आत्मनिर्भर भारत समय की आवश्यकता है

ओ३म्
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आजकल देश में आत्मनिर्भरता की बात हो रही है। आत्मनिर्भरता का अर्थ है स्वावलम्बी होना तथा दूसरों पर आश्रित व निर्भर न होना। हम जब आत्मनिर्भर नहीं होते तो जिन लोगों से हम अपनी आवश्यकता की वस्तुयें प्राप्त करते हैं, वह लोग हमसे अनुचित मूल्य लेने सहित हमारे हितों की अनदेखी कर हमें कमजोर करने व हमें आत्मनिर्भर न बनने देने के षडयन्त्र करते रहते हैं। वर्तमान समय में देश में ऐसा ही देखा जा रहा है। आजकल हमारे देश में पड़ोसी देश चीन से बहुत सा सामान आयात होकर आता है। कुछ सस्ता होने के कारण हम उसे आंखें बन्द कर खरीद लेते हैं। हम इस बात की उपेक्षा कर देते हैं कि जिस सामान को हमने खरीदा है वह टिकाऊ है भी अथवा नहीं? अपनी अज्ञानता के कारण हम मामूली महंगा सामान जो अधिक टिकाऊ और स्वदेश में बना होता है, उसकी उपेक्षा कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि स्वदेशी उद्योग व उससे जुड़े लोग आर्थिक दृष्टि से कमजोर बनते हैं और हमारे शत्रु देश हमारे पैसे से हमारी भूमि पर कब्जा ही नहीं करते अपितु हमारे अन्य शत्रुओं को हथियार व अन्य सहायता देकर हमें व हमारे देश को कमजोर करने के उपाय करते जाते हैं। इसका एक ही समाधान व उपाय है कि हम अपनी निजी व अन्य सभी आवश्यकतायें कम से कम रखें। मितव्ययता तथा अपनी आवश्यकताओं को यथासम्भव कम से कम रखना ही स्वावलम्बी एवं आत्मनिर्भर बनने की पहचान है। ऐसा करके हम स्वस्थ, निरोग एवं दीर्घायु भी बनते हैं। हमारी अपनी व देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है और हमें अपने व देश की आवश्यकता के लिये विदेशों से ऋण आदि नहीं लेना पड़ता। हमने बहुत से अल्प आय के व्यक्तियों को बहुत साधारण एवं सुखी जीवन व्यतीत करते देखा है जिन्होंने अपने बच्चों को सस्ते विद्यालयों में पढ़ाया और जो आगे चलकर ऊंचे-ऊंचे पदों पर नियुक्त हुए जबकि धनवान लोगों की सन्तानें जो साधन एवं धन-सम्पन्न थी, वह उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकीं। हमारे अपने मित्रों में ऐसे उदाहरण देखने को उपलब्ध हैं। मनुष्य को मितव्ययी होने के साथ तपस्वी या पुरुषार्थी होना चाहिये। ऐसा करना सफलता की गारण्टी होता है। पुरुषार्थी व्यक्ति ही आत्मनिर्भर जीवन व्यतीत करते हुए जीवन में अनेकानेक प्रकार से उन्नति एवं सफलतायें प्राप्त कर सकते हैं।

आत्मनिर्भर बनने के लिये एक महत्वपूर्ण सूत्र व सिद्धान्त यह है कि परिवार, समाज व देश के लोगों का एक समान विचारधारा व मत को मानें व असत्य का त्याग तथा सत्य का ग्रहण करें। यदि परिवार व देश में एक से अधिक विचारधारा के लोग होंगे तो इससे परिवार व देश कमजोर होता है। ऐसी अवस्था में उन्नति के स्थान पर अवनति होती है। इसके लिये यह आवश्यक है कि हमारे सभी विचार सत्य एवं परस्पर हित साधन करने वाले हों। हमारे देश में अनेकानेक विचारधारायें, मत व पन्थ हैं। यह सब देश की उन्नति व आत्मनिर्भरता में साधक नहीं अपितु बाधक हैं। सब मनुष्य एक मत, एक विचार, एक भाव, एक सुख-दुःख वाले हो सकते हैं, ऐसा होना सम्भव है, इसके लिये हमें अपना ज्ञान बढ़ाना होगा, सत्य ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होगा, सच्चे विद्वानों की संगति करनी होगी तथा दुष्ट प्रवृत्तियों के व्यक्तियों से दूर होना होगा। हमें अपने अनुचित स्वार्थों का त्याग भी करना होगा और पात्र निर्बल व्यक्तियों की उन्नति में सहयोग करते हुए उनकी उन्नति में प्रसन्न व सुखी होना होगा। हमें अपनी सभी मान्यतायें व सिद्धान्तों को सत्य व युक्तिसंगत बनाना होगा। हमारे किसी कार्य से किसी के प्रति अन्याय, पक्षपात व शोषण कदापि नहीं होना चाहिये। यदि सब देशवासी इन बातों का ध्यान रखें तो देश में सब मनुष्यों में परस्पर एकता स्थापित हो सकती है। ऐसी स्थिति में सत्य पर आधारित एक मत का होना देश हित में व देश को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

समाज में हम देखते हैं कि लोग बड़ी बड़ी बातें तो करते हैं परन्तु वह दूसरों के हितों की अनदेखी व उपेक्षा करते हैं तथा अपने अनुचित स्वार्थों की पूर्ति करने में तत्पर रहते हैं और अनुचित व अपराधिक कार्य करने से भी परहेज नहीं करते। ऐसा करने से समाज कमजोर होता है और देश की आत्मनिर्भरता का लक्ष्य दूर होता है। लोगों में परस्पर वैमनस्य उत्पन्न होता है जो देश को आत्मनिर्भर बनाने में बाधक होता है। अतः हमें ‘सब सुखी हों, सब उन्नति करें, सब बलवान हों, निरोगी व स्वस्थ हों, सब एक दूसरे से परस्पर प्रेम करें, गरीबी दूर करने में सब सहायक हों और गरीबों की शिक्षा व सहायता द्वारा हित करने के कार्यों को करें।’ विदेशों में विशेषतः यूरोप आदि के देशों आदि में हम इन नियमों का कुछ कुछ पालन होते हुए देखते हैं। आज विश्व में जो सबसे विकसित, उन्नत व आत्मनिर्भर देश हैं वह अधिकतर यूरोप व उनके निकटवर्ती वह देश हैं जहां उपर्युक्त नियमों का पालन किया जाता है। देश की आत्मनिर्भरता के लिये हम यह भी अनुभव करते हैं कि हमें व्यवस्था के सभी नियमों पर पुनर्विचार करना चाहिये और इनकी वैदिक मान्यताओं से तुलना कर इन्हें वेद व वैदिक ग्रन्थों के अनुरूप, सत्य, तर्क एवं युक्ति पर आधारित करना चाहिये। ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये कि कमजोर व गरीबों के अधिकारों का कोई शिक्षित व धनवान हनन, हरण व शोषण न कर सके। सबको न्याय मिलना चाहिये और अपराध करने वाले अपराधियों को तुरन्त दण्डित किया जाना चाहिये और साथ ही पीड़ितों को उचित राहत भी दी जानी चाहिये। हमारे देश में अनेक अवसरों पर पीड़ितों से भी भेदभाव किया जाता है, जो कि उचित नहीं है।

हमें देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने देश में आवश्यकता की सभी वस्तुओं का गुणवत्ता से युक्त तथा देश की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना होगा जिससे हम बाहर की वस्तुओं को न खरीदें और अपनी अतिरिक्त वस्तुओं को विदेशों में भेजकर उचित धन व लाभ प्राप्त कर सकें। इसके साथ बहुत सी ज्ञान विज्ञान से बनने वाली वस्तुओं में हम विश्व के अनेक देशों से पीछे हैं। हमें यह वस्तुयें व पदार्थ विदेश से मंगाने पड़ते हैं और इसके बदले में भारी विदेशी मुद्रा व्यय करनी पड़ती है। इसका उपाय यही है कि हम विदेशों से वस्तुओं को न खरीद कर विदेशी कम्पनियों को उन वस्तुओं को भारत में बनाने की सुविधा प्रदान करें जिससे हम उन्हें यहां प्राप्त कर सकें और वही वस्तुयें विश्व के दूसरे देश हमारे देश की विदेशी कम्पनियों से खरीदें जिससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था सुदृण हो। हमारे देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी इस दिशा में प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया है। यह स्थिति आजादी के बाद से अब तक नहीं थी। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विदेशी में भारत की विश्वनीयता को बढ़ाया है। अनेक विदेशी कम्पनियां भारत में बड़ी मात्रा में निवेश कर रही हैं। स्वच्छता की ओर भी एक आन्दोलन चल रहा है और इसमें भी काफी सफलतायें प्राप्त हुई हैं। ऐसे सभी उपाय निश्चय ही देश को आत्मनिर्भर बनायेंगे। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिये सभी मनुष्य एक परमात्मा के बनाये हुए हैं। हमें किसी भी मनुष्य के प्रति भेदभाव व पक्षपात नहीं करना है। सभी देशवासी परमात्मा के एक परिवार के सदस्य हैं जिसका मुख्या परमात्मा है। जिस दिन हम इस विचार को आत्मसात कर लेंगे, उस दिन देश से सभी प्रकार के भेदभाव मिट सकते हैं। इसके लिये हमें वेदों की ओर लौटना होगा। ऐसा करके हमारा निजी जीवन आत्मनिर्भर बनेगा और आने वाले समय में देश भी आत्मनिर्भरता के सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।

-मनमोहन कुमार आर्य

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