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प्रमुख समाचार/संपादकीय

वेदाध्ययन का अधिकार सभी का जन्म सिद्घ शास्त्र सम्मत अधिकार है

हिंदू समाज के कुछ धर्माचार्य तथा मठ-परंपराओं में यह प्रचारित किया जाता रहा है कि स्त्रियों और शूद्रों को वेद का अध्ययन व पठन पाठन नही करना चाहिए। तर्क दिया जाता है कि शास्त्रों में इसका निषेध किया गया है। आदि शंकराचार्य द्वारा कहा गया बताते हैं कि स्त्रीशूद्रो नाधीयताम। ये निर्देश केवल शब्दों तक सीमित नही रहे हैं। वर्तमान शंकराचार्य भी प्राय: सभी प्रकार से इसका पालन करते हैं। जगन्नाथपुरी के जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ इस वाद विवाद में अग्रणी रहे। उनके उत्तराधिकारी स्वामी निश्चलानंद महाराज भी इस मान्यता पर दृढ़ बने हुए हैं और उन्होंने कलकत्ता में एक बार कहा कि स्त्रियों को वेद पाठ करने को इसलिए निषेध किया गया है कि वेदोच्चारण और वंद मंत्रों की ध्वनि से स्त्रियों की गर्भ अवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। गायत्री मंत्र का उच्चारण भी स्त्रियों के लिए मना है।
विद्या एवं सरस्वती
वेदों को सीखने व समझने तथा वेद पाठ करने के लिए विद्या के अभ्यास की आवश्यकता होती है और हिंदू धर्मशास्त्र कहते हें कि विद्या देवी सरस्वती है उनकी स्तुति गान से ही विद्या और शिक्षा प्राप्त हो सकती है। कितनी विचित्र है वह कहानी कि हमारे धर्माचार्य स्त्रियों को तो वेद पाठ से वंचित करते हैं परंतु स्त्री रूप धारिणी सरस्वती की आराधना करके विद्या प्राप्त करना चाहते हैं। अर्थात पुरूष को विद्या प्राप्त करने के लिए स्त्री (सरस्वती) की शरण में जाना होगा और विद्या में पारंगत होने के बाद यह पुरूष घोषणा करेगा कि स्त्री जाति को विद्याध्ययन निषिद्घ है। पुरूष कहता है कि हे स्त्री! (सरस्वती) हमें तो तुम विद्या प्रदान करो परंतु तुम्हें स्वयं विद्या नही पढ़नी। तब क्या अपढ़ स्त्रियों से पुरूष शिक्षा ग्रहण करना चाहता है? क्या विद्या से वंचित नारियां पुरूषों को शिक्षा दे पाएंगी?
आचार्य सायण ऋग्वेद भाष्य के उपोद्घात में लिखते हैं-स्त्री शूद्रस्यास्तु सत्यामपि ज्ञानपेक्षाया मुपनयना भ्रवेनाध्ययन साहित्याद वैदेअधिकार: प्रतिबद्घ: अर्थात स्त्री और शूद्र को ज्ञान की अपेक्षा होने पर भी उपनयन (यज्ञोपवीत) के अभाव में इनका वेदाध्ययन का अधिकार नही है।
चार धाम के शंकराचार्य पदों पर आज तक किसी महिला अथवा किसी ब्राह्मणेतर को पदासीन होने का अवसर प्रदान न ही किया गया। वद्रीनाथ मठ के जगदगुरू शंकराचार्य पद पर महर्षि महेश योगी को उनके गुरू ने केवल इसलिए उत्तराधिकारी नही बनाया क्योंकि वे ब्राह्मण नही थे। यद्यपि महर्षि महेश योगी ने जो ख्याति विश्वभर में प्राप्त की उतनी ख्याति सभी जगदगुरूओं की मिलाकर भी नही आंकी जा सकती।
क्या कहती है वेदवाणी?
1.ऋग्वेद (10,85,47)
समंजन्तु विश्वे देवा: समापो हृदयानि नौ।
सं मातरिश्वा संधाता समुदेष्ट्री दधातु नौ।।
अर्थात विवाह के अवसर पर वर-वधू अपने हृदय जल की भांति परस्पर मिले रहने की घोषणा करते हैं।
2. यजुर्वेद : यथेमां वाचं कल्याणीभावदानि जनेभ्य:।
ब्रह्मराजन्याभ्याथं शूद्राय चार्याय स्वाय वारवणाय च।।
अर्थात सभी स्त्री और पुरूष अर्थात मनुष्य मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है-ब्राह्मण से शूद्र पर्यन्त।
3. अथर्ववेद (11-5-18) में कहा गया है-ब्रह्माचर्येण कन्या युवान विन्दते पतिम।
अनड्वान ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति। कन्या ब्रह्माचर्याश्रम में पूर्ण विद्या पढ़ चुके तब अपनी युवावस्था में पूर्ण युवा पुरूष को अपना पति करे। उपरोक्त उल्लेख ऋषि दयानंद कृत ऋग्वेद भाष्य भूमिका में भी देखा जा सकता है।
सनातन धर्म के अन्य शास्त्रों में निर्देश
आहुरप्युत्तम स्त्रीणाम अधिकारं तु वैदिके।
यथोर्वशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथाअपरा।। व्यास संहिता
उत्तम स्त्रियों को वेदाध्ययन और वैदिक कर्मकाण्ड का अधिकार है जैसे कि उर्वशी यमी, शची इत्यादि प्राचीनकाल में ऋषिकाएं हुई हैं।
स्वामी आनंद तीर्थ के महाभारत तात्पर्य निर्णय ग्रंथ में लिखा है-वेदा अभयुत्तम स्त्रीमि: कृष्णाधन्तिद्यखिला (श्लोक-20)-उत्तम स्त्रियों को द्रोपदी (कृष्णा) के समान संपूर्ण वेदद पढ़ने चाहिए।
पाराशर ग्रहयसूत्र भाष्य में श्री गदाधराचार्य ने लिखा है-उभयो कन्या वरयोर्मन्त्र पाठ: भर्तयज्ञ। आचार्य भर्तुयज्ञ के अनुसार यह मंत्र वर व कन्या दोनों के उच्चारण करने का है। बाराह गृहय सूत्र 15/1 में विवाह के समय सप्तपदी के लिए कहा है-वर सखे सप्तपदी अर्थात वधू वर की सखा बने। नीति का उल्लेख है व्यसनेषु सख्यम अर्थात समान वाले ही सखा होते हैं।
गृह्मसूत्रों में वेदवाचन कराने का विधान है-
वेद पत्नयै प्रदाय वाचयेत पत्नी को वेद हाथ में देकर वाचन करायें धृतवन्तुं कुलसिन रायपोषं सहस्त्रिणं वेदोदधातु वाजिनमित वेदे पत्नी वाचयति (शंखायनकल्प 1/5)
रामायण काल की व्याख्या
वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड 15 20/15) का उद्घरण सा क्षोभवसना हृष्टा नित्यं व्रत परायण।
अग्निम जुहोति सम तदा मंत्र वत:यित्कृत: मंगला।।
जब रामचंद्र जी आए तो राजमाता कौशल्या रेशमी कपड़े पहने हुए नित्य के व्रत में लगी हुई मंगलाचार गाती हुई वेदमंत्रों से अग्निहोम कर रही थीं।
तदा सुमन्त्रं मंत्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह
-वेद मंत्रों को जानने वाली (मन्त्रज्ञा) कैकेयी ने सुमन्त्र को यह उत्तर दिया (वा.रा. सुंदर काण्ड-15/18)
क्रमश:

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