समाज का पतन निकट समझिए

burka_1631610cलोग कहते हैं कि ये विज्ञान का युग है। इसमें बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं। लेकिन ऐसा भी नही है, हमारा मानना है कि ये संक्रमण का युग है और इसमें पुरानी मान्यताएं बदल रही हैं और नई जन्म ले रही हैं।
बीता हुआ कल बीत गया, पर उसमें मेरे टोकने वाले, रोकने वाले होते थे और आज मैं जिस माहौल में जी रहा हूं उसमें रोकने, टोकने वाले ही हटाए जा रहे हैं। इसे ही संक्रमण काल कहा जा सकता है। माता-पिता, गुरू, बड़े भाई-बहन समाज के बड़े लोग, समाज और धर्म सबको उठाकर बीते हुए कल की अलमारी में कैद किया जा रहा है। इसलिए बुढ़ापा पार्कों में समय गुजार रहा है और गुरू, समाज या धर्म बोरिया बिस्तर बांधे सड़क पर विस्थापितों की भांति पड़े हैं।
यह सर्वमान्य सत्य है कि समाज का हर संबंध इस समय आतंकित है। सहमा हुआ है, डरा हुआ है। शंकित और आशंकित है। जितना यह सत्य है उतना ही ये भी सत्य माना जाना चाहिए कि जब पिता अपने पुत्र से और गुरू अपने शिष्य से डरकर रहने लगे, या उनकी उच्छ्रंखलता को केवल इसलिए मौन होकर सहले कि करने दे-अभी मेरे से तो कुछ नही कहा, अभी तो जो कुछ कर रहा है वह किसी अन्य के साथ ही किया है, तो समझ लो तब समाज का पतन बहुत ही निकट होता है।
पिता को पुत्र आज सबसे पहले बंधक बना रहा है, गुरू को वह श्रद्घा से नही अपितु अपने आतंक से ज्ञान देने के लिए बाध्य करता है। इसलिए समाज से रोकने टोकने की शक्ति छिन्न भिन्न कर दी गयी है, फलत: बदमाशों का भी महिमामण्डन करता समाज अपनी इज्ज्त बचाने के लिए केवल पूंछ हिलाने की बातें कर रहा है। शक्तिहीन समाज विवेकशून्य लोगों को बढ़ावा देकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता जा रहा है।
रोकने-टोकने की हमारी संस्कृति रही है। यज्ञ में यह अधिकार ब्रह्मा को होता है तो घर में यह अधिकार घर के मुखिया के पास होता है, जबकि समाज ये और राष्ट्र में यह सामूहिक रूप से कुछ प्रमुख लोगों के पास होता है। जिस परिवार में रोकने-टोकने की प्रवृत्ति को अपनाया जाता हैै और बच्चे उस रोकने-टोकने को सही दृष्टिकोण से स्वीकार करते हैं, उस घर में विकास की प्रक्रिया बलवती रहती है, पर जहां इस रोकने टोकने को बच्चे अपने लिए एक बंधन मानते हैं, उस घर का विकास विनाश में बदल जाता है। ऐसे बच्चे तो चुप न ही होते पर उनके रोकने टोकने वाले संरक्षक चुप हो जाते हैं। संरक्षकों की यह चुप्पी इस मिथक को गढ़ती है कि आज के बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं, जबकि वह बड़े नही होते अपितु वह अपने बड़ों को चुप कर देते हैं। बड़ों का चुप रहना समाज को कुंठित करता है, सारी दुनिया को फीका बनाता है, रसहीन बनाता है, संबंधों की सरसता को नीरस बनाता है। बस, यही तो दीख रहा है इस समाज में -‘अब चाहे जो करो, कोई टोकने वाले न रहे।
आइना टूट गया शक्लें दिखाने वाला।।’

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