आदि भाषा संस्कृत का प्रकाश और स्वरूप

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✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

अब हम आदि-भाषा के स्वरूप पर कुछ विचार उपस्थित करते हैं। जब आदि-ज्ञान के स्वरूप को जान लिया जावे, तो आरम्भ में भाषा का व्यवहार कैसे चला होगा? ऐसी आकाङ्क्षा प्रत्येक व्यक्ति को होनी स्वाभाविक ही है।

यह नियम है कि मनुष्यों में ज्ञान विना[१] भाषा के नहीं रह सकता, और भाषा विना ज्ञान के नहीं रह सकती। इन दोनों का परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध रहता है। एक के विना दूसरे का रहना असम्भव है। जैसे कुल परम्पराओं में ज्ञान विना सिखाये नहीं चल सकता, इसी प्रकार भाषा भी विना सिखाये नहीं आ सकती। मनुष्य वही भाषा बोलता हुआ देखा जाता है, जो कि उसके कान में पड़ती है। एक शिशु भी वही भाषा बोलता हुआ दृष्टिगोचर होता है, जो भाषा वह अपनी माता वा पिता की गोद में बैठकर सुना करता है, चाहे वह माता पिता से कान में पडे या अपने परिवार वा अन्य बाह्य व्यक्तियों से, वह वही शब्द बोलता है, जो वह सुनता है। यही कारण है कि एक-एक प्रान्त (जिले) वा प्रदेश की भाषा में निरन्तर भिन्नता पाई जाती है। तात्पर्य यही है कि कोई भी मनुष्य वा बालक विना सिखाये दूसरों की भाषा कदापि नहीं बोल सकता। जब बोल नहीं सकता, तो यह कहना कि वह भाषा स्वयं बना लेगा, किसी प्रकार भी माननीय नहीं हो सकता, यह तो उसकी शक्ति से सर्वथा बाहर की बात है। संसार में कोई भी जन्म का गूगा नहीं मिलेगा, जो बहिरा न हो। चूकि वे बहिरे होते हैं, उन्हें सुनाई कुछ देता नहीं, अतः वे गूगे भी रह जाते हैं। योरोप, अमेरिकादि में अनेक बादशाहों ने, तथा भारत में सम्राट अकबर आदि ने कुछ नवजात बच्चों को मनुष्य की बोलचाल से सर्वथा पृथक् रखकर परीक्षण करने का यत्न किया। जिसके लिये उन्होंने कड़ा पहरा लगाया। परिणाम यह हुआ कि कुछ समय के पश्चात् यही देखने में पाया कि कोई कुछ भी नहीं बोल सकता था।

[📎पाद टिप्पणी १. इस विषय में पाश्चात्यों के कुछ विचार भी उपस्थित करते हैं –
▪️(i) “I therefore declare my conviction as explisively as possible that thought in the sense of reasoning is not possible without language.” (साइंस आफ लग्वेज-मूलरकृत)
▪️(ii) “Without language, says Sheeling, it is impossible to conceive philosophical nay, even any human consciousness” (साइंस आफ लैंग्वेज-मूलरकृत)
अर्थात् बिना भाषा के विचारों का प्रकट होना सर्वथा असम्भव है, उपयुक्त दोनों का यही भाव है।
▪️(iii) “At one time Sanskrita was the one language spoken all over the world.” (इण्डियन रिव्यू माग २, ३ पृ० ४२)।
अर्थात् एक समय था जब संस्कृत विश्व भर की भाषा थी।
▪️(iv) “That Panini knew the Pratishakhyas had been indicated long ago by professor Bohtlingk, and it can be proved, by a comparison of Panini sutras with those of Pratishakhyas, at Panini largely availed himself of the works of his predecessors.” (The Sanskrit Literature by Maxmuller)]

कहने का तात्पर्य यह है कि बिना निमित्त अर्थात् विना शिक्षा के संसार में कोई भी भाषा बोली नहीं जा सकती। ऐसी अवस्था में हमें यही कहना पड़ेगा, अर्थात् इसी सिद्धान्त को मानना होगा कि सृष्टि के आदि में ज्ञान और भाषा साथ-साथ लेकर ही मानव-समुदाय का प्रादुर्भाव संसार में हुआ, क्योंकि विना भाषा (शब्द) के ज्ञान रह ही कैसे सकता है ? जहाँ वैदिक ज्ञान वा ईश्वरीय ज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ भाषा का प्रादुर्भाव होना भी अनिवार्य है।

यदि कोई कहे कि मनुष्य बहुत समय तक गूगा ही रहा और वह इशारों से वा चक्षु के व्यापार अर्थात् इङ्गित, चेष्टित से ही काम चलाता रहा, जब मनुष्य का काम इतने से न चला तो भाषा बना ली। हम पूछते हैं भाषा बनाने से पूर्व निरन्तर इतने समय तक उनमें परस्पर संवाद कैसे चलता रहा होगा? जब तक अर्थ का निश्चय नहीं कर लिया होगा, तब तक परस्पर का संवाद क्या निरर्थक ही चलता रहा होगा? जो हो नहीं सकता, क्योंकि जब तक परस्पर यह निश्चय न हो जावे कि अमुक ध्वनि का अमुक अर्थ नियत रहेगा, संवाद की प्रक्रिया का चलना ही नितान्त असम्भव है, और वह भी उस दशा में, जब कि उनके पास अर्थयुक्त कोई ध्वनि ही नहीं थी। किस प्रकार एक ने दूसरे से कहा होगा कि भाई के लिये ‘भा’ और बहिन के लिये ‘ब’ और माता के लिये ‘मा’ कहना और समझना चाहिये। इतना ही नहीं, दूसरों ने इस अभिप्राय को भला समझा ही कैसे होगा?

अतः यह सब बुद्धिग्राह्य नहीं हो सकता। बुद्धि में तो यही बात ठीक बैठती है, जैसा कि हम ऊपर सिद्ध कर आये हैं, कि स्वाभाविकज्ञानमात्र से ज्ञान की वृद्धि कदापि नहीं हो सकती, जब तक उसे नैमित्तिकज्ञान की सहायता न मिले।[२] इसी प्रकार भाषा भी विना सिखाये नहीं पा सकती। अतः इसी सिद्धान्त पर पहुंचना पड़ता है कि आदि-ज्ञान और आदि भाषा का प्रादुर्भाव परमपिता परमात्मा की ओर से हुआ, और सृष्टि के आरम्भ में, जेसे ज्ञान एक था, वैसे भाषा भी एक थी। यदि मनुष्यों की भाषा एक न होती, तो मनुष्यों का परस्पर का व्यवहार ही कैसे चलता? क्योंकि मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो समूह (सोसाइटी) के विना रह नहीं सकता। एक भाषा न होने से उसका काम चलना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है।
[📎पाद टिप्पणी २. द्र॰ पूर्ववर्ती लेख – ‘ईश्वरीय-ज्ञान की आवश्यकता’(पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु) 👉🏻 https://avatsara.wordpress.com/2020/05/07/ishwareey-gyaan-kee-aavashyakata-pandit-brahmadatta-jigyaasu/ ]

हम ऊपर कह पाये हैं कि ‘ईश्वरीय-ज्ञान-वेद’ वह ज्ञान है, जो सृष्टि के आदि में मनुष्यों को परमपिता परमात्मा से प्राप्त होता है। यह ज्ञान प्रभु ने जिस भाषा के द्वारा संसार को दिया है, वह भाषा किसी भी अन्य भाषा से उत्पन्न नहीं हुई, और न ही वह आप से आप प्रगट हो गई, क्योंकि मनुष्य के मुख से जो ध्वनि नादरूप में होती हुई वर्णात्मकध्वनि के रूप में हमारे कानों तक पहुंचती है, वैसी ध्वनि संसार में मनुष्य के अतिरिक्त और कहीं से भी सुनाई नहीं देती। हम स्पष्ट देखते हैं कि पशु पक्षियों की ध्वनियां वर्णात्मक नहीं होतीं। इससे यह बात भली-भांति समझ में आ सकती है कि मनुष्य अपने वर्गों को किन्हीं बाह्यध्वनियों से अनुकरण कर लेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। यदि मनुष्य ऐसा कर सकता, तो संसार में किसी देश वा जाति की वर्णमाला अपूर्ण कभी दृष्टिगोचर न होती। प्रत्येक व्यक्ति वाह्यध्वनियों से अपनी-अपनी वर्ण माला को बढ़ा लेता, इससे यह सिद्ध है कि बाह्यध्वनियों से भाषा कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसी प्रकार यह भी असम्भव है कि मनुष्य के मुख से भाषा अपने आप ही निकल पड़े, क्योंकि मनुष्य वही भाषा बोलता है जो कि वह दूसरों से सुनता है।

अतः यह सिद्ध है कि भाषा अपने ही आप मुख से निकल पड़े या बाह्यध्वनियों के अनुकरण द्वारा भाषा बन जावे, यह दोनों ही प्रक्रियाएँ नहीं बन सकतीं। यही मानना पड़ेगा कि वह आदि-भाषा केवल परमात्मा की प्रेरणा से ही उत्पन्न हो सकती है जैसे कि आदि ज्ञान। दूसरे शब्दों में आदि-ज्ञान और आदि-भाषा उस परमपिता परमात्मा की ही देन हैं और वे ऋषियों द्वारा प्राप्त होते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से ही ज्ञान और भाषा उत्पन्न हो सकते हैं, अन्य उपायों से नहीं। देववाणी किसी भाषा का अपभ्रंश हो सो भी नहीं क्योंकि इसकी उत्कृष्टता को संसार की कोई भी भाषा नहीं पा सकती। और संसार में जितनी भाषायें चलीं, वे सब देवभाषा (संस्कृत) से परम्परा से बिगड़ कर बनी, जिनका उद्गम स्थान वेद है। यह सत्य है कि एक ही मूल भाषा अनेक कारणों से अनेक शाखाओं में फैलकर अनेक विभागों में विभक्त हो जाती है, जिसका विस्तृत विवेचन यहाँ कठिन है, अर्थात् कालान्तर में वही एक देवभाषा अनेक कारणों से, अनेक शाखाओं में फैलकर अनेक विभागों में विभक्त हो गई है, जिसका विस्तृत विवेचन करना यहाँ पर कठिन है। इस देवभाषा का भी उद्गम स्थान वेदवाणी है।

अतः वेदवाणी ही सब भाषाओं की आदिजननी है। वेद की भाषा कभी बोली जाती रही हो, ऐसी बात नहीं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में इसे भाषा शब्द से नहीं पुकारा गया है, क्योंकि अनन्त प्रभु के ज्ञान वेद में समस्त संसार के ज्ञान का समावेश होने के लिये उसकी रचना स्वभावतः ही ऐसी होनी चाहिये थी, जिसमें एक शब्द अनेक अर्थों का द्योतक हो, अनेकविध ज्ञान एक ही शब्द के द्वारा प्रकट न होने पर ईश्वर को न जाने कितनी बड़ी रचना करनी पड़ती। अतः यही मानना होगा कि आदि में वेद से ले-ले कर शब्दों का प्रयोग होने लगा। जैसा कि शास्त्र कहता है –

🔥सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।
वेदशन्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ मनु० १।२१
वेद से लेकर ही लौकिक शब्दों के नित्य वाच्यवाचक सम्बन्ध जाने गये। वही देववाणी अर्थात् संस्कृत के नाम से कही जानेवाली भाषा व्यवहार में चली। वेद में कहा है –

🔥देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।
ऋ० ८।१००।११
विद्वान् लोग वेदवाणी के द्वारा (नित्य शब्दार्थसम्बन्धों को जानकर) देववाणी अर्थात् संस्कृतभाषा का विस्तार करते हैं, उसी को अन्य सब साधारण मनुष्य बोलते हैं।

संसार में जितनी भाषायें हैं, उनमें सब से अधिक विस्तृत, पूर्ण और परिश्रम-साध्य उच्चारण वेदभाषा का ही है। उच्चारण-विषय में जितनी सावधानता वेदवाणी के विषय में की गई है, उतनी किसी में नहीं। इतना ही नहीं, लौकिक संस्कृत भाषा के ही उच्चारण में जितनी मौलिकता, स्वाभाविकता और सावधानता आज तक बर्ती गई है, संसार की किसी भी भाषा के उच्चारण में नहीं बर्ती गई। यह बात ध्यान देने योग्य है कि जो भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ हम सुनते हैं, वे संख्या में भी अधिक मात्रा में संस्कृतभाषा में ही पाई जाती हैं। केवल संख्या में ही अधिक पाया जाना कोई महत्त्व नहीं रखता, सबसे बड़े महत्त्व की बात तो यह है कि संस्कृतभाषा की ६३ की ६३ ध्वनियाँ अपनी स्वाभाविकता-नैसर्गिकता-मौलिकता और अनिवार्यता को लिये हुये हैं। संख्या के विषय में सब विद्वान् जानते हैं कि लातीनी-हिब्रू में २० वर्ण माने जाते हैं, फ्रांस की भाषा में २५, अङ्गरेजी में २६, स्पेन की भाषा में २७, तुर्की और अरबी में २८, फारसी में ३१, रूसी भाषा में ३५ और संस्कृत में ६३।[३] वर्तमान आर्यभाषा वा सामान्य संस्कृत में ४७ अक्षर बोले जाते हैं, ऐसा किन्हीं का मत है, सो ठीक नहीं। वास्तविक ६३ अक्षर ही देववाणी संस्कृत में हैं, ये ध्वनियाँ स्वाभाविक हैं, जो सार्थक हैं। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा की ही वर्णमाला सब से पूर्ण वा विस्तृत है।
[📎पाद टिप्पणी ३. वायुपुराण में ६३ अक्षर मानकर भी स्वर केवल ह्रस्व, दीर्घ ही माने हैं, ६३ अक्षर पूरे नहीं गिनाये।]

लौकिक और वैदिक भाषा का भेद भी अवश्य ध्यान देने योग्य है। थोड़ी सी संस्कृत जाननेवाला भी समझ सकता है कि वेद के व्याकरण के नियम लौकिक व्याकरण के नियमों से भिन्न होते हैं।[४] यह बात हम अपने पाठकों को आगे बतावेंगे। धातुओं की जितनी संख्या हमें संस्कृत भाषा में मिलती है, संसार की किसी भाषा में नहीं मिलती। अतः देव वाणी (संस्कृत) के आदि भाषा होने और वेद-मूलक होने में कुछ भी संदेह नहीं रह जाता।
[📎पाद टिप्पणी ४. द्र॰ पूर्ववर्ती लेख – ‘लौकिक और वैदिक शब्दों में भेद’ (पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु)]

आशा है भाषा की उत्पत्ति और उसके स्वरूप के विषय में या संक्षेप से इतना लिखना ही पर्याप्त होगा।

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

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