प्रमाण बताते हैं कि वीरवर हनुमान बंदर नही मनुष्य थे

राज सक्सेना
आम मान्यता है और जगह.जगह मन्दिरों में स्थापित हनुमान जी की मूर्तियों को देख कर 99.99 प्रतिशत हिन्दू और शत प्रतिशत विधर्मी विश्वास करते हैं कि भगवान के रूप में प्रतिस्थापित हनुमान बानर बन्दर थे या हैं वस्तुत: यह एक भ्रान्त धारणा है इस भ्रान्त धारणा के स्थापन में तुलसी रामायण चरित.मानस के अर्थों का अनर्थ निकालने और जनमानस के समक्ष उसी रूप में प्रस्तुत कर कुछ अल्प बुद्धि और अल्प ज्ञानी पोंगापंडितों का हाथ रहा है। जनसाधारण की तत्कालीन भाषा अवधी में रचित इस महाकाव्य में महर्षि बाल्मीकि विरचितष्रामा. यणके आधार पर तत्कालीन आवश्यकता के अनुरूपए मुस्लिम अत्याचारों के अधीन नैराश्य ग्रसित भारतीय जनता को अवलम्बन प्रदान करने की पुनीत भावना को लेकर महाकवि तुलसी दास ने बाल्मीकि रामायण के इतिहास पुरूष श्रीराम को विष्णु के अवतार मर्यादा पुरूषोत्तम राम के अतीन्द्रीय देव भगवान राम के रूप में प्रस्तुत किया है। यही नहीं तुलसी ने राम चरित मानस के कुछ मुख्य पात्रों को भी देवस्वरूप या फि र सर्वशक्तिमान भगवान स्वरूप प्रस्तुत किया है। इनमें सबसे अधिक प्रमुखता वीरवर हनुमान के पात्र को प्रदान करते हुए सूर्य की कृपा से पवनपुत्र बताया गया है। सम्भवत: यह उनकी तीव्रतम चाल गति के लिये अलंकारिक विशेषण हो किन्तु कुछ पोंगा पंडितों ने अर्थ का अनर्थ कर उन्हें हवा हवाई बना कर रख दिया आज एकाध भक्त को छोड़ कर लगभग सभी अन्धभक्त उन्हें बन्दर ही मानते हैं और उनके वंशज मानकर बन्दरों के प्रति श्रद्धा भाव रखते है एक अनर्थ का कितना बड़ा दुश्परिणाम जबकि लंका में सीता को खोज लेने के पश्चात जब हनुमान उन्हें अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं तो सीता पर पुरूष स्पर्श के महापाप की भागी होने के स्थान पर उस नर्क में ही रहना ज्यादा उचित समझती हैं। इससे अधिक प्रमाण की क्या आवश्यकता है। रामायण में राक्षसों के बाद बानर जाति का सबसे अधिक उल्लेख हुआ है तो वह भी दक्षिण भारत की एक अनार्य जाति ही है, किन्तु इस जाति ने आर्यों राम के विरोध के स्थान पर राक्षसों से आर्यों के युद्ध में राम का साथ दिया सिर्फ यही नहीं उन्होंने तो पूर्व से ही आर्य संस्कृति के तमाम आचरण स्वीकार कर रखे थे बाली से रावण का युद्ध और बाली तथा सुग्रीव के क्रिया कलाप तथा तत्कालीन बानर राज्य की बाल्मीकि द्वारा प्रदर्शित परिस्थितियों से यह दर्पण के समान स्पष्ट हो जाता है वास्तविकता यह है कि विध्यांचल पर्वत के दक्षिण में घने वनों में निवास करने वाली जनजाति थी बानर। वे बनचर थे इस लिये वानर कहे गये या फि र उनकी मुखाकृति वानरों से मिलती जुलती थी अथवा अपने चंचल स्वभाव के कारण इन्हें वानर कहा गया या फि र इनके पीछे लगी पूंछ के कारण इस पर आगे चर्चा करेंगे ये बानर कहलाए यह इतिहास के गर्भ में है केवल नामकरण के ही आधार पर बन्दर मान लेना उचित नहीं होगा इस सम्बन्ध में केवल एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा दक्षिण में एक जाति नाग नाम की पाई जाती है। क्या वे लोग नाग सर्प हैं नागों का लंका के कुछ भागों पर ही नहीं प्राचीन मलाबार प्रदेश पर भी काफ ी दिनों तक अधिकार रहने के प्रमाण मिलते हैं। रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र को उसका अधिष्ठान बताया गया है। मैनाक और महेन्द्र पर्वतों की गुफ ाओं मे भी ये निवास करते थे समुद्र लांघने की हनुमान की घटना को नागों ने प्रत्यक्ष बाण्रामा देखा था नागों की स्त्रियां अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध थीं बाण्रा। नागों की कई कन्याओं का अपहरण रावण ने किया था बाण्रा रावण ने नागों की राजधानी भोगवती नगरी पर आक्रमण करके वासु की तक्षक शंख और जटी नामक प्रमुख नागराजों को धूल चटाई थी कालान्तर में नाग जाति के इक्का दुक्का को छोड़कर प्रथम शताब्दी में प्रभुत्व में आई चेर जाति में समाहित होने के प्रमाण हैं सप्तम ओरिएंटल कांफ्रेन्स विवरणिका साउथ इन्डिया इन द रामायन वीआरण्रामचन्द्र। स्वंय तुलसीदास ने लंका की शोभा का वर्णन करते हुए लिखा है। वन बाग उपवन वाटिका सर कूप वापी सोहहिं।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहिं। इसी प्रकार बाल्मीकि रामायण में रावण को जगह.जगह दशानन दश. कन्धर दशमुख और दशग्रीव आदि पर्यायों से सम्बोधित किया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ दस मुख या दस सिर मानकर रावण को दस सिरों वाला अजूबा मानलिया गया। जबकि बाल्मीकि द्वारा प्रयुक्त इन विशेषणों का तात्पर्य.द्शसु दिक्षु आननंमुखाज्ञा।
यस्य स: दशानन: अर्थात रावण का आदेश दसों दिशाओं में व्याप्त था। इसी लिये वह दशानन या दशमुख कहलाता था, यही नहीं कवि ने पक्षीराज जटायु के मुख से ही कहलाया है कि वह दशरथ का मित्र है। रामायण में घटे प्रसंगो और घटनाओं से ही स्पष्ट हो जाता है कि जटायु गिद्ध नहीं मनुष्य था। कवि ने आर्यों के आदरसूचक शब्द आर्य का कई बार जटायू के लिये प्रयोग किया है रामायण में जगह.जगह जटायू के लिये पक्षी शब्द का प्रयोग भी किया गया है। इसका समाधान ताड्यब्राह्म्ण से हो जाता है जिसमें उल्लिखित है कि. ये वै विद्वांसस्ते पक्षिणो ये विद्वांसस्ते पक्षा ताण्ब्रा अर्थात जो विद्वान हैं वे पक्षी और जो अविद्वान हैं वे मूर्ख हैं वे पक्ष. रहित हैं जटायु वान प्रस्थियों के समान जीवन व्यतीत कर रहे थे ज्ञान तथा कर्म उनके दो पक्ष थे जिनसे उड़कर माध्यम से वे परमात्मा प्राप्ति का प्रयास कर रहे थे अत: उनके लिये पक्षी का सम्बोधन सर्वथा उचित है।
वानरों का अपना आर्यों से मिलता जुलता राजनैतिक संगठन था इसका
वर्णन बाल्मीकि ने अनेक प्रसंगों में किया है। उल्लेख कपि राज्य के रूप में किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी एक सुसंगठित शासन व्यवस्था थी एक प्रसंग में तो बाली के पुत्र अंगद ने सुग्रीव से प्रथक वानर राज्य गठन का विचार तक कर लिया था। सीता की खोज में दक्षिण गए वानरों के समूह से समुद्र की अलांघ्यता महसूस कर अंगद कहते है. कस्य प्रसाद्दारां पुत्रांश्चैव गृहाणि च इतो निवृत्ता पश्येम सिद्धार्था: सुखिनो वयम्। अर्थात. किसके प्रसाद से अब हम लोगों का प्रयोजन सिद्ध होगा और हम सुख पूर्वक लौटकर अपनी स्त्रियों व पुत्रों अट्टालिकाओं व गृहों को फि र देख पाएंगे। विभिन्न स्थानों पर बाल्मीकि ने वानर नर नारियों की मद्यप्रियता का भी उल्लेख किया है। वानरों के सुन्दर वस्त्राभूषणों का भी हृदयग्राही वर्णन स्थान.स्थान पर आता है, सुग्रीव के राजप्रसाद की रमणियांश्भूषणोत्तम भूषिता: वानर पुष्प गंध प्रसाधन और अंगराग के प्रति आग्रही थे। किष्किंधा का वायुमण्डल चंदन अगरु और कमलों की मधुर गंध से सुशोभित रहता था चन्दनागुरु. पद्मानां गन्धै: सुरभिगन्धिता। सुग्रीव का राज्याभिषेक जो बाल्मीकि जी ने समकालीन एंव इतिहासवेत्ता. होने के कारण वर्णित किया है शास्त्रीय विधिसम्मत परम्परागत प्रणाली के अधीन ही सम्पन्न हुआ था इस तथ्य का द्योतक है कि वानर आर्य परम्पराओं और रिति .रिवाजों का पालन करते थे अर्थात आर्य परम्पराओं के हामी थे। बाली का आर्यरीति से अन्तिम संस्कार और सुग्रीव का आर्य मंत्रों और रीति से राज्याभिषेक भी सिद्ध . करता है कि चाहे वानर आर्य जाति के नही थे उनके अनुपालनकर्ता मानव ही बन्दर नहीं। यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक होगा कि बाल्मीकि रामायण जो तत्कालीन इतिहास ग्रंथ के रूप में लिखा गया था उसके अनुसार वानरों की जाति पर्याप्त सुसंस्कृत और सुशिक्षित जनजाति थी सुग्रीव के सचिव वीरवर हनुमान बाल्मीकि रामायण के सर्वप्रमुख.उल्लिखित वानर हैं। जिन्होंने अपनी विद्वतता से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को सबसे अधिक प्रभावित किया और उनके प्रियों में सर्वोच्च स्थान भी प्राप्त करने में सफल रहे वह वाक्यज्ञ और वाक्कुशल तो थे ही व्याकरण और अलंकारों के सिद्धहस्ता भी थे।उनसे बात करके श्रीराम ने यह अनुमान लगा लिया कि. जिसे ऋग्वेद की शिक्षा न मिली हो जिसने यजुर्वेद का अभ्यास न किया हो तथा जो साम वेद का विद्वान न हो वह इस प्रकार की. सुन्दर भाषा का प्रयोग; नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण: द्य नासामवेद्विदुष: शक्य. मेवं विभाषितुम् नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशव्दितम् नहीं कर सकता हनुमान उन आदर्श सचिवों में सर्वश्रेष्ठ थे जो मात्र वाणी प्रयोग से ही अपना प्रयोजन प्राप्त कर सकते थे। सार संक्षेप में हनुमान एक पूर्णमानव बल शूरता शास्त्रज्ञान पारंगत उदारता पराक्रम दक्षता तेज क्षमा धैर्य स्थिरता विनय आदि उत्तमोत्तम गुण सम्पन्न एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभना पूर्ण मानव थे अर्ध मानव या बन्दर नहीं थे। और अब अन्त में उस तथ्य पर विचारे जिसके आधार पर वानरों और
विशेषकर वीरवर हनुमान की बन्दर स्वरूप की कल्पना हुई अर्थात उनकी पूंछ के यथार्थ पर विचार करें।
वानर शब्द की इस जाति के लिए बाल्मीकि रामायण में 1080 बार .आवृति हुई है तथा इसी के पर्याय स्वरूप वन गोचर वन कोविद वनचारी और वनौकस शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि वानर शब्द बन्दर का सूचक न होकर वनवासी का द्योतक है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार करनी चाहिये.वनसि अरण्येभव: चरो वा वानर:त्रवनौकस: आरयक: वानरों के लिये हरि शब्द 540 बार आया है। इसे भी वनवासी आदि समासों से स्पष्ट किया गया है प्लवंगशब्द जो दौड़ने की क्षमता का व्यंजक है 240 बार प्रयुक्त हुआ है। वानरों की कूदने दौड़ने की प्रवृत्ति को सूचित करने के लिये प्लवंग या प्लवंगम् शब्द का व्यवहार उपयुक्त भी है। हनुमान उस युग के एक अत्यन्त शीघ्रगामी दौड़ाक या धावक थे इसीलिये उनकी सेवाओं की कईबार आवश्यकता पड़ी थी कपि शब्द 420 बार आया है जो सामान्यत: बन्दर के अर्थ में प्रयुक्त होता है। क्योंकि रामायण में वानरों को पूंछ युक्त प्राणी बताया गया है। इसलिये वे कपय: थे वानरों को मनुष्य मानने में सबसे बड़ी बाधा यही पूंछ है, पर यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो यह पूंछ हाथ पैर के समान शरीर का अंग न होकर वानरों की एक विशिष्ट जातीय निशानी थी जो संभवत: बाहर से लगाई जाती थी। तभी तो हनुमान की पूंछ जलाए जाने पर भी उन्हें कोई शारिरिक कष्ट नहीं हुआ था। रावण ने पूंछ को कपियों का सर्वाधिक प्रिय भूषण बताया था.कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवति भूषण रामायणकालीन समाज. शांति कुमार नानूराम व्यास ने इस संबन्ध में यह अवगत कराना भी उचित होगा कि पूर्वोत्तर राज्यों में अभी भी ऐसी कई जातियां हैं जो अपने सर पर जंगली पशुओं के दो सीग धारण करके अपनी शक्ति और वीरता का परिचय हर उत्सव के समय देते हैं तो क्या उन्हें जंगली भैंसा या बैल मानलिया जाय। मध्य प्रदेश की मुण्डा जनजाति में भी यही परिपाटी है शायद शक्ति प्रदर्शन के साथ ही यह सर की सुरक्षा का एक सरल उपाय होता हो जिस प्रकार क्षत्रिय या सैनिक अपनी पीठ पर सुरक्षा के लिये गैंडे की खाल से बनी ढाल को पहनते रहे हैं हो सकता है वानर वीर भी अपने पृष्ट भाग क़ी सुरक्षा हेतु बानर की पूंछ के समान धातु या फिर लकड़ी अथवा किसी अन्य हल्की वस्तु से बनी दोहरी वानर
पूंछ को पीछे से जिधर आंखें या कोई इन्द्रिय सजग नहीं होती होतीं की ओर से हमला बचाने के लिये लगाया जाता हो।
क्योंकि बाली, सुग्रीव या अंगद की पूंछ का कहीं पर भी कोई जिक्र नही आता है यह भी अजीब बात है या नहीं इस विषय पर भी खोज और गहरा अध्ययन आवश्यक है ताकि कारणों का पता चल सके। यहां यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि बाल्मीकि रामायण में किसी भी जगह या प्रसंग में वानरों की स्त्रियों के पूंछ होने का उल्लेख या आभास तक नहीं है यह भी उल्लेखनीय है कि अन्वेषकों ने पूंछ लगाने वाले लोगों या जातियों
का भी पता लगा लिया है बंगाल के कवि मातृगुप्त हनुमान के अवतार माने जाते थे और वे अपने पीछे एक पूंछ लगाए रहते थे बंगाली रामायण दिनेश चन्द्र सेन भारत के एक राजपरिवार में राज्याभिषेक के समय पूंछ धारण कर राज्यारोहण का रिवाज था वही वीर विनायक ने अपने अण्डमान संस्मरण में लिखा है कि वहां पूंछ लगाने वाली एक जनजाति रहती है महाराष्ट्रीय कृत रामायण.समालोचना।
उपरोक्त तथ्यों से इस भ्रान्ति का स्पष्ट निराकरण हो जाता है कि वानर नामक जनजाति जिसके तत्कालीन प्रमुख सदस्य वीरवर हनुमान थे एक पूर्ण मानव जाति थी, बन्दर प्रजाति नहीं। हां उनकी अत्यधिक चपलता निरंकुश और रूखा स्वभाव चेहरे की संभवत: पीला रंग और मंगोलायड मुखाकृति जो थोडी बन्दरों से मिलती होती है बनावट के कारण ही तथा अनियमित यौन उच्छृंखलता वनों पहाड़ों में निवास नखों और दांतों का शस्त्र रुप में प्रयोग और क्रोध या हर्ष में किलकारियां मारने की आदत के कारण उन्हें एक अलग पहचान देने के लिये ही आर्यों ने उनके लिये कपि या शाखामृग विशेषण का प्रयोग किया गया हो और जो आदतों पर सटीक बैठ जाने के कारण आमतौर से प्रयोग होने लगा हो द्य जिसने इनके पूर्व जातिनाम का स्थान ले लिया हो द्य इस जनजाति के किसी अन्य जाति में विलय या संस्कृति नष्ट हो जाने के उपरान्त कपि शब्द ने पर्याय के स्थान पर प्रमुख उदबोधन का स्थान ले लिया हो। मन्मथ राय ने वानरों को भारत के मूल निवासी व्रात्य माना है। रिडिल आफ दि रामायण के.एस. रामास्वामी शास्त्री ने वानरों को आर्य जाति माना है द्य जो दक्षिण में बस जाने के कारण आर्य समाज से दूर होकर जंगलों में सिमट गई और फिर आर्य संस्कृति के पुन: निकट आने पर उसी में विलीन हो गई।
व्हीलर और गोरेशियो आदि अन्य विद्वान दक्षिण भारत की पहाड़ियों पर निवास करने वाली अनार्य जाति मानते हैं जो आर्यों के सन्निकट आकर उन्हीं की संस्कृति में समाहित हो गई यह जनजाति या जाति चाहे आर्य रही हो या अनार्य थी एक विकसित आर्य संस्क़ृति के निकट ललित कलाओं के साथ चिकित्सा युद्ध कला परिवर्तन कला और अभियन्त्रण अविश्वसनीय लम्बे लम्बे पुल बनाने की कला सहित गुप्तचरी और मायावी शक्तियों के प्रयोग में बहुत चतुर मानव जाति कोई पशुजाति नही थी। इसके तत्कालीन सिरमौर वीर. वर हनुमान एक श्रेष्ठ मानव थे बन्दर नहीं।

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