भगवान के डाकियों को लीलते कीटनाशक

7-360x216आशीष वशिष्ठ
बढ़ते कीटनाशको के उपयोग ने पक्षियों के जीवन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. किसानों के मित्र समझे जाने वाले पक्षियों की प्रजातियों में दिन-प्रतिदिन भारी कमी होती जा रही है. हालात ये हैं कि कुछ समय से तो कुछेक प्रजातियों के पक्षी नजर ही नहीं आ रहे हैं. विशेष बात तो यह है कि इनके अचानक गायब होने का मुख्य कारण किसानों द्वारा परंपरागत तकनीक को छोडकऱ मशीनों द्वारा खेती करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर कीटनाशक दवाइयों का अंधाधुंध प्रयोग करना जिसके चलते पक्षियों पर इसका गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है. तीन दशक पूर्व मित्र पक्षियों की संख्या देश भर में काफी अधिक थी लेकिन अब मोर, तित्तर, बटेर, कौआ, सफेद बाज, काली चिडिय़ा तथा गुटर समेत अनेक प्रजातियों के पक्षी दिन-प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जलवायु आवसीय ह्रास मानवीय हस्तक्षेप और भोजन पानी में घुल रहे जहरीले पदार्थ पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं.
बदलती जलवायु, आवसीय ह्रास, कीटनाशकों के खेती में बढ़ते प्रयोग और मानवीय हस्तक्षेप के चलते पक्षियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है और ऐसा अनुमान है कि आने वाले 100 साल में पक्षियों की 1183 प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं. इस समय दुनिया में पक्षियों की करीब 9900 ज्ञात प्रजातियां हैं. विभिन्न कारणों से पक्षियों की प्रजातियों का विलुप्त होना जारी है और सन् 1500 से लेकर अब तक ‘भगवान के डाकिए’ कहे जाने वाले इन खूबसूरत जीवों की 128 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं. पक्षियों और उनके आवास के संरक्षण के लिए प्रयास करने वाले वैश्विक संगठन बर्डलाईफ इंटरनेशनल के मुताबिक एशिया महाद्वीप में पाई जाने वाली 2700 पक्षी प्रजातियों में से 323 पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है. चीन में 78, भारत में 73 और फिलिपींस में 69 प्रजातियों पर संकट है. बर्डलाइफ का यह भी कहना है कि पक्षियों की 41 प्रजातियां सबसे अधिक खतरे में हैं और उनमें से 11 तो शायद खत्म ही हो चुकी है. बर्डलाइफ इंटरनेशनल ने अपनी रेड डाटा बुक में पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों के लिए पूरी तरह से मानवीय क्रियाकलापों को जिम्मेदार माना है. विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ती जनसंख्या का दबाव और आर्थिक विकास पक्षियों की इस हालत के लिए जिम्मेदार है. इसके अलावा प्राकृतिक संसाधन भी काफी दबाव झेल रहे हैं.
हाल ही में कानपुर, बुलंदशहर, सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, बागपत व मेरठ से मोरों के असमय मरने की खबरें खबरनवीसों के माध्यम से खूब पढऩे को मिली हैं. पर्यावरणविद् भी इसके लिए समय-समय पर चिन्ता प्रकट करते ही रहते हैं. मोर क्यों मर रहे हैं, कौन इसके लिए कसूरवार है और इसकी जिम्मेवारी आखिर किसकी है? ये सब सवाल अनसुलझे से हमारे बीच खड़े हैं. प्रारम्भिक सर्वेक्षण रिर्पोट के माध्यम से यह सामने आया है कि मोर फसलों पर छिडक़े जाने वाले कीटनाशकों के कारण काल का ग्रास बन रहे हैं. विषय विशेषज्ञों व जानकारों की मानें तो पता चलता है कि मोर द्वारा फसलों के बीच व मिट्टी में पनपने वाले कीड़ों को खाया जाता है. इन कीटों को ठिकाने लगाने व अपनी फसल को बचाने के फेर में किसानों द्वारा तरह-तरह के जहरीले कीटनाशक फसलों व आम के बागों में प्रयोग किए जाते हैं. जिसके कारण कीट तो मर जाते हैं लेकिन मर कर भी अपने अन्दर समा चुके जहर से मोर को भी मार देते हैं क्योंकि ये मरे हुए कीट ही मोरों का भोजन बनते हैं और इनको खाकर मोर निढाल हो जाता है और अंत में मर जाता है. इसी प्रकार खेतों में पड़े जहरीले दानों को खाकर भी मोर मर रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आम के बागों के बहुतायत में होने के कारण मोर इन बागों में रहते हैं तथा वहीं से अपना दाना-पानी लेते हैं. लेकिन जिस रफ्तार से पिछले एक दशक से आम के बागों में कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ा है उससे मोर अब अपने ही घर में सुरक्षित नहीं रह गया है.
राष्ट्रीय पक्षी मोर जहां बीजों में मिले कीटनशकों की वजह से मारा जा रहा है, वहीं पर्यावरण को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला गिद्ध जैसा पक्षी पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा की वजह से मौत का शिकार हो रहा है. गिद्ध मरे हुए पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करता है, लेकिन उसका यह भोजन ही उसके लिए काल का संदेश ले आता है. पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा गिद्ध के लिए जानलेवा साबित होती है. भारत में जिन पक्षियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है उनमें विभिन्न तरह के गिद्धों के अतिरिक्त ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ गुलाबी सिर वाली बत्तख हिमालयन क्वेल साइबेरियन सारस बंगाल फ्लोरिकन उल्लू आदि प्रमुख हैं. पंजाब का राज्य पक्षी बाज भी संकट में है क्योंकि बढ़ते तापमान, कैमीकल युक्त प्रदूषण, घटते वन क्षेत्र तथा मोबाईल के टावरों इलैक्ट्रोमगनैटिक रेडिएशन के कारण प्रदेश में इनकी गिरावट अनुसार बाज सहित दूसरे पक्षियों पर कीटनाशकों पैस्टीसाईडस डीटीटी का बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. पंजाब में कीटनाशकों के अधिक प्रयोग के द्वारा बाज के अंडों पर बुरा असर हुआ है जिसके अन्तर्गत डीटीटी ने बाज के अंडों की मोटाई की परत पतली कर दी है. यही वजह है कि पक्षी अपने शरीर की गर्मी से इन अंडों को गर्माहट पहुंचा कर बच्चे पैदा करने में नाकाम हो रहे हैं. गत वर्ष हरियाणा के पलवल जिले के अहरवां गांव में कीटनाशकों के कारण 15 दिनों के भीतर ही लगभग सवा सौ से ज्यादा मोर मारे गये थे. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और इटावा जनपद में भी दर्जनों मोर व अन्य पक्षी कीटनाशकों के कारण मौत की खबरें आयी थीं. पिछले दिनों ग्वालियर वन मण्डल के वन परिक्षेत्र बेहट के अंतर्गत टिहौली गांव मेंं कीटनाशक युक्त गेहूं के दाने खाने से सात मोरों की मौत हो गई थी. राजस्थान में भी लगभग दस मोर मरने की खबर है।
जानकारों का मानना है कि कीटनाशकों का फसल पर प्रयोग होने से खेतों में चूहे तो मर जाते हैं और इनको खाने से ये पक्षी भी मर रहे हैं. इसी तरह से जहरयुक्त मरे जीवों को खाने से कौवें भी खत्म हो रहे हैं. उधर, ट्रैक्टर या हल से जुताई करते समय सैंकड़ों की तादाद में गुटर जाति के पक्षी कीटों को चुगने के लिए आते थे जो अब लुप्त होते जा रहे हैं. वहीं, खेतो में सूंड़ी जैसे कीटों को मारकर खाने वाली काली चिडिय़ा तथा अन्य किस्म की चिडिय़ों पर भी कीटनाशकों का कहर बरपा है जिसका खमियाजा कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो किसानों को ही भुगतना पड़ रहा है. किसानों का कहना है कि ये पक्षी खेतों मे फसल को नुक्सान पहुंचाने वाले कीटों को खा जाते थे. खेतों में तित्तर व बटेर जैसे पक्षी दीमक को खत्म करने में बेहद सहायक थे. इसके अलावा धान, गन्ने की फसल व टमाटर के खेतों में कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा छिडक़ाव किया जा रहा है जिससे तित्तर व बटेर, काली चिडिय़ा जैसे पक्षियों की हर वर्ष भारी संख्या में मौत हो जाती है. यहीं स्थिति मांसाहारी पक्षी मोर, शिकरा और कौवे की है. राष्ट्रीय पक्षी मोर किसानों को सर्प जैसे खतरनाक जन्तु से भयमुक्त रखते हैं. किसानों का मित्र यह पक्षी पकी फसल को भारी मात्रा में नुक्सान पहुचाने वाले चूहों को मारकर खाने मे मशहूर है लेकिन यह पक्षी भी अब किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक के छिडक़ाव का शिकार बनता जा रहा है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर फसलों में इसी प्रकार अंधाधुंध तरीके से कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता रहा तो राष्टरीय पक्षी मोर सहित तमाम किसान व पर्यावरण मित्र पक्षियों की तममा प्रजातियां कुछ वर्षों में ही विलुप्त हो जाएंगी. समाज, पर्यावरणविद्वों, किसानों, वैज्ञानिकों को मिलकर विकास का ऐसा मॉडल अपनाना होगा जिसमें मनुष्य जाति के साथ पक्षी भी आसानी से रह सके।

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