वालियाथन, जिन्होंने एलोपैथी में प्रशिक्षण के बाद आयुर्वेद का गंभीर ज्ञान प्राप्त कर चरक संहिता का विश्लेषण कर पुस्तक लिखी।
एलोपेथी ने शल्यचिकित्सा एवं आपातकालीन चिकित्सा की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति अर्जित की है। तथापि यह दिशा आयुर्वेद के उस सिद्धान्त से नितान्त भिन्न है जिसमें स्वस्थ व्यक्ति को बीमारी से बचाये रखना वैद्य का प्रथम दायित्व माना गया है। एलोपेथी में रोगरोधक के नाम पर कुछ टीके अवश्य विकसित हुये हैं लेकिन गैर-संचारी रोगों की समस्या को कोई टीका नहीं हल कर पाया है।
इन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आयुर्वेद भारत को गंभीर बीमारियों की वैश्विक राजधानी होने से रोक सकता है? दूसरे शब्दों में कहें तो, क्या भारत की जनसंख्या का वह भाग जो आज किसी गंभीर गैर-संचारी बीमारी से पीडि़त नहीं है, उसे इन बीमारियों से बचाया जा सकता है? और हमारे आयुर्वेदाचार्यों को ऐसा क्या करना चाहिये कि वे प्रभावी हो सकें? इन प्रश्नों का उत्तर आसान नहीं है परंतु अब इन मुद्दों को समेटकर एक तरफ फेंकना देश के लिये बहुत जोखि़म भरा काम होगा।

आत्मविश्वास से बढ़ेगा आयुर्वेद
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में परंपरा से प्राप्त लम्बा प्रशिक्षण, आयुर्वेद में निरंतर हो रही वैज्ञानिक शोध एवं उस ज्ञान को कार्य से जोडऩे के दौरान प्राप्त अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि आयुर्वेदाचार्य ठान लें तो, आयुर्वेद की जरा-व्याधि नाशक रसायन चिकित्सा और पंचकर्म के द्वारा, भारत को गंभीर रोगों की वैश्विक राजधानी बनने से रोक सकते हैं।
पहली बात यह है कि हमारे आयुर्वेदाचार्यों को अपनी चिकित्सा पद्धति पर पूर्ण और प्रमाण-आधारित भरोसा करना होगा। आयुर्वेदाचार्यों को प्रशिक्षणकाल से ही न केवल आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित बारीकियों में महारत हासिल करनी होगी, अपितु उन्हें आयुर्वेद की औषधियों के सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिक शोध में हो रही उत्तरोत्तर वैश्विक प्रगति को भी समझना और उपयोग करना होगा।
दूसरी, एलोपेथी की विचारहीन नकल को छोड़कर, स्वस्थ व्यक्तियों को बीमारी से बचाने के लिये रसायन और पंचकर्म का मजबूत उपयोग कराने के लिये पहल करनी होगी। साथ ही, बीमार लोगों की चिकित्सा के दौरान उन्हें व्यक्ति के रूप में स्वस्थ करने, न कि केवल रोग दूर करने, के लिये नवाचार करते रहना होगा। एक प्रश्न प्राय: यह भी उठाया जाता हैं कि आयुष की विधाओं को अलग अलग क्यों पढ़ाया जाता है। एक समेकित अर्थात इंटिग्रेटेड कोर्स क्यों नहीं विकसित किया जाता जो मरीज का हितसाधन करे। वस्तुत: समेकित कोर्स केवल कुछ रोगों या उप-विधाओं, जैसे शरीरविज्ञान और कुछ सीमा तक नैदानिकी के लिए तो संभव है, परन्तु आयुर्वेद, सिद्ध, होमियोपैथी, यूनानी, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अपने आप में भारी विषय हैं। एक एक विधा में पारंगत होने में कम से कम 10 वर्ष लग जाते हैं। एकीकरण में यह एक बड़ी चुनौती है। हाँ, रोगों की चिकित्सा के समय प्रमाण-आधारित सर्वोत्तम औषधि के लिये अन्य विधा में पारंगत चिकित्सकों से सलाह लेना रोगी के लिये हितकारी हो सकता है।
तीसरी, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा के सिद्धांत को आयुर्वेदाचार्यों को बहुत यत्नपूर्वक न केवल अपने जीवन में ढालना होगा बल्कि जिस परिवार व समाज में उनका प्रभाव है, वहां इसे लोकप्रिय बनाना होगा।
चौथी, आयुर्वेदाचार्यों को एक बात निरंतर व्यवहार में लाना होगा कि चाहे वे जिस रोगी की चिकित्सा कर रहे हों, रोग निवारण के लिये दी जाने वाली प्रमाण-आधारित मूल औषधि के साथ-साथ रोगी की दशा के अनुरूप उपयुक्त खान-पान, रसायन औषधियां और पंचकर्म देने की संभावना पर विचार करना होगा।
पांचवीं बात यह है कि आयुर्वेदाचार्यों को यह स्पष्ट समझना होगा कि किसी भी चिकित्सा पद्धति में यदि औषधियों की गुणवत्ता ठीक न हो तो चिकित्सक की सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। अत: औषधीय पौधों की पहचान तथा औषधियों को तैयार करने की शास्त्रोक्त एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया पर अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी ताकि औषधियों की सुरक्षा एवं प्रभाव का लाभ समाज को मिल सके। आयुर्वेदाचार्यों को या तो स्वयं की फार्मेसी विकसित करना चाहिये या बढिय़ा रसायन-शालाओं से ही औषधि प्राप्त करने के लिये समाज को प्रेरित करना चाहिये।
भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में गैर-संचारी रोगों का प्रसार दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तुलना में सबसे अधिक है। आयुर्वेदाचार्यों की वर्तमान पीढ़ी के सम्मुख अपनी रसायन थेरेपी और पंचकर्म की मदद से देश को इन बीमारियों के कलंक से मुक्त करने का एक बड़ा अवसर है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
maxwin
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
meritking giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
superbahis giriş
süperbahis giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betwild giriş
betwild giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş