Categories
स्वास्थ्य

कैसे बनी कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी “प्लाज्मा थैरेपी”

योगेश कुमार गोयल

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा इस थैरेपी के उपयोग हेतु रक्त प्लाज्मा से कोरोना मरीजों के उपचार के ट्रायल की अनुमति दे दी गई है। अब देश के पांच आयुर्विज्ञान कॉलेज तथा अस्पतालों में इसका क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा।

विश्वभर में लाखों लोगों की जान ले चुके कोरोना के कहर से लोगों को बचाने के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने में जुटे हैं लेकिन कोरोना की प्रभावी वैक्सीन या टीके उपलब्ध होने में अभी काफी लंबा समय लग सकता है। यही कारण है कि कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए अब प्लाज्मा थैरेपी का उपयोग किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कोरोना की वैक्सीन और इस थैरेपी में सबसे बड़ा अंतर यही है कि जहां वैक्सीन लगने के बाद मरीज के शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र स्वयं एंटीबॉडीज बनाने लगता है, जिससे संक्रमण होने पर शरीर में बैक्टीरिया अथवा वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता होती है। दूसरी ओर प्लाज्मा थैरेपी में मरीज को जो एंटीबॉडीज दी जाती हैं, वे शरीर में स्थायी तौर पर मौजूद नहीं रहती। एंटीबॉडीज प्रोटीन से बनी विशेष प्रकार की इम्यून कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें मेडिकल भाषा में ‘बी-लिम्फोसाइट’ कहा जाता है। शरीर के भीतर जब भी कोई बाहरी चीज पहुंचती है, ये तुरंत अलर्ट हो जाती हैं। शरीर में बैक्टीरिया अथवा वायरस द्वारा छोड़े जाने वाले विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करने का कार्य ये एंटीबॉडीज ही करती हैं।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा इस थैरेपी के उपयोग हेतु रक्त प्लाज्मा से कोरोना मरीजों के उपचार के ट्रायल की अनुमति दे दी गई है। अब देश के पांच आयुर्विज्ञान कॉलेज तथा अस्पतालों में इसका क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। फिलहाल तिरूवनंतपुरम स्थित चित्रा तिरूनाल आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान को क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर सीमित संख्या में इस तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। कोरोना रोगियों के उपचार के लिए इस थैरेपी को इसलिए अपनाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि कोरोना से ठीक हो चुके एक ही व्यक्ति के रक्त से कोरोना के चार नए मरीजों का इलाज किया जा सकता है। दरअसल एक व्यक्ति के रक्त से 800 मिलीलीटर तक प्लाज्मा लिया जा सकता है और कोरोना संक्रमित किसी मरीज के शरीर में एंटीबॉडीज डालने के लिए करीब 200 मिलीलीटर तक प्लाज्मा चढ़ाया जा सकता है। कोरोना संक्रमण से उबर चुके मरीज के शरीर से एंटीबॉडीज उसके ठीक होने के 14 दिन बाद ही लिए जा सकते हैं और प्लाज्मा देने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करके सुनिश्चित किया जाता है कि उसे कोई और बीमारी तो नहीं है।

चीन के बाद कई देशों में चल रहे ट्रायल

जिस चीन ने कोरोना नामक अपनी जानलेवा सौगात के जरिये पूरी दुनिया में कोहराम मचाया है, उसी चीन में इसी प्लाज्मा थैरेपी के जरिये कुछ मरीजों की जान बचाने की खबरें कुछ समय पहले सामने आई थी। चीनी अध्ययनकर्ता खुलासा कर चुके हैं कि वेंटिलेशन पर पहुंचे कोरोना के कुछ गंभीर मरीजों की जान कोन्वल्सेंट प्लाज्मा से बचाई गई थी। उनके मुताबिक इस प्लाज्मा थैरेपी के 12 से 24 घंटे में ही कई गंभीर मरीजों में सुधार आने लगा था। बताया जाता है कि फरवरी माह में चीन के करीब बीस ऐसे डॉक्टरों और नर्सों ने अपने प्लाज्मा दान किए थे, जो कोरोना से संक्रमित होने के बाद ठीक हुए थे। इन प्लाज्मा का उपयोग वहां कोरोना के कई मरीजों पर किया गया और कहा जाता है कि इससे मरीजों के उपचार में काफी मदद मिली। वहां के डॉक्टरों के अनुसार प्लाज्मा थैरेपी के अध्ययन के आरंभिक नतीजों के आधार पर कोरोना के टीके या कारगर दवा के अभाव में विशेष प्लाज्मा का प्रयोग कोरोना रोगियों के इलाज का एक कारगर उपाय है। चीन के अध्ययनकर्ताओं के दावों के बाद अमेरिका तथा इंग्लैंड में इस थैरेपी को लेकर ट्रायल शुरू हो चुके हैं और हमारे यहां भी इसके ट्रायल की अनुमति दी जा चुकी है। ब्रिटेन में ग्लासगो विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ता प्रो. डेविड टेपिन द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य अध्ययन संस्थान में कोन्वल्सेंट प्लाज्मा से क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति मांगी गई है। अमेरिका में भी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा कोरोना से ठीक हो चुके लोगों से प्लाज्मा दान करने की अपील की जा चुकी है।

दशकों से इस्तेमाल हो रही है प्लाज्मा थैरेपी

ऐसा नहीं है कि इस थैरेपी के जरिये वायरस संक्रमित मरीजों का इलाज करने पर पहली बार विचार किया जा रहा हो बल्कि पिछले करीब सौ वर्षों से इस पद्धति को अपनाया जाता रहा है। सबसे पहले वर्ष 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू के इलाज में अमेरिका द्वारा इस पद्धति को अपनाए जाने की जानकारी मिलती है। उसके बाद वर्ष 2003-04 में सार्स से निपटने में हांगकांग द्वारा, 2009 में स्वाइन फ्लू के मरीजों के उपचार में दुनियाभर में और 2014 में इबोला मरीजों के उपचार के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल के आधार पर कोन्वल्सेंट रक्त तथा प्लाज्मा थैरेपी का उपयोग किया गया था। प्लाज्मा थैरेपी के दौरान ऐसे ‘हाइपर इम्यून’ व्यक्तियों की पहचान की जाती है, जो वायरस को हराकर स्वस्थ हो चुके होते हैं और उनके श्वेत रक्त से प्लाज्मा लिया जाता है। इसी प्लाज्मा को ‘कोन्वल्सेंट प्लाज्मा’ कहा जाता है। यही प्लाज्मा गंभीर रूप से बीमार रोगी के शरीर में चढ़ाया जाता है, जिसके बाद वायरस संक्रमित व्यक्ति का शरीर रक्त में उस वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने लगता है। एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद शरीर वायरस से लड़ने में समर्थ हो जाता है और रोगी के स्वस्थ होने की उम्मीद बढ़ जाती है।

कैसे काम करती है प्लाज्मा थैरेपी?

‘प्लाज्मा थैरेपी’ इस धारणा पर कार्य करती है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके मरीजों के शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी एंटीबॉडीज (प्लाज्मा) विकसित हो जाते हैं। ठीक हुए ऐसे मरीजों के रक्त से प्लाज्मा निकालकर इन एंटीबॉडीज के जरिये नए मरीज के शरीर में मौजूद कोरोना वायरस का सफाया किया जाता है। इस थैरेपी में ‘एस्पेरेसिस’ विधि से कोरोना से उबर चुके रोगी के शरीर से रक्त निकाला जाता है और इसी रक्त से केवल प्लाज्मा या प्लेटलेट्स जैसे अवयवों को निकालकर शेष बचा रक्त वापस डोनर के शरीर में चढ़ा दिया जाता है। एम्स के मेडिसिन विभाग के डॉ. नवल विक्रम के मुताबिक ‘प्लाज्मा थैरेपी’ सभी रोगियों को देने की जरूरत नहीं हैं बल्कि जिनकी तबीयत ज्यादा खराब है, यह उन्हीं को दी जाए तो ज्यादा बेहतर है। उनके मुताबिक पहले भी सार्स तथा स्वाइन फ्लू जैसे कई संक्रामक रोगों में इस थैरेपी का इस्तेमाल हो चुका है।

प्लाज्मा थैरेपी के तहत डॉक्टर ऐसे मरीजों का प्लाज्मा एकत्र करते हैं, जो कोरोना वायरस का संक्रमण होने के बाद ठीक हो जाते हैं और फिर उस प्लाज्मा को उन मरीजों को चढ़ा दिया जाता है, जिनका कोरोना का इलाज चल रहा है। इससे रोगी का रोग प्रतिरोधक तंत्र इन एंटीबॉडीज की मदद से इन्हीं जैसी और एंटीबॉडीज बनाना शुरू कर सकता है। ये एंटीबॉडीज किसी भी व्यक्ति के शरीर में उस वक्त विकसित होना शुरू होती हैं, जब वायरस उनके शरीर पर हमला करता है। ऐसी परिस्थिति में ये एंटीबॉडीज वायरस पर हमला करते हुए उसे निष्क्रिय करने का कार्य करती हैं। वायरस से बचाने के लिए इस थैरपी के जरिये रोगी को पैसिव इम्युनिटी देने का प्रयास किया जाता है। एक व्यक्ति के शरीर से निकालकर एक मरीज के शरीर में चढ़ाए गए प्लाज्मा के बाद मरीज के शरीर में जो रोग प्रतिरोधकता विकसित होती है, उसे ही ‘पैसिव इम्युनिटी’ कहा जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना वायरस से लड़ते हुए जब कोई रोगी ठीक हो जाता है, उसके बाद भी उसके शरीर में रक्त के अंदर ये एंटीबॉडीज लंबे समय तक प्रवाहित होते रहते हैं, जिससे उसका शरीर इस वायरस को तुरंत पहचानकर उससे लड़ने के लिए हर पल तैयार रहता है। दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब इस दिशा में प्रयासरत हैं ताकि कोरोना से जंग जीत चुके मरीजों के शरीर में बनने वाले एंटीबॉडीज की मदद से इस बीमारी से संक्रमित हो रहे नए मरीजों का इलाज संभव किया जा सके।

कितनी सुरक्षित और प्रभावी है यह थैरेपी?

वर्ष 2009-2010 में ‘एच1एन1 इंफ्लुएंजा’ महामारी फैली थी, तब प्लाज्मा थैरेपी का उपयोग करते हुए ही संक्रमण को नियंत्रित कर काफी मरीजों का उपचार किया गया था। इबोला महामारी के समय भी यह थैरेपी काफी मददगार साबित हुई थी। इसकी जरूरत इसलिए भी महसूस होती रही हैं क्योंकि किसी भी प्रकार का बैक्टीरियल संक्रमण फैलने की स्थिति में पहले से ही मौजूद एंटीबायोटिक्स के जरिये उसका इलाज किए जाने की पूरी संभावनाएं रहती है लेकिन जब संक्रमण या महामारी फैलने की वजह से कोई नए प्रकार का वायरस बनता है तो उसे नियंत्रित करने के लिए पहले से कोई एंटीवायरल उपलब्ध नहीं होती। ऐसे वायरस की रोकथाम के लिए एंटीवायरल बनाने में लंबा समय लगता है और तब तक जान-माल का बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है। ऐसे में प्लाज्मा थैरेपी का इस्तेमाल इस नुकसान को सीमित करने में मददगार साबित होता रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि कोरोना से जंग जीतने वाले हर व्यक्ति का रक्त प्लाज्मा थैरेपी में इस्तेमाल कर लिया जाएगा और इस रक्त प्लाज्मा को किसी भी मरीज को चढ़ा दिया जाएगा। दरअसल कोरोना को हराकर स्वस्थ हुए हर डोनर की तमाम जरूरी जांच करने के बाद ही उसका रक्त लिया जाता है और यह प्लाज्मा उसी मरीज को चढ़ाने पर विचार किया जाता है, जिसका रक्त समूह डोनर के रक्त समूह से मिलता हो।

प्लाज्मा थैरेपी की चुनौतियां

ऐसा नहीं है कि इस थैरेपी का इस्तेमाल करना बेहद आसान है। वास्तव में इसमें बहुत सारी चुनौतियां मौजूद हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि प्रयोग के हिसाब से रक्त प्लाज्मा का इस्तेमाल सही है लेकिन इसके लिए मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होनी आवश्यक है और डॉक्टरों के सामने कोरोना संक्रमित रोगी की रोग प्रतिरोधकता बढ़ाने की बड़ी चुनौती रहती है। सबसे बड़ी चुनौती रहती है कि संक्रमित कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या के हिसाब से कोरोना से जंग जीतने वाले व्यक्तियों के रक्त से पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा एकत्रित करना। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हैल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम के प्रमुख डॉ. माइक रेयान के मुताबिक जब तक कोरोना के इलाज के लिए बेहतर वैक्सीन तैयार नहीं होती, इस थैरेपी का उपयोग करना ठीक है लेकिन यह हर बार सफल ही हो, यह जरूरी नहीं। इस थैरेपी के इस्तेमाल से बड़ी उम्र वाले तथा उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों से जूझ रहे कोरोना मरीजों को ठीक करना सबसे बड़ी चुनौती है। डॉ. रेयान के मुताबिक हाइपर इम्यून ग्लोब्युलिन रोगियों में एंटीबॉडी को बेहतर बनाता है, जिससे रोगियों की हालत सुधरती है। वह कहते हैं कि यह थैरेपी वायरस को खासा नुकसान पहुंचाती है, जिससे मरीज का प्रतिरक्षा तंत्र बेहतर होता है और कोरोना वायरस से लड़ने में सक्षम हो सकता है लेकिन इसका इस्तेमाल सही समय पर किया जाना चाहिए। कुछ अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि पैसिव इम्युनिटी से वायरस से बहुत लंबे समय तक सुरक्षा की तो कोई गारंटी नहीं है क्योंकि शरीर ने एंटीबॉडीज खुद बनाना शुरू नहीं किया बल्कि बाहरी सेल्स की मदद से यह कार्य किया गया। उनके मुताबिक ऐसी रोग प्रतिरोधकता व्यक्ति के शरीर में कुछ महीनों तक ही रह सकती है।

कोरोना से जंग में हो सकती है बड़ी जीत

कुछ अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि कोरोना संक्रमण के मामले में यह थैरेपी इसलिए ज्यादा कारगर हो सकती है क्योंकि यह वायरस शरीर के सभी प्रमुख अंगों पर धावा बोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है और ऐसे में एंटीबॉडीज के जरिये इस संक्रमण को शरीर के अंदर फैलने से रोका जा सकता है। प्लाज्मा थैरेपी ज्यादा खतरे वाले रोगियों को ही दी जाती है। बहरहाल, शोधकर्ताओं के लिए प्लाज्मा थैरेपी के जरिये कोरोना मरीजों की जान बचाना बड़ी चुनौती है और अगर इन प्रयासों में उन्हें अपेक्षित सफलता मिलती है तो उम्मीद जताई जा सकती है कि यह 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के उन कोरोना मरीजों के लिए संजीवनी साबित होगी, जिन्हें कोरोना से जान का सबसे ज्यादा खतरा है। यदि ऐसा हुआ तो कोरोना वायरस के खिलाफ चल रही वैश्विक जंग में यह निश्चित रूप से बहुत बड़ी जीत होगी।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
norabahis giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş