सूर्यपुत्र न होकर कर्ण था एक महान ऋषि की संतान

images (54)

अब मैं आपको एक अन्य विचित्र घटना से अवगत कराने जा रहा हूं। जो कुंती और कर्ण और श्वेत
मुनि के संबंध में ही है। श्रंग ऋषि द्वारा दिनांक 15 मार्च 1986 को बरनावा लाक्षागृह में 51 वें पुष्प के रूप में हमको अर्पित की गई है। वह निम्न प्रकार है :-
“इसी प्रकार’ अप्रतम ब्रह्मा प्रणय ‘महाराजा पाण्डु यह कहा करते थे। उनका नाम ही पंडकेत्व कहलाता था। पंडकेश्वर नामक उनका नामकारण था ।परंतु मेरे प्यारे महानंद जी ने मुझे प्रकट कराया था कि वह पाण्डु रुग्ण रहते थे। परंतु पाण्डु उनके यहां रुग्ण नहीं था। उनका पण्डकेश्वर नामकरण कहा जाता था ।जो अपने में देखे ! तपस्वी हो, पंडकेशवर मानो जो पंचमहाभूत को अच्छी प्रकार अंग और उपांगो से जानने वाला हो। उसका नामकरण पांडकेश्वर कहा जाता है । पाण्डु के बाल्यकाल का नाम श्वेतकेतु था। अहा ! बाल्यकाल का नाम स्वेतकेतु और विद्यालय में उनका नाम पंडकेश्वेर नियुक्त किया गया ।परंतु देखो उनको पांडु नामों से उदगीत गाने लगे। जब इस प्रकार का उदगीत गाया जाने लगा तो मुझे कुछ ऐसा स्मरण है कि वही पंडकेशवरअपने गृह में प्रवेश हुए और गृह में प्रवेश होकर के कुंती से तपस्विनी बनने के लिए कहने लगे। ब्रह्मवर्चस का पालन करने वाली माताएं और ब्रह्म योगी जो पुरुष होते हैं उनमें बड़ी विचित्र विशेषताएं होती हैं। वह पांडुकेश्वर और कुंती दोनों अपने में बुद्धिमान थे।
जब उनके( कुंती) गर्भ में शिशु का प्रवेश हुआ तो सबसे प्रथम धर्मराज युधिष्ठिर का आत्मा आया। धर्म ब्रह्म :जो धर्म के मर्म को जानने वाले थे, उनका जब प्रवेश हुआ तो वह कुंती प्रत्येक इंद्रिय को सजातीय बनाने लगी। प्रत्येक इंद्रिय को सजातीय बनाते हुए धर्म में इंद्रियों को पिरोने लगी और जो भी अन्नाद पान करती वह भी धर्म से ओतप्रोत होता।
धर्म किसे कहते हैं ? धर्म कहते हैं इंद्रियों द्वारा उन गुणों को अपनाने को जो उसमें अच्छे गुण होते हैं। जैसे वाणी का धर्म सत्य उच्चारण करना है और चक्षु का धर्म सत्य को निहारना है ,और श्रोता का धर्म सत्य ही श्रवण करना है ,और इसी प्रकार त्वचा का धर्म क्या है, ‘संभूति ब्रह्मलोकम हिरण्यम वृथा’ वह अपने आप में एक महान पवित्रता की वेदी कही जाती है ।जब माता इस प्रकार विचारती है कि चक्षुस्मे पाही, श्रोत्रस्मे पाही, प्राणम मे पाही, त्वचा में पाही ,वह सब में धर्म ही देखती है।
हे माता जब तू अपने में अपनी इन्द्रियों में धर्म ही देखती रहती है तो तेरे गर्भ स्थल से धर्मराज पुत्र का जन्म तो होता ही है।”
क्या कुंती के कान से पैदा होने के कारण उसके पुत्र को कर्ण कहा गया ?
क्या कर्ण सारथी पुत्र था ?
क्या कर्ण किसी ऋषि की संतान था ? यदि हां तो कौन से ऋषि का ?
क्या विधाता की सृष्टि के नियम के विरुद्ध किसी का जन्म हो सकता है ?
क्या कर्ण सूर्यपुत्र था ? अथवा सूर्य के आशीर्वाद से उत्पन्न हुआ था ?
इस विषय में श्रृंग ऋषि ने महानंद मुनि शिष्य को व अन्य मुनियों को क्या व्याख्यान दिया है , उसको पढ़ते हैं जो कि प्रकार है :–

‘माता कुंती’

आगे कैसा काल आ रहा है और वह क्या उच्च काल था कि माता जिस प्रकार संतान को बनाना चाहे बना सकती है। यह उदाहरण उस वैदिक काल का है। मुनिवरो ! राजा कुंतेश्वर राजा थे और उनके केवल एक कन्या थी जिसका नाम कुंती था।
पूज्य महानंद जी — ‘गुरुजी यह तो आप कल ही उच्चारण कर रहे थे यह तो आपकी तुकबंदी हो गई और देखो आपने कुंत राजा की पुत्री का नाम भी कुंती उच्चारण कर दिया।
अरे बेटा! यह तो कोई वाक्य नहीं ।गुरु जी ने कल भी कहा या मत्स्योदरी नाम बताया था। अच्छा महानंद जी विनोद की बातें तो फिर होंगी। इस समय कृपा कीजिए । अच्छा मुनिवरों ! हम कह रहे थे कि ‘माता ब्रह्मा स्नेह ‘तो उनकी वह कन्या महान सुशील थी। इस प्रकार मधुर माता की तत अनुरूप सुशील कन्या थी तो उनकी इच्छा हुई कि इसको इस प्रकार की विद्या और शिक्षा दी जाए जिससे यह ज्ञानवान और सुयोग्य हो । क्योंकि बिना ज्ञान कोई योग्य नहीं बन सकता ।तब राजा ने खोज की और भृगु ऋषि के पास पहुंचे और पूछा कि वृद्ध महान आत्माओं से वह कोई शिक्षा पा सकते हैं। उस समय मुनिवरों ! राष्ट्र में महान वन था और उस भयंकर वन में करूड़ नाम के ब्रह्मचारी रहा करते थे। ऐसा सुना जाता है , परंतु इतनी अवस्था होने से प्रजन्य नाम के ब्रह्मचारी आदित्य नाम से कहे जाते थे । वृद्ध राजा ने सोचा मेरी कन्या यहां हर प्रकार से शिक्षा पा सकती है ।उस समय उनकी आयु 284 वर्ष की थी । ऋषि से निवेदन किया और अपनी इच्छा को बताया कि मैं अपनी कन्या को आपके आश्रम में नियुक्त करना चाहता हूं। ऋषि ने आज्ञा दी हमें स्वीकार है और वह कन्या आश्रम में रहने लगी ।ऋषि ने बाल्यावस्था से व्याकरण का पूर्ण ज्ञान दिया और बाद में सब विद्याओं का बोध कराया । कुछ ही काल में वह कन्या सब विद्याओं से संपन्न हो गई और फिर यौवन को प्राप्त हुई और बहुत ते जस्वी ब्रह्मचारिणी सब विद्या में पारंगत हो गई।
उस समय कुछ ऐसा कारण हुआ कि वहां श्वेतमुनि आ पहुंचे ।श्वेत नाम के ब्रह्मचारी ने सोचा , वह उस समय युवा थे । महान तेजस्वी थे। परंतु यह माया मानव को दुर्भाग्य से कहां की कहां पहुंचा देती है ? और कहां तक इसको तुच्छ बना देती है ? उस महान ब्रह्मचारी ने उस ऋषि के आश्रम में जब उस युवा सुशील कन्या को देखा तो उनके मन में तीव्र गति पैदा हुई और उनके मन की जो आकृति थी उस अवस्था में जब उस कन्या ने उस तेजस्वी ब्रह्मचारी बालक को देखा तो उस काल में ऋतुमती थी। उन दोनों ने एक-दूसरे को देखा और पुन:जब कुछ काल पश्चात ब्रह्मचारी ने कन्या को देखा तो अनुभव हुआ कि उनसे ऋषि भूमि में कितना बड़ा मानसिक पाप हुआ है ? उस समय उसने ऐसा नियम बनाया कि मैं भक्ति मार्ग में जा रहा हूं और 12 वर्ष कोई अन्न का भक्षण नहीं करूंगा। तब यह पाप शांत होगा ,क्योंकि यह महान पाप जो मेरे अंतःकरण में विराजमान हो गया है ,आगे जन्मों में न जाने किन – किन योनियों में प्रविष्ट होना पड़ेगा। इसलिए मेरा कर्तव्य है कि मुझे उपवास करना चाहिए और पर्वतों में भ्रमण करना चाहिए । वास्तव में उस पाप की उन्होंने जो अंतः करण द्वारा हो गया है उसकी क्षमा मांग ली और पर्वतों आदि का भ्रमण उपवास रखकर आरंभ कर दिया।
अब उस ब्रह्मचारिणी को ज्ञात हुआ कि तुमने महान पाप किया है तो सोचने लगी क्या करना चाहिए ? और ज्ञान के कारण मन से पाप निकल गया था तो अपने गुरु से सब बताया और उनसे पूछा कि भगवान अब मैं क्या करूं ? तो गुरु ने कहा कि मैं क्या कर सकता हूं ? अब ऐसा करो कि जब बालक उत्पन्न हो तो उसको ऐसी शिक्षा दो कि वह योग्य बने। ऐसा प्रयत्न करना चाहिए । उस कन्या ने गुरु आदेश अनुसार जब गर्भ में बालक था तभी से सूर्य का जाप करना आरंभ कर दिया और याचना आरंभ की कि यह बालक महान बलवान योग्य विद्वान हो, तो उस कन्या के हृदय में यह भावना उत्पन्न हुई कि जैसे सूर्य तीनों लोकों में अपने ताप और प्रकाश से उज्जवल है वैसे यह बालक हो।
मुनीवरो ! उस कन्या के कुछ समय पश्चात बालक उत्पन्न हुआ और गुरु जी को बताया कि अब जब पिता के गृह में जाऊंगी तो बड़ा पाप होगा। अब मुझे क्या करना चाहिए ? गुरु जी ने कहा तो अच्छा पुत्री तुम कुशा का आसन बनाओ उस पर पुत्र को प्रविष्ट करके गंगा में तिलांजलि दे दो ।

उस समय उस महान देवी ने क्या किया ? उस बालक को भीतर आसन लगा प्रविष्ट करा गंगा में तिलांजलि दे दी और कहा हे गंगा ! यह बालक तेरा है मेरा नहीं । वह बालक बहते- बहते उसी श्वेत मुनि के आश्रम के पास जो गंगा के किनारे था देखा गया। उनके शिष्य मंडल ने कुशा से उस बालक को निकाल कर अपने गुरु जो श्वेत नाम के थे , उनके पास ले गए तो उस ब्रह्मचारी के आगे उसी ब्रह्मचारी द्वारा उस बालक ने शिक्षा पाई।
आगे बेटा ! हमारा व्याख्यान था कि उस माता ने सूर्य के तप से तथा प्रार्थना से जो बालक को तेजस्वी तथा बलवान बनाने की थी और उसे गंगा में प्रविष्ट कर गुरु की आज्ञा अनुसार गंगा में त्याग दिया। भगवान से प्रार्थना की और तब गुरु ने आदेश दिया कि अब तुम एक वर्ष पर्यंत कोई अन्न भक्षण के रहित भगवान से प्रार्थना करो। जिससे इस बात से क्षमा पाओगी ।उस देवी ने एक वर्ष पर्यंत वनस्पति आदि का आहार किया और अन्न का त्याग कर गायत्री का जाप तथा वादन किया। उससे उसका पाप क्षमा हो गया।

निष्कर्ष भ्रांति निवारण

१ कर्ण कुंती के कान से पैदा नहीं हुआ था।
२ कर्ण सूत पुत्र नहीं था। बल्कि श्वेत मुनि से उत्पन्न कुंती का पुत्र था। कुंती द्वारा गंगा नदी में अपने गुरु करुड़ ऋषि के आदेश के अनुसार बहाए जाने के पश्चात श्वेत मुनि के शिष्यों द्वारा गंगा नदी में नहाते समय बहते हुए आता देखकर पकड़ने पर श्वेत मुनि के आश्रम में शिक्षा दीक्षा हुई थी । अर्थात जिस के ब्रह्मचर्य से पैदा हुआ संयोगवश उसी पिता द्वारा लालन पालन शिक्षा दीक्षा कर्ण की हुई थी ।इसलिए श्वेतपुत्र कहा जाता था। इसका ही अपभ्रंश करके सूत पुत्र कहा जाने लगा।

३ – श्वेत मुनि का पुत्र था।
जैसा कि उपरोक्त प्रश्न संख्या दो में निवेदित है।
४ – विधाता की सृष्टि के नियम के विपरीत किसी का जन्म नहीं होता चाहे वह मत्स्योदरी हो या कर्ण हो।
५ – कर्ण सूर्यपुत्र नहीं था। न हीं सूर्य की उपासना के कारण उसके आशीर्वाद के द्वारा पैदा हुआ था ।
बल्कि कुंती द्वारा गर्भकाल में सूर्य की उपासना की गई थी ।
इसलिए कर्ण महान योद्धा, निडर ,निर्भीक ,दानवीर महा तेजस्वी ,विद्वान बना। इसका कारण यह भी है कि माता कुंती करूड़ ऋषि के आश्रम में विद्या अध्ययन करने के पश्चात विदुषी नारी थी । जबकि श्वेत मुनि भी अपने समय के एक महान ऋषि हुए हैं जिन दोनों के सयोग से कर्ण पैदा हुआ था । पश्चात श्वेत मुनि के आश्रम में ही उसकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई थी।
इसलिए कर्ण महान व्यक्तित्व का धनी हुआ।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betebet giriş