प्राचीन भारत में कैसी थी सैन्य परंपरा

images (40)

लेखक – राजबहादुर शर्मा,
लेखक से.नि. ब्रिगेडियर और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं।

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी सामाजिक संस्कृति है। वायुपुराण में भरत की कहानी आती है जो कि आधुनिक इतिहासकारों की समझ से परे है। पिछले हजारों वर्षों में स्थानीय और विदेशियों द्वारा बड़ी संख्या में रचे गए साहित्य, पुरातात्विक प्रमाणों और मजबूत मौखिक तथा संपुष्ट मौखिक परंपराओं से हमारी प्राचीनता और हमारी सभ्यता की श्रेष्ठता साबित होती है। हमारी सभ्यता में आध्यात्मिकता से लेकर दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला, विज्ञान, तकनीकी, उद्योग, प्रशासन और यहाँ तक कि युद्ध और शांति तक मानव जीवन के हरेक आयामों का विकास हुआ था। यह सब कुछ केवल तभी संभव है, जब लंबे समय तक देश में शांति रही हो जोकि अपने लोगों और अपनी भौगोलिक सीमाओं की सुरक्षा के बिना संभव नहीं है।

हमारी सभ्यता का प्रारंभ मानव सभ्यता के इतिहास से होता है। आधुनिक इतिहासकारों द्वारा स्वीकृत सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल ईसा के हजारों वर्ष पुराने हैं। इसके बाद उपनिषदों का काल आता है, फिर रामायण और महाभारत और उसके बाद पांड्यन, मौर्य, अशोक, सातवाहन और अंतत: मगध का गुप्त साम्राज्य जैसे महान राज्य हुए। इस दौरान देश में विभिन्न कालखंडों में विभिन्न स्थानों पर महान गणतंत्र राज्यों का भी उदय हुआ।

भारतीय सभ्यता की सीमाएं इतिहास के विभिन्न कालखंडों में विशालतम अवस्था तक पहुँची और कई बार उनमें काफी संकुचन भी आया। उत्तर और दक्षिण की सीमाओं के लिए सामान्यत: हिमालय और महासागर का सीमांकन किया जाता था, इसकी पश्चिमी सीमाएं कैस्पियन सागर तक विस्तीर्ण रही हैं। पूरब में वर्तमान बांग्लादेश और म्यामांर तक हमारी सीमाएं रही हैं। इस प्रकार हमारी सांस्कृतिक सीमाएं पहली शताब्दी के अंत तक इरावाडी नदी जिसे स्थानीय भाषा में ऐरावाड्डी (इंद्र के ऐरावत हाथी के नाम पर) कहा जाता था और ऑक्सस नदी जो आज अमू दरिया के नाम से जानी जाती है, के बीच तक फैली हुई थीं। उत्तर में सागरमाथा जो कि आज माउंट एवरेस्ट के नाम से प्रसिद्ध है से लेकर श्रीलंका तक भारत ही था।

राजनीति संबंधी भारतीय ग्रंथों में राज्य और राष्ट्र शब्दों की चर्चा बहुतायत में पाई जाती है। इन्हीं शब्दों का बाद में आधुनिक विद्वानों ने स्टेट और नेशन में अनुवाद कर दिया जोकि पश्चिमी मूल के शब्द हैं। राज्य के लिए स्टेट शब्द का प्रयोग तो ठीक है, परंतु राष्ट्र का अनुवाद नेशन करना ठीक नहीं है।
स्वाभाविक ही है कि 55 शताब्दियों से पुराने और एक महादेश के आकार के राज्य तथा राष्ट्र की नीतियों के बारे में यथातथ्य विवरण दे पाना संभव नहीं है। प्रमाणों से पता चलता है प्राचीन भारत में राज्य का काम विदेशी आक्रमणों से लोगों की रक्षा करने तक सीमित था। आंतरिक कानून व्यवस्था का पालन पारंपरिक नियमों के प्रति श्रद्धा पैदा करके करवाया जाता था। वैदिक राजा धर्मपति यानी धर्म अर्थात् कानून के पालक हुआ करते थे। हालांकि वैदिक काल से मौर्य काल के बीच में राज्य के अधिकार तथा कर्तव्यों में काफी वृद्धि हुई। साम्राज्य युग के प्रारंभ होते-होते राज्य के कर्तव्यों में सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक सभी आयाम शामिल हो गए। सामाजिक व्यवस्थाओं का संवर्धन और विद्वानों, कलाकारों, शिल्पकारों के संरक्षण द्वारा शिक्षा, कला, अध्ययन को प्रोत्साहन देना भी राज्य के काम माने गए। यहाँ तक कि धर्मशालाएं, सामुदायिक भवन और अस्पताल जैसी नागरिक सुविधाएं भी राज्य द्वारा संचालित की गईं, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के समय किसी प्रकार का दबाव समाज पर न रहे।

अन्य सभी सभ्यताओं की ही भांति यहाँ भी समाज के शारीरिक बल को संरक्षण, संवर्धन और उपयोग करना एक जीवंत राज्य अनिवार्य हिस्सा था। एक ओर विजेताओं ने न केवल अपनी वीरता प्रदर्शित करने तथा गौरव बढ़ाने के लिए, बल्कि राज्य का धन और संसाधन बढ़ाने के लिए युद्ध लड़े, दूसरी ओर विजितों ने अपने पूर्वजों के सम्मान की रक्षा और अपने देवताओं के मंदिरों की रक्षा के लिए अपनी आहूति देकर ख्याति अर्जित की।

अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के सैन्य अभियानों का वर्णन मिलता है जिन्हें सामान्यत: दिग्विजय या विश्वविजय कहा जाता था। ये हैं – धर्मविजय यानी धर्म के लिए अभियान, लोभविजय यानी धन के लिए अभियान और असुरविजय यानी राक्षसी उद्देश्यों के लिए अभियान। इनमें से सबसे श्रेष्ठ धर्मविजय, उससे कम लोभविजय तथ सबसे निकृष्ट असुरविजय को माना जाता था। धर्मविजय में विजित राजा को बाध्य किया जाता था कि वह विजेता को सम्मान और न्यायोचित कर प्रदान करे। लोभविजय में विजित राजा को भारी मात्रा में धन अथवा अपने राज्य का एक भूभाग या दोनों ही देना होता था। असुरविजय में पराजित राज्य का पूरी तरह नाश कर दिया जाता था। अन्य देशों जहाँ मात्स्य न्याय यानी बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, का सिद्धांत प्रचलित था, भारत में इसके विपरीत हमारे प्राचीन मनीषियों का कहना था कि कमजोर राज्य शांति को बनाए रखें और जो मजबूत राज्य हैं, वे युद्ध करें।

काल के प्रवाह में समाज में क्षत्रिय नामक योद्धा जाति का विकास हुआ जिसकी जीविका का साधन ही युद्ध और शासन करना था। क्षत्रियों को युद्ध के लिए सन्नध रहने के लिए विविध प्रकार की सहायताओं और सेवाओं की आवश्यकता पड़ती थी। जैसे कि युद्ध कौशल तथा भंडार, संचार और सूचना के साधन, पानी की आपूर्ति, सैनिकों तथा हाथी, घोड़े आदि पशुओं के लिए भोजन-सामग्री, शिविर तथा युद्ध के दौरान घायलों के लिए चिकित्सकीय सुविधाएं आदि। अभियान के दौरान उनके साथ लुहार, रथशिल्पी, मोची, धोबी, नाई, सफाईकर्मी आदि सभी चला करते थे। इसी तरह उनके साथ बड़े आपूर्तिकर्ताओं, सभी प्रकार के व्यापारियों, बैंककर्मियों, नाविकों, प्रशासकों और योद्धाओं की भी एक टोली होती थी। विविध इलाकों की सेनाएं जब साथ मिल कर युद्ध लड़ती थीं, तो उनके साथ बड़ी संख्या में दुभाषिए भी हुआ करते थे। कुल मिलाकर सैन्य अभियानों का विशाल आयाम हुआ करते थे। विस्तार से जानने के लिए हम महाभारत को पढ़ सकते हैं।

अधिकांश स्मृतियों में राजा को युद्ध से बचने की ही राय दी गई है। उनके अनुसार धर्म यानी कानून की स्थापना के अलावे की जाने वाली हिंसा राजा की कीर्ति को नष्ट करती है और उसे नरकगामी भी बनाती है। अशोक एक महान सम्राट हुआ जिसने गौरव के लिए किए जाने वाले युद्ध की परंपरा को तोड़ते हुए धर्मविजय को एक नई परिभाषा प्रदान की। इसके अंतर्गत धर्म का प्रसार करना ही धर्म के लिए युद्ध माना गया।

प्राचीन भारत में योद्धाओं ने सुपरिभाषित युद्धनियमों का विकास और पालन किया। हमारे पूर्वजों ने हमेशा से दूसरे देशों के पीडि़तों को शरण दी, परंतु स्वयं का खून-पसीना केवल भारतवर्ष के लिए बहाना ही उचित समझा। इसलिए उन्होंने कभी अपनी सीमाओं के बाहर जाकर युद्ध नहीं छेड़ा। यह भी एक अनिवार्य नियम था कि राज्य के युद्धों के बाद भी सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक गतिविधियाँ सहजता तथा निर्लिप्तता से चलती रहनी चाहिए। इस बात को भारत आए एक ग्रीक राजदूत ने भारतीय युद्धनीति की एक विशेषता के रूप में उद्धृत किया है। उसने लिखा है – जहाँ अन्यान्य देशों में यह सामान्य बात है कि युद्ध के दिनों में खेत बंजर बड़े रह जाते हैं, वहीं भारत में युद्ध के दौरान भी किसान बिना किसी खतरे के निर्बाध रूप से खेती करते रहते हैं। दोनों ही तरफ के योद्धा यह ध्यान रखते हैं कि वे किसी भी किसान को नुकसान नहीं होने दें, शत्रु के जमीन पर आगजनी न करें, पेड़ों को न काटें। प्रोफेसर एच.एच. विल्सन ने प्राचीन काल की युद्धनीतियों का काफी प्रशंसा की है। इसी प्रकार सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी लिखा है कि पर्याप्त युद्ध और शत्रुता के बाद भी देश का सामान्य जन इससे प्रभावित नहीं होता था।
✍🏻साभार – भारतीय धरोहर पत्रिका

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
betnano giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betebet giriş
restbet giriş
betpas giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betlike giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
betparibu
parmabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş