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धरती है बलिदान की तीन फूल, तीनों निछावर-3

शांता कुमार
गतांक से आगे…
रैण्ड मारा गया-इतना ही लोग कहते थे। उस पर चर्चा करने का किसी का साहस न था। सरकार की पुलिस का गुप्चर विभाग उसी क्षण से चारों ओर छा गया। लोगों की तलाशियां ली जाने लगीं। चलते यात्रियों को स्टेशन पर पकड़कर पूछताछ होने लगी। अंग्रेजी समाचार पूना के ब्राहमणों के विरूद्घ आग उगलने लगे। एक पत्र ने तो यहां तक लिखा कि पूना के प्रत्येक ब्राहमण को फांसी पर लटका दो। हत्या के स्थान पर दो तलवारें एक बोतल व एक पत्थर पुलिस को मिले थे। पर इससे भी खोज में कोई सहायता न मिल सकी। अंत में सरकार की ओर से घोषणा की गयी कि हत्यारे को पकडऩे वाले या उसका पता बताने वाले को बीस हजार रूपये इनाम दिया जाएगा। भाग्य की कितनी विडंबना है कि गुलामी में देश भक्तों को तो फांसी की डोरी पर लटकना पड़ता है और देश द्रोहियों को हजारों के इनाम दिये जाते हैं। अपने देश के साथा द्रोह करने का खुला निमंत्रण देकर चाफेकर के सिर पर बीस हजार का इनाम लटकने लगा। पूना की जनता में रैंड के विरूद्घ इतनी घृणा थी कि उसकी हत्या पर कोई शोक सभा न हुई। यहां पर कितने ही उदार विचार के व अंग्रेजों के मानस पुत्र थे पर किसी ने शोक-सभा बुलाने की आवश्यकता न समझी। पूरे पांच दिन तक कुछ न हुआ। आखिर सत्ताईस जून को जिला अधिकारी लैंब महोदय ने एक सभा बुलाई, उसमें नगर के प्रमुख लोगों को बुलाकर कहा कि यदि पूना की जनता हत्यारों का पता लगाने में सहयोग न देगी तो इसके परिणाम बुरे होंगे। उसने सबको खूब धमकाया। उसने कहा कि यह साधारण हत्या नही है, बल्कि राजनीतिक हत्या है। तभी तो राज्यभिषेक का दिन उसके लिए चुना गया। उन दिनों नगर में चारों ओर पुलिस ही पुलिस तैनात थी। इनदिनों अतिरिक्त पुलिस का व्यय नगर पालिका से दण्ड स्वरूप वसूल किया गया। लोकमान्य तिलक ने अपने प्रसिद्घ पत्र द्वारा इन कार्रवाईयों का विरोध किया।
सरकार लोकमान्य तिलक की कार्यवाईयों पर भी कड़ी नजर रख रही थी। उसको यह विश्वास हो गया था कि हत्या तिलक द्वारा प्रचारित शिवाजी व गणेश उत्सवों का ही परिणाम है। अत: 27 जुलाई को सरकार ने उन्हें कारागार में डाल दिया। पर्याप्त समय बाद पश्चिम के प्रसिद्घ विद्वान मैक्समूलर के हस्तक्षेप करने पर उन्हें मुक्त किया गया था। चांदी के खनखनाते ठीकरों में बहुत कुछ बिक जाया करता है। सरकार की बीस हजार के इनाम की घोषणा से एक गणेश शंकर द्राविड़ नामक व्यक्ति के मुंह में पानी भर आया। उस द्राविड़ का छोटा भाई बालकृष्ण चाफेकर का मित्र था और चाफेकर क्लब का सदस्य था। इन दोनों को हत्या का सब पता था। उन्होंने इनाम के लालच में पुलिस अधिकारी मि ब्रुइन को सब भेद बता दिया। परिणामस्वरूप दामोदर चाफेकर पकड़ लिया गया। बालकृष्ण हाथ न आया। वह भाग गया। भागता भागता वह हैदराबाद रियासत की सीमा में घुस गया। कई दिन तक उसे भूखे पेट जंगल की खाक छाननी पड़ी। कुछ दिन उसने बड़ी कठिनाई से काटे। बाद में तिलक जी को उसके कष्टो का पता चला तो उन्होंने हैदराबाद के चीफ जस्टिस श्री कोरटकर को एक पत्र लिखकर बालकृष्ण की व्यवस्था करवाई। श्री कोरटकर विचारों में तिलक के विरोधी थे। गोखले के अनुयायी होते हुए भी तिलक की देश भक्ति के लिए उनका बड़ा सम्मान करते थे। इसी विश्वास के कारण इतने बड़े हत्या के रहस्य को तिलक ने उन्हें निसंकोच लिख दिया।
बालकृष्ण अभी हैदराबाद में ही गुप्त रूप से जीवनयापन कर रहे थे कि इधर बड़े भाई दामोदर पर अभियोग चलायाा गया। प्रसिद्घ क्रांतिकारी इतिहासकार मन्मथनाथ के शब्दों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की वह चक्की जो गदर के दिनों के बाद से करीब करीब बंद पड़ी थी, हंसी और उससे एक पैशाचिक घर्र घर्र की आवाज होने लगी। इस चक्की का नाम था ब्रिटिश न्यायालय। ऊपर से वह कितनी भोली भाली प्रतीत होती थी किंतु दामोदर चाफेकर ने न्यायालय में हत्या के आरोप को साहस पूर्वक स्वीकार कर लिया। उसने कहा कि रैंड की हत्या उसने जान बूझकर की है ताकि निर्दोष भारतीयों पर हुए अत्याचारों का बदला लिया जा सके। उसने यह भी स्वीकार किया था कि विक्टोरिया के बुत के मुंह पर काला तारकोल भी उसी ने पोता था। वह सब कार्य उसने इसलिए किये ताकि देशवासी विद्रोह की प्रेरणा ले सकें। ब्रिटिश न्यायालय से उसको वही कुछ प्राप्त हुआ, जो विदेशी राज्यों में देश भक्तों को प्राप्त होता है। उसे कहते हैं-फांसी।
18 अप्रैल 1898 फांसी का दिन तय हुआ। दामोदर ने लोकमान्य को जो उसी जेल में बंद थे एक संदेश भेजा और एक गीता की प्रति मंगवाई। गीता हाथ में लेकर वह वीर नियत समय पर फांसी के फंदे को चूमने आगे बढ़ गया। अंतिम समय वह गीता का यह प्रसिद्घ श्लोक पढ़ रहा था।
देहिनोअस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहांतर प्राप्ति: धीरस्यत्र न मुहति।।
एक मां के उद्यान का सबसे बड़ा खिला हुआ पुष्प इस प्रकार बलिदान हो गया। दूसरा पुष्प बालकृष्ण हैदराबाद में जैसे तैसे जीवन के दिन बिता रहा था। यदि वह वहीं पर रहता तो कभी पुलिस को उसका पता न चलता पर विधाता को कुछ और ही स्वीकार था। महाकाल का खप्पर एक चाफेकर के मुण्ड से भरा न था। थोड़े ही दिनों के बाद उसका मन वहां से ऊबने लगा। वह नागपुर के मार्ग से महाराष्टï्र में आ गया। कुछ ही दिनों के बाद पुलिस की पैनी नजरों ने एमहस्र्ट के इस हत्यारे को पहचान लिया वह पकड़ा गया। क्रमश:

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