हिन्दुओं का सकारात्मक ज्ञान विज्ञान

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जब भी कभी भारतीय विज्ञान की चर्चा होती है, कुछेक संस्कृत ग्रंथों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उदाहरण के लिए वैशेषिक और सांख्य दर्शनों को विज्ञान विषय का प्रतिपादक बतलाया जाता है। परंतु आज का विज्ञान का कोई विद्यार्थी जब उन ग्रंथों को पढ़ता है तो उसे उनमें विज्ञान के स्फुट चिह्न ही मिलते हैं, व्यवस्थित विज्ञान नजर नहीं आता। ऐसे में उन्हें लगता है कि ये ग्रंथ भले ही थोड़ा बहुत विज्ञान की जानकारी देते हों, परंतु उसके आधार पर विज्ञान की व्यवस्थित शिक्षा और तकनीक का विकास संभव नहीं है। ऐसे में प्रख्यात विद्वान ब्रजेंद्रनाथ शील की पुस्तक पॉजिटिव साइंसेज ऑफ हिंदुज एक मार्गदर्शक पुस्तक साबित होती है।
आचार्य ब्रजेंद्रनाथ शील बीसवीं शताब्दी के उद्भट भारतीय विद्वानों में से एक थे। वर्ष 1864 में कोलकाता में जन्मे श्री ब्रजेंद्रनाथ का बचपन काफी कठिनाइयों से भरा रहा। पहले माता, फिर पिता और अंत में अभिभावक रहे मामा के देहांत के कारण उनका प्रारंभिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। परंतु इसके बावजूद बड़े भाई के संरक्षण में उन्होंने पढ़ाई की। बचपन से ही वे गणित में काफी तेज थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी, बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण और विश्लेषण क्षमता अपूर्व। उनके साथ स्वामी विवेकानंद ने भी पढ़ाई की थी। ब्रजेंद्रनाथ ने प्रथम श्रेणी से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके अध्ययनकाल की एक रोचक घटना इस प्रकार है। उनके प्राध्यापक चाहते थे कि वे दर्शन से एम ए करें, परंतु उनके गणित शिक्षक उन्हें गणित से एमए कराना चाहते थे। उनके इस बहस के दौरान स्वयं ब्रजेंद्रनाथ जीवविज्ञान और नृतत्वविज्ञान के अध्ययन में व्यस्त थे। अंत में उन्होंने दर्शन से एम ए किया।
केवल बीस वर्ष की आयु में वे अंग्रेजी के प्रोफेसर बने। बाद में वे नागपुर के एक कॉलेज के प्रिंसिपल हो गए। वर्ष 1912 तक वे विभिन्न कॉलेजों में प्राध्यापक रहे। वे मैसुर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में भाग लिया और शोधपत्रा पढ़े। वे हिब्रु, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन सहित अनेक यूरोपीय भाषाओं के विद्वान थे।
उनकी पुस्तक पॉजिटिव साइंसेज ऑफ हिंदुज वर्ष 1915 में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने प्रसिद्ध रसायनशास्त्राी प्रफुल्लचंद्र राय के साथ मिल कर भारतीय विज्ञान पर काफी काम किया था। इन दोनों ही विद्वानों की प्रेरणा से भारत में विज्ञान के विकास पर काम करने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरित किया था। उनकी प्रेरणा से इंडियन नेशनल साइंस एकेडेमी की स्थापना की गई थी।
इस पुस्तक की भूमिका में ही ब्रजेंद्रनाथ शील ने लिखा है कि इस पुस्तक को लिखने का उनका सीधा उद्देश्य विशेष विज्ञान के इतिहासकारों कुछ नई सामग्री प्रस्तुत करना है ताकि उनकी खोज का मार्ग और अधिक विस्तृत हो सके। आचार्य शील ने यह काम बड़ी ही कुशलतापूर्वक संपादित भी किया है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि यही वह कालखंड था जब यूरोपीय विद्वान यह साबित करने में जुटे थे कि यूरोपस्थित ग्रीस ही दुनिया के सारे विज्ञान का मूल है। ऐसे में ब्रजेंद्रनाथ शील का यह प्रयास अनूठा और मील का एक पत्थर है।
पुस्तक के अध्यायों को देखें तो इस पुस्तक की विशालता का अनुभव होता है। इस एक पुस्तक में उन्होंने विज्ञान की लगभग सभी धाराओं पर भारतीय ज्ञान-संदर्भों को प्रस्तुत किया है। गतिकी यानी कि मैकेनिक्स, ध्वनि-विज्ञान, जीवविज्ञान, पौधशास्त्रा जैसे विषयों का भारतीय ग्रंथों के आधार पर अत्यंत प्रामाणिक और वैज्ञानिक विवरण इस पुस्तक में है। आमतौर पर संस्कृत की भाषा को आधुनिक विज्ञान की भाषा में प्रस्तुत करना काफी कठिन प्रतीत होता है। परंतु आचार्य ब्रजेंद्रनाथ ने इसे काफी सरल कर दिया है। उदाहरण के लिए गतिकी के अध्याय में वैशेषिक के कर्म को उन्होंने कार्य और गति से व्याख्यायित किया है और इस आधार पर गतिकी के नियमों का निष्पादन किया है।
इस प्रकार आचार्य ब्रजेंद्रनाथ शील की यह पुस्तक भारतीय विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए काफी उपयोगी है। भारतीय दर्शन के विद्यार्थियों के लिए भी यह पुस्तक काफी काम की साबित हो सकती है क्योंकि यह दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को बड़ी कुशलता से सामने रखती है। यदि कभी भविष्य में भारतीय भौतिकी की पाठ्यपुस्तक कोई तैयार करे तो उसमें यह पुस्तक आधारभूत सामग्री का काम करेगी। यह पुस्तक www.archieve.org से डाउनलोड की जा सकती है।
✍🏻भारतीय धरोहर से साभार

भारत से ही सीखा है यूरोप ने विज्ञान

हमारे विद्यालयीन और महाविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में यह स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि भारत में विज्ञान की शिक्षा का सूत्रपात अंग्रेजों ने ही किया है। इसे काफी कृतज्ञतापूर्वक स्मरण किया जाता है कि यदि वे नहीं आते तो हम अभी भी बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी के युग में ही जी रहे होते, खेती के लिए वर्षा पर निर्भर होते, ठंड और गर्मी से बच नहीं पाते आदि आदि। यह बात सही है कि आज के लगभग सभी तकनीकी अनुसंधान यूरोप और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में ही हुए हैं।

वहीं यह भी सत्य है कि यूरोप ने ये सारे अनुसंधान पिछले ढाई-तीन सौ वर्ष में ही किए हैं। उससे पहले वहाँ बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी चलाने योग्य सड़कें भी नहीं थीं, उनके पास सूती और रेशमी जैसे मुलायम और आकर्षक वस्त्र नहीं थे, उन्हें मकान बनाने तक का ज्ञान नहीं था, रोगों से बचने के उपाय उन्हें नहीं पता थे और गिनती करने के लिए वे जमीन पर लाइनें बनाने तक सीमित थे। प्रश्न उठता है कि तीन सौ वर्ष पहले अचानक ऐसा क्या हुआ कि यूरोप में तकनीकी अनुसंधानों की बाढ़ आ गई? आखिर जिन्हें कपड़े बनाना भी नहीं आता था, वे हवाई जहाज कैसे बनाने लगे? जिन्हें गिनती नहीं आती थी, उन्होंने कैल्कुलस जैसे क्लिष्टतम गणना का आविष्कार कैसे कर दिया? जिन्हें सामान्य सर्दी-जुकाम, ज्वर, प्लेग, खुजली, सिफलिस जैसे रोगों का इलाज नहीं पता था, उन्होंने एक वैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली कैसे विकसित कर दी?
इन प्रश्नों का उत्तर चाहिए तो हमें पिछले चार सौ वर्षों का इतिहास पढऩा होगा। यह तो स्वयं यूरोपीय विद्वान भी मानते हैं और एक सर्वज्ञात तथ्य है कि यूरोप का एक हजार वर्ष का इतिहास अंधकार युग माना जाता है यानी चौथी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन से लेकर लगभग 13-14वीं शताब्दी तक का काल यूरोप का अंधकार युग माना जाता है। 14वीं शताब्दी से यूरोप का पुनर्जागरण का काल माना जाता है। 13वीं शताब्दी में कथित रूप से मार्को पोलो चीन और भारत की यात्रा करके लौटता है और उसके यात्रा वृत्तांत से पूरे यूरोप में तहलका मच जाता है। हम पाते हैं कि यही वह काल है जब यूरोप में ज्ञान-विज्ञान का सूत्रपात होना प्रारंभ होता है। निकोलस कोपरनिकस, गैलीलियो गैलीली जैसे ज्ञान-विज्ञान के पिताओं का काल यही है। यह देखना काफी रोचक है कि यूरोपीयों को हर ज्ञान-विज्ञान का एक पिता निश्चित करने का एक नशा सा है। इसका एक कारण यह भी है कि वे यह स्थापित करना चाहते हैं कि उनसे पहले यह सिद्धांत किसी को पता नहीं था। वे इस सिद्धांत के आविष्कर्ता हैं। इस प्रकार वे यह स्थापित करना चाहते हैं कि यूरोप ही ज्ञान-विज्ञान का जनक है। सच इसके ठीक विपरीत है।

कृतघ्नों का देश
वस्तुस्थिति यह है कि यूरोपीयों को हम कृतघ्नों का देश कह सकते हैं क्योंकि वे ज्ञान-विज्ञान को जहाँ से ले रहे हैं, उसका श्रेय उसे नहीं दे रहे हैं। उनसे यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि 15वीं शताब्दी के बाद एकदम से वहाँ ज्ञान का विस्फोट कैसे हुआ? सभी प्राकृतिक घटनाएं तो उससे पहले भी यूरोप में वैसी ही घट रही थीं, सेब तो पेड़ों से पहले भी गिर रहे थे, फिर यूरोप में कोई न्यूटन पहले क्यों नहीं पैदा हुआ? भारत से संपर्क के बाद ही हर किसी को ज्ञान-विज्ञान की बातें क्यों और कैसे सूझने लगीं? यह समझना कठिन नहीं है कि यूरोपीय अपने ज्ञान के मूल स्रोतों को बताने से परहेज क्यों करते हैं?

अपने जिन उपनिवेशों को वे हीन और कमतर बताते हैं, उन्हें वे किसी भी ज्ञान-विज्ञान का श्रेय कैसे दे सकते हैं? उपनिवेशों को हीन और कमतर साबित करना अफ्रीका और अमेरिका में संभव है, क्योंकि वहाँ का प्राचीन ज्ञान-विज्ञान लगभग विस्मृत और नष्ट हो चुका था। परंतु भारत में इसके ठीक विपरीत स्थिति थी। इसे समझने के लिए एक उद्धरण देखना चाहिए। यूजीसी के एक प्रोजेक्ट की भूमिका में प्रो. सी एस मोहनवेलू लिखते हैं, ‘जर्मन मिशनरी विलियम टोबियस रिंगेलटौबे (1770-1816) ने बिल्कुल सही ही लिखा है कि तमिलनाडू में ईसा का प्रचार करने आई जर्मन मिशनरियों की गतिविधियों को आध्यात्मिक लकवा मार गया था। ऐसा हुआ था भारत के स्थानीय समाज के कारण जिसकी बहुआयामी भाषिकता तथा सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक गुणों ने वर्ष 1505 से भारत आए दर्जनों जर्मनों को पूरी तरह आकर्षित कर लिया था। छोटी चींटियों से लेकर विशाल हाथी तक, नन्हीं जड़ी-बूटियों से लेकर विशाल बरगद वृक्ष तक, नवजात शिशु से लेकर शतायु वृद्धों तक, पालकियों पर बैठने वाले धनियों से लेकर पैदल चलने वाले गरीबों तक, कुछ भी उनकी आँखों से नहीं छूटा और जिसका परिणाम था उनके हजारों डायरियां, पत्र, यात्रा वृत्तांत और स्थानीय साहित्य तथा कलाकृतियों का संग्रह।’

इन डेनिश और जर्मन मिशनरियों ने जो कुछ दर्ज किया है, उसे पढऩे से काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। हम यहाँ कुछेक उदाहरणों से इस बात को समझेंगे कि यूरोप का वैज्ञानिक अनुसंधान एक प्रकार से बौद्धिक चोरी पर टिका है, न कि किसी प्रकार के अचानक से कर लिए गए अनुसंधानों पर। सबसे पहले हम खगोलशास्त्र का उदाहरण लेते हैं। यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि वर्ष 1765 तक यूरोप में माना जाता था कि पृथिवी समेत समस्त सृष्टि की रचना 4004 ईसा पूर्व में हुई है। कोपरनिकस (1530) और गैलीलियो (1615) के पहले तक वे यह मानते थे कि सूर्य पृथिवी से आकार में काफी छोटा है और वह पृथिवी का चक्कर लगाता है, जिससे दिन और रात होते हैं। कहा जाता है कि इसके लिए उन्होंने एक दूरबीन का उपयोग किया था। परंतु केवल दूरबीन से देखने से क्या सूरज स्थिर दिखने लगेगा?
मिशनरियों ने की ज्ञान की चोरी
यह देखना रोचक हो सकता है कि 15वीं शताब्दी से ही मिशनरियों के माध्यम से भारतीय ज्योतिष के तथ्य यूरोप में पहुँचने लगे थे। उन पर चर्चा प्रारंभ हो गई थी। 17वीं शताब्दी में तो यूरोप में उस पर घनघोर बहसें होने लगीं थीं। ला प्लैस, बैन्टले, डिलॉम्ब्रे जैसे लोगों ने भारतीय ज्योतिष की लंबी कालगणना को झूठा ठहराने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। कास्सिनी, प्लेफेयर जैसे लोग भारतीय ज्योतिष की गणना की प्राचीनता को स्वीकार तो रहे थे, परंतु एक सीमा के बाद वे भी इसे खारिज कर देते थे। थियोगोनी ऑफ हिंदुज में काउंट बोत्र्सजोर्ना लिखते हैं, ‘हिंदू खगोलशास्त्र की प्राचीनता यूरोप के विद्वत्वर्ग के लिए लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। कैसिनी, बैले जेंटिल और प्लेफेयर सभी यह मानते रहे हैं कि ऐसे कई हिंदू प्रेक्षण हैं जो ईसा से कम से कम 3000 वर्ष पहले किए गए हैं और जो यह दिखलाते हैं कि उस समय भी अत्यंत विकसित खगोलशास्त्र था। ला प्लेस्ड, बेंट्ले और डिलाम्ब्रे सरीखे अन्य विद्वान इन वर्णनों की सत्यता को नकारते हैं और उसके आधार पर निकाले गए निष्कर्षों को स्वीकार नहीं करते।’

ऊपर हम यूजीसी के एक प्रोजेक्ट के तहत जर्मन मिशनरी जिगेनवाग द्वारा केवल तमिलनाडू से यूरोप भेजी गई तमिल पुस्तकों और डायरी नोटिंग की सूची का उल्लेख कर चुके हैं। उस सूची में भारतीय खगोलशास्त्र संबंधी जानकारियां भी पर्याप्त संख्या में हैं। तात्पर्य यह है कि 16वीं शताब्दी में तो यूरोप में भारतीय ज्योतिष के खगोलीय तथ्य भली-भांति प्रचलित हो गए थे। स्वाभाविक ही है कि उन्हें भारतीय ज्योतिष के तथ्य कि सूर्य का आकार पृथिवी से बड़ा है, सूर्य केंद्र है, पृथिवी नहीं, आदि भी ज्ञात हो रहे थे। इन्हीं जानकारियों के आधार पर वहाँ कोपरनिकस और गैलीलियो जैसे लोगों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि यूरोप के खगोल ज्ञान का मुख्य स्रोत भारत का ज्योतिष ही था। ज्योतिषीय गणना को जानने के बाद ही जेम्स हट्टन जैसे लोगों ने पृथिवी के लाखों वर्ष प्राचीन होने की बात कही।
कैल्कुलस, गुरुत्वाकर्षण और गति के नियम
इतना तो आज सभी स्वीकारते हैं कि शून्य सहित सभी अंक और दशमलव प्रणाली भारत से ही अरब और अरब से यूरोप पहुँची। 13वीं शताब्दी तक यूरोप शून्य और अंकों स्थानीय मान के व्यवहार से ठीक से परिचित नहीं हो पाया था और इसलिए फ्लोरेंस में कानून बनाया गया था कि वित्तीय करारों को अंकों तथा शब्दों दोनों में ही लिखना अनिवार्य होगा, जिसका पालन हम आज भी चेक आदि में करते ही हैं। यह सोचना हास्यास्पद लगता है कि जो यूरोप 13-14वीं शताब्दी तक अंकों के स्थानीय मान को ठीक से समझ नहीं पा रहा था, वही यूरोप अचानक से 17वीं शताब्दी में कैल्कुलस जैसे उच्च गणितीय विधा का आविष्कार कर देता है।

सच तो यह है कि केरल में जेसुइट पादरियों ने आर्यभटिय कैल्कुलस की पद्धति को देखा और वे इस विधा को यूरोप ले गए। प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. चंद्रकांत राजू बताते हैं कि न्यूटन को कैल्कुलस की पद्धति समझ नहीं आई क्योंकि ईसाई सिद्धांतों के अनुसार गणित एक्जैक्ट और एबसोल्यूट यानी सटीक और पूर्ण होता है। इसलिए उसे अनंत श्रेढ़ी का योग निकालने में कठिनाई आई तो उसने इसके लिए लिमिट लगा कर डी/डीटी की अवधारणा में ढाला। कुल मिला कर तथ्य यही है कि कैल्कुलस न्यूटन तक भारत से ही पहुँचा था। परंतु गणित के इतिहासज्ञ इस तथ्य को छिपा जाते हैं और न्यूटन को कैल्कुलस का पिता कह देते हैं।

इसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत तो भारतीय शास्त्रों में एक नहीं, कई-कई ग्रंथों में ढेर सारे प्रकार से लिखा हुआ है। महर्षि कणाद के वैशेषिक दर्शन में गुरुत्व शब्द और उसके सिद्धांत के प्रतिपादन में तीन-तीन सूत्र प्राप्त होते हैं। भास्कराचार्य के ग्रंथ में गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत उल्लिखित है। वेदों में पृथिवी और सूर्य के परस्पर आकर्षण का सिद्धांत वर्णित है। सूर्य सिद्धांत आदि ज्योतिष ग्रंथों में गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत वर्णित है। स्वाभाविक ही है कि जब अन्यान्य ज्योतिषीय सिद्धांत यूरोप पहुँच रहे थे, ये सिद्धांत भी यूरोप पहुँचे। यदि यह कहा जाए कि न्यूटन ने इसे गणितीय सूत्र तैयार किए, तो भी गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत भारत से ही यूरोप पहुँचा है, इसमें कोई संशय नहीं है।

गति के नियमों को लेकर भी भारतीय शास्त्रों में अनेक सूत्र मिलते हैं। 17वीं शताब्दी तक भारत से बड़ी संख्या में संस्कृत ग्रंथों की पांडुलिपियां यूरोप पहुँचने लगी थीं और उनका अनुवाद भी किया जाने लगा था। इसके अतिरिक्त डायरी नोटिंग के रूप में भी मिशनरियाँ भारतीय ज्ञान को यूरोप पहुँचा रही थीं। इनका अध्ययन यूरोप में व्यापक रूप में हो रहा था। यह हमें अवश्य जानना चाहिए कि 19वीं शताब्दी तक यूरोप में शिक्षा पूरी तरह चर्च के ही आधीन थी। इसलिए भारत से मिशनरियां जो भी ज्ञान यूरोप ले जा रही थीं, वे यूरोप में शिक्षा में उपयोग की जा रही थीं।

यूरोप के वैज्ञानिक अनुसंधानों का इतिहास पढ़ते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और उसके बाद यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति मूलत: वस्त्र उद्योग पर आधारित थी। यानी उन्हें वस्त्र बनाने की तकनीक भी 18वीं शताब्दी में भारत से ही मिली है।
✍🏻रविशंकर, कार्यकारी संपादक, भारतीय धरोहर

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