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राजनीति

सिर्फ तेलंगाना नहीं, पूरे भारत की चिंता

डा. वेदप्रकाश वैदिक
गाजियाबाद। कांग्रेस का किला सारे देश में दरक रहा है। उसे बचाने के नए-नए उपाय खोजे जा रहे हैं। खाद्य सुरक्षा, नकदी सहायता, आवास की सुविधा आदि कई पैंतरे मारे जा रहे हैं। उनमें से तेलंगाना भी है। तेलंगाना के वोट झोली में गिरेंगे, इसी लालसा से कांग्रेस ने यह कदम उठाया है।
तेलंगाना की घोषणा का असर तेलंगाना से ज्यादा देश के दूसरे हिस्सों में दिखाई पड़ रहा है। कहीं कर्फ्यू लगा है तो कहीं ‘बंद’ है। कहीं प्रदर्शन हो रहे हैं, तो कहीं हड़ताल की तैयारियां चल रही हैं। सांपों का पिटारा खुल गया है। दर्जन भर से ज्यादा तेलंगाना फुफकार रहे हैं। गोरखालैंड, बोडोलैंड और हरित प्रदेश के नाम तो सुनते ही आए थे, लेकिन अब ऐसे-ऐसे नाम उभर रहे हैं, जिन्हें देश में पहले बहुत कम सुना गया था। जैसे गुजरात में भीलिस्तान, कच्छ प्रदेश और सौराष्ट्र की मांग। मुंबई शहर को अलग राज्य बनाने की आवाज भी दे दी गई है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश तेरह साल पहले छोटे कर दिए गए थे लेकिन अब उनके भी चार-चार टुकड़े करने की मांग जोर पकड़े बिना नहीं रहेगी। जो छोटे राज्य पिछली बार बने थे, अब उनमें भी बंटवारे की मांग उठ खड़ी हो तो आश्चर्य नहीं होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि छोटे राज्यों की मांग गलत है। राज्य जितने छोटे होंगे, सरकार और जनता के बीच रहनेवाला फासला उतना ही कम होगा। सरकारों पर बोझ कम पड़ेगा। वे जनता के दुख-दर्द दूर करने में ज्यादा सफल होंगी। लोकतांत्रीकरण बढ़ेगा। आंतरिक उपनिवेशवाद घटेगा। किसी भी बड़े प्रांत में कुछ हिस्से ऐसे बन जाते हैं, जो दूसरे हिस्सों को अपना उपनिवेश समझ बैठते हैं। उनके नागरिकों को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक न्याय मिलने में मुश्किल होती है, जैसे कि बिहार में झारखंड, मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश में उत्तराखंड, आंध्र में तेलंगाना, महाराष्ट्र में विदर्भ और पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड आदि रहे हैं। अब भी भारत में कुछ राज्य इतने बड़े हैं कि उनके मुकाबले हमारे कई पड़ोसी राष्ट्र उनसे छोटे हैं। कई भारतीय प्रांत इतने बड़े हैं कि एक प्रांत में यूरोप के कई देश समा जाएं। यदि भारत के 29 या 30 प्रांतों को काट-छांटकर 60 या 70 बना दिया जाएं तो शुरुआत में कुछ अटपटा जरूर लगेगा, ज्यादा राजधानियां बनाने में खर्चा भी बढ़ेगा और छोटे-मोटे नेताओं की दुकानदारी भी चल पड़ेगी लेकिन इससे देश कमजोर नहीं होगा, केंद्र शिथिल नहीं होगा बल्कि मजबूत होगा। केंद्र के मुकाबले में खड़े होनेवाले राज्य छोटे-छोटे होंगे और चार-छह राज्य भी मिलकर अनुचित और अनावश्यक दबाव नहीं डाल पाएंगे। देश से अलगाव की भावना का भी शमन होगा। अलगाव की मांग करनेवाले क्षेत्रीय नेताओं को स्थानीय सुल्तानी मिली नहीं कि उनकी बोलती बंद हो जाएगी। अमेरिका की आबादी भारत की एक-चौथाई है लेकिन वहां राज्यों की संख्या 50 है यानी भारत से डेढ़-दो गुनी है। भारत में औसतन चार करोड़ लोगों पर एक राज्य है जबकि अमेरिका में सिर्फ 60 लाख लोगों पर एक राज्य है।
यदि भारत 60-70 छोटे-छोटे राज्यों का संघ बन जाए तो हाथी और हिरण का भेद खत्म हो जाए। उनमें इतना ही अंतर रह जाएगा जितना कि गाय और बैल में होता है। योजना आयोग के धन-वितरण में आजकल जैसी खींचातानी चलती है, वह बंद हो जाएगी और राज्यसभा में भी राज्यों की हैसियत लगभग बराबर हो जाएगी। किसी राज्य से सिर्फ एक और किसी से 30 सदस्य न आ जाएं। राज्यों के बीच 1 से 30 का अंतर होना आखिर किस बात का सूचक है? क्या इससे यह पता नहीं चलता कि हमारे राज्य-निर्माण के पीछे कोई दूरगामी सोच नहीं है? राज्यों का यह ढांचा बेतरतीब है और अपने आप खड़ा हो गया है।अब तेलंगाना की घोषणा भी इसी श्रेणी की है। कांग्रेस का किला सारे देश में दरक रहा है। उसे बचाने के नए-नए उपाय खोजे जा रहे हैं। खाद्य सुरक्षा, नकदी सहायता, आवास की सुविधा आदि कई पैंतरे मारे जा रहे हैं। उनमें से तेलंगाना भी है। भागते भूत की लंगोटी ही काफी है। तेलंगाना के वोट झोली में गिरेंगे, इसी लालसा से यह तात्कालिक कदम कांग्रेस ने उठाया है लेकिन क्या पता किसका दावा ज्यादा मजबूत होगा? लेनेवाले का या देनेवाले का? तेलंगाना लड़कर लेनेवाली तेलंगाना राष्ट्र समिति को लोग ज्यादा वोट देंगे या तेलंगाना देनेवाली कांग्रेस को? हो सकता है कि दोनों मिलकर सरकार बनाएं। जो भी हो, यह फैसला तात्कालिक है और स्थानीय है।
यह तात्कालिक इसलिए है कि पिछले साठ साल से कांग्रेस तेलंगाना का विरोध करती रही है। भाजपा और कई अन्य दल भी विरोध करते रहे हैं। इस आंदोलन को इतना कुचला गया कि यह लगभग निष्प्राण हो गया था लेकिन इसमें अचानक अभी ही प्राण-प्रतिष्ठा क्यों की गई? आंध्र और तेलंगाना, दोनों क्षेत्रों में कांग्रेस की दाल पतली हो गई थी। यदि तेलंगाना की घोषणा नहीं होती तो 2014 के चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो जाता। यह फैसला स्थानीय इसलिए है कि इसमें सिर्फ तेलंगाना का सोच है, पूरे देश का कोई विचार नहीं है। देश और काल की दृष्टि से यह निर्णय अत्यंत संकुचित है। किसी भी अखिल भारतीय दल के लिए यह लज्जा का विषय है। दुर्भाग्य है कि कांग्रेस-जैसी महान पार्टी के पास अखिल भारतीय सोचवाले न तो नेता हैं और न ही नीति है। यदि होते तो सिर्फ तेलंगाना की घोषणा की बजाय सारे देश के लिए एक राज्य-पुनर्गठन आयोग की स्थापना होती और राज्यसभा के भी पुनर्गठन का प्रस्ताव होता। भारत का लोकतंत्र जरा ज्यादा समतामूलक बनता। लेकिन इससे कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिलता। पुनर्गठन आयोग के परिणाम आने में चार-पांच साल लग जाते जबकि चुनाव तो अगले साल हैं और चुनाव के बाद पता नहीं कांग्रेस कहां होगी।
देश के सारे विरोधी दल भी कांग्रेस की कार्बन-कॉपी बनकर रह गए हैं। जो कल तक आंध्रप्रदेश का विभाजन कर अलग तेलंगाना राज्य बनाने का विरोध कर रहे थे, आज उसका समर्थन कर रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि वे सत्ता में आएंगे तो सारे राज्यों का पुनर्गठन करेंगे। वे भी विचार-शून्यता के प्रतीक बन गए हैं। कोई भी नेता यह बहस क्यों नहीं चला रहा है कि राज्य-निर्माण के लिए अब भाषा का आधार एक मात्र आधार नहीं रह गया है। नए आधारों की खोज कौन करेगा? दूरगामी फैसले कौन लेगा? यदि भारत से गरीबी और विषमता हमें दूर करनी है और अगले दशक में भारत को महाशक्ति बनाना है तो नए आधारों पर भारत को पुनर्गठित करना जरूरी है। अलग तेलंगाना राज्य बनाकर कांग्रेस ने अपने भविष्य की चिंता भली-भांति कर ली है लेकिन क्या भारत के भविष्य की चिंता करना उसका धर्म नहीं है?

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